रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध में हजारों भारतीय छात्र फंसे हैं। इनमें से अधिकांश एमबीबीएस के छात्र हैं जो बीते कुछ साल में डॉक्टर बनने का सपना लेकर वहां पहुंचे हैं। सोशल मीडिया पर लगातार इन छात्रों की वीडियो भी सामने आ रही हैं जो खुद को एयरलिफ्ट कराने की मांग भी कर रहे हैं। ऐसे में ‘अमर उजाला’ ने जब राजधानी के डॉक्टरों से यूक्रेन में हजारों चिकित्सीय छात्रों को लेकर सवाल किया तो उन्होंने बताया कि भारत से भी पुराने मेडिकल कॉलेज यूक्रेन में है। वहां चिकित्सीय शिक्षा लेना भी सस्ता है और रहना-खाना पीना भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लगभग बराबर ही है।
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कीव में भारतीय दूतावास के बाहर भारतीय छात्र
- फोटो : Harendra- Amar Ujala
नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉ. मनीष कुमार बताते हैं कि भारत में पहली बार 1835 में कलकत्ता और मद्रास मेडिकल कॉलेज शुरू हुए। जबकि यूक्रेन में 1741 और 1832 में शुरू मेडिकल यूनिवर्सिटी हैं जो विश्व स्तर पर काफी चर्चित हैं। एक संस्थान के प्रति भरोसा कायम होने के लिए यह काफी है। इसके अलावा यूक्रेन में रहना और खाना पीना प्रति माह करीब 15 से 18 हजार रुपये के बीच पड़ता है। यह एक तरह से नई दिल्ली के लगभग बराबर ही है।
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यूक्रेन में फंसे छात्र।
- फोटो : amar ujala
उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले तक जब देश में अच्छी रैंक नहीं आती थी और डॉक्टर ही बनने का सपना होता था तो छात्र रूस, यूक्रेन, चीन, कजाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेते थे लेकिन वहां से एमबीबीएस करने के बाद जब ये भारत आकर लाइसेंस लेने से पहले राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा देते तो करीब 80 फीसदी फेल हो जाते थे। हालांकि अब विदेश जाने से पहले नीट अनिवार्य है और वापस आने के बाद नेक्सट एग्जाम भी देना जरूरी है तो ऐसे में यह उम्मीद की जाती है कि जो पढ़ने वाला छात्र है वही विदेश में जाकर पढ़ाई कर पाए।
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यूक्रेन की राजधानी कीव में इंडियन एम्बेसी के दफ्तर पहुंचे।
- फोटो : अमर उजाला
वहीं सफदरजंग अस्पताल के डॉ. अनिल माणिक ने बताया कि यूक्रेन की साक्षरता 99.94 फीसदी है। शिक्षा के लिहाज से यह देश काफी विकसित है और वहां पढ़ने का माहौल भी अच्छा है। खाली वक्त में लोगों के हाथ किताबें ही दिखती हैं। ऐसे में दिल्ली सहित देश के भावी डॉक्टरों का विकल्प यूक्रेन होने का कारण भी है। इसके अलावा चीन के साथ सीमा विवाद भी एक वजह है। वहीं रूस के मेडिकल कॉलेजों का रिजल्ट भी काफी अच्छा नहीं है। इसी वजह से बच्चे यूक्रेन में जाकर चिकित्सीय शिक्षा भी कर रहे हैं।