"जिंदगी में हर बात नजरिए की है। अगर आप अपने अंदर की कमी को ही देखते रहेंगे तो प्रयास कब करेंगे। लोगों को अपनी आंखों से पर्दा हटाकर हमसे हमदर्दी जताने की जगह हमारा हौसला देखना चाहिए।'' ये शब्द हैं दृष्टिहीन होने के बावजूद अपने हौसले और हिम्मत की बदौलत वकालत की दुनिया में अपना नाम कमाने वाले पंकज सिन्हा के।
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देख नहीं सकते, लेकिन अनोखे तरीकों से दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत करते हैं पंकज, लड़े हैं नामी केस
Wed, 04 Dec 2019 10:17 AM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया
बीबीसी
बीबीसी
Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया
Updated Wed, 04 Dec 2019 10:17 AM IST
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पंकज सिन्हा
- फोटो : BBC
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पंकज सिन्हा
- फोटो : BBC
- दिल्ली हाईकोर्ट में कुछ मंजिल ऊपर चढ़कर पंकज का चैंबर आता है। चैंबर के दरवाजे पर सबसे पहले नजर उनके नेम-प्लेट पर पड़ी जिस पर हिंदी और अंग्रेजी भाषा में उनका नाम और पद तो लिखा ही था। साथ ही ब्रेल लिपि में भी उनका नाम अंकित था।
- पंकज बताते हैं कि चूंकि वह जन्म से ही दृष्टिहीन थे, तो उनके माता-पिता को उनकी सबसे ज्यादा चिंता रहती थी। वे सोचते थे कि सातों बच्चों में वह कहीं सबसे पीछे ना रह जाएं।
बचपन में मिट्टी से बने अक्षरों को छू-छू कर की पढ़ाई
पंकज सिन्हा
- फोटो : BBC
- 38 साल के पकंज सिन्हा झारखंड में रामगढ जिले के रहने वाले हैं। इनके पिता अजीत सिन्हा रेलवे कॉन्ट्रैक्टर थे और मां उषा देवी सरकारी स्कूल में पढ़ाती थीं।
- पंकज के माता-पिता ने उनके इलाज के लिए पहले रांची स्थित सरकारी अस्पतालों का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद पंजाब की तरफ भी रुख किया और एक आखिरी कोशिश दिल्ली के एम्स में भी की। लेकिन कहीं इलाज नहीं हो सका।
- वह कहते हैं कि उनके दादा जी उनके भाइयों से मिट्टी के अक्षर जैसे 'क ख ग' या 'ए बी सी' बनवाते थे और उन्हें उसे छूकर पहचानने को कहते थे।
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पंकज सिन्हा के चैंबर के बाहर ब्रेल लिपि में लगा नेमप्लेट
- फोटो : BBC
- जहां परिवार वाले उन्हें बेचारा समझ कर हमदर्दी दिखा रहे थे, वहीं उस छोटी सी उम्र में पंकज अपने भविष्य के लिए सपने बुन रहे थे।
- पकंज 1996 की बात याद करते हुए कहते हैं, 'उन दिनों मैं 8वीं क्लास में था। बॉलीवुड की फिल्मों में वकीलों के बारे में सुनकर उस पेशे से प्रभावित हुआ करता था।'
- 'घर वाले मेरी फिक्र करते थे। लेकिन मेरी लाचारी के बारे में मेरे सामने कुछ नहीं कहते थे। हां मेरे पीछे वह मानसिक रूप से परेशान रहते। लेकिन मेरे सोचने समझने का तरीक़ा जरा अलग रहता था।'
जब पिता ने दिया 5 हजार का लालच
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पंकज अपने परिवार के साथ
- फोटो : BBC
- जब वह 12वीं में पहुंचे तो उन्होंने वकालत करने की अपनी इच्छा जाहिर की। पूरा घर उनके खिलाफ हो गया।
- उनके पिता ने उनका ध्यान भटकाने के लिए उन्हें चुनौती दी कि अगर उनका दिल्ली विश्वविद्धालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाखिला हो गया तो वह उनको 5 हजार रुपये देंगे।
- उनके पिता उन्हें टीचर या किसी कॉलेज में प्रोफेसर बनाना चाह रहे थे।
- पैसों के लालच में पंकज ने तैयारी शुरू कर दी और उसका परिणाम यह निकला कि उनका सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाखिला हो गया और फिर उन्होंने वहां से इतिहास (History) में स्नातक की डिग्री हासिल की। लेकिन पंकज का मन तो उस काले कोट पर अटक गया था। उन्होंने जैसे-तैसे अपने पिता को मनाया और दिल्ली के कैम्पस लॉ सेंटर से लॉ की पढ़ाई की।
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