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पितृ अमावस्या: हरिद्वार में उमड़ी भारी भीड़, हरकी पैड़ी सहित श्रद्धालुओं से खचा-खच भरे गंगा घाट, तस्वीरें
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 06 Oct 2021 12:58 PM IST
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पितृ अमावस्या पर हरिद्वार में भीड़
- फोटो : अमर उजाला
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पितृ अमावस्या पर तीर्थनगरी हरिद्वार, ऋषिकेश में गंगा स्नान और तपर्ण के लिए भक्तों की भारी भीड़ पहुंची। हरकी पैड़ी सहित हर गंगा घाट भक्तों से गुलजार रहे। बुधवार को तड़के से ही स्नान और पितृ तर्पण का दौर जारी हो गया था। उत्तराखंड के साथ ही विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु हरिद्वार और ऋषिकेश पहुंचे।
वहीं सुबह से ही नारायणी शिला पर पूजा अर्चना करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। लेकिन कोरोना महामारी को देखते हुए कपाट बंद मिले। इस वजह से श्रद्धालु परेशान हुए। कपाट सुबह 11 बजे के बाद खुले। सर्वपितृ अमावस्या पर पानी में तिल मिलाकर नहाने और पीपल में कच्चा दूध चढ़ाने से पितर प्रसन्न होते हैं। इस दिन श्राद्ध, तर्पण, पूजा पाठ और दान की परंपरा है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है। जिनके परिजनों को पितरों की देहांत तिथि ज्ञात नहीं होती है। अथवा भूल चुके हैं। कहते हैं कि इस दिन श्राद्ध करने से भोजन पितरों को स्वत: मिल जाता है।
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पितृ अमावस्या पर हरिद्वार में भीड़
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पितरों को अर्पित किया गया भोजन उस रूप में परिवर्तित हो जाता है। जिस रूप में उनका जन्म हुआ होता है। अगर मनुष्य योनि में हो तो अन्न रूप में उन्हें भोजन मिलता है। यदि पशु योनि में हो तो घास रूप, नाग योनि में वायु रूप और यक्ष योनि में पान के रूप में भोजन पहुंचाया जाता है।
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पितृ अमावस्या पर हरिद्वार में भीड़
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मान्यता है कि श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद मिलता है। ज्योतिषाचार्य आचार्य देवेंद्र प्रसाद भट्ट रानीपोखरी ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पितरों के लिए बनाए गए भोजन से पहले पंचबली भोग लगाया जाता है।
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पितृ अमावस्या पर हरिद्वार में भीड़
- फोटो : अमर उजाला
इसमें भोजन से पहले गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवों के लिए अन्न निकाला जाता है। इसके साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। कहते हैं कि पितरों के भोजन साफ-सुथरे वस्त्र धारण कर बनाएं।
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पितृ अमावस्या पर हरिद्वार में भीड़
- फोटो : अमर उजाला
पितृ पक्ष के आखिरी दिन पिंडदान और तर्पण की क्रिया की जाती है। शाम को दो, पांच और सोलह दीपक जलाने की भी मान्यता है। ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते है।
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