पंडित जवाहर लाल नेहरू, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौर की वह शख्सियत, जिनका नाम उनकी मौत के 57 साल बाद भी देश की सियासत को गरमा देता है। यह एक नाम ही नहीं वरन एक गुलाम भारत से लेकर स्वाधीन भारत, प्राचीन भारत से आधुनिक भारत के बनने की एक पूरी कहानी है। लेकिन इस कहानी में कई उतार-चढ़ाव भी आए हैं, जिनके कारण पंडित नेहरू का नाम आज भी देश की राजनीति में अमर है और सालों तक रहेगा।
इतिहास के पन्नों से : भारत रत्न और कश्मीर मसले पर घिरे रहे पंडित नेहरू, लेकिन सालों बाद खुले राज
क्या नेहरू ने खुद को भारत रत्न दिया?
अक्सर सियासी गलियारों में चर्चा होती है कि नेहरू ने खुद को भारत रत्न सम्मान से नवाजा था। आमतौर पर देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान करने की सिफारिश केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रपति को की जाती है। राष्ट्रपति फिर यह सम्मान से नवाजते हैं। शायद इसलिए ही कहा जाता है कि नेहरू ने खुद को भारत रत्न दिलवाया। बाद में उनकी पुत्री इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें भी भारत रत्न मिला। इसके बाद, उनके बेटे राजीव जब प्रधानमंत्री बने तो वे भी भारत रत्न से नवाजे गए। अक्सर इनको लेकर आलोचना होती है। लेकिन बता दें कि ऐसा नहीं है।
तो क्या प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति का था?
पंडित नेहरू को भारत रत्न देने का प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। उन्होंने ही सम्मान सूची में नेहरू का नाम जुड़वाया था। बता 1955 की गर्मियों की है। पंडित नेहरू बतौर प्रधानमंत्री यूरोप दौरे पर थे। तब 15 जुलाई, 1955 को डॉ प्रसाद ने कहा था, चूंकि, यह कदम मैंने बगैर प्रधानमंत्री की अनुशंसा के स्व-विवेक से उठाया है। इसे असंवैधानिक माना जा सकता है, लेकिन मुझे आशा है कि इसका पूरे देश में स्वागत किया जाएगा। राष्ट्रपति के इस कथन से यह स्पष्ट था कि नेहरू को भारत देने का फैसला उनका स्वयं का था। भले ही दोनों के संबंध कई मुद्दों पर मतभेद वाले थे। हालांकि, इसके फलस्वरूप जब 1962 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त हुए, तब उन्हें भारत रत्न से नवाजा किया गया था। कहा जाता है कि ऐसा करके नेहरू ने अपना कर्ज उतारा था।
क्या कश्मीर विवाद ही नेहरू की देन है?
देश में सियासत में दोनों तरह के लोग मिल जाएंगे एक जो कहते हैं कि नेहरू की बदौलत कश्मीर हिंदुस्तान के साथ है यानी नेहरू न होते तो कश्मीर हिंदुस्तान में नहीं होता। वहीं, दूसरे ऐसे जो यह कहते हैं कि कश्मीर विवाद ही नेहरू की देन है। नेहरू प्रधानमंत्री न बनते तो कश्मीर का पूर्ण विलय बरसों पहले ही हो चुका होता और आज कश्मीर आतंकवाद से ग्रसित न होता।
जूनागढ़ को वापस पाया
खैर, राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के इतर देखें तो नेहरू कश्मीर के भारत विलय के पक्षधर रहे हैं। ऐसे कईं दस्तावेज हैं जो कश्मीर के प्रति उनकी चिंता को प्रदर्शित करते हैं। आजादी के वक्त दो रियासतों के विलय पर विवाद था। एक हिंदू बाहुल्य जूनागढ़, जहां तत्कालीन नवाब मोहब्बत खान का शासन था और और दूसरी मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर रियासत, जिसके तत्कालीन महाराजा हरि सिंह थे। जूनागढ़ के नवाब ने जब पाकिस्तान में विलय का फैसला किया तो पटेल और नेहरू ने सेना भेजकर इसे वापस भारत में मिला लिया। नबाव पाकिस्तान भाग चुका था। लेकिन, उधर कश्मीर को लेकर पेच फंसा रहा।
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