भगवान शिव का यह धाम अपना एक रोचक इतिहास संजोए हुए है। इस मंदिर की खासियत है कि यहां एक महीने में ही इतने तीर्थयात्री आते हैं, जितनी पूरी चारधाम यात्रा में नहीं आ पाते। जानिए, इस मंदिर का रहस्य...
हम बात कर रहे हैं ऋषिकेश में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के बारे में। आगामी नौ जुलाई से कांवड़ यात्रा शुरू होने वाली है। एक महीने में ही यहां इतनी बड़ी संख्या में कांवड़ आते हैं कि आप गिनती तक नहीं कर सकते। यह मंदिर कावंड़ों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
पौराणिक मान्यता है कि यही वो स्थान है जहां भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष को अपने कंठ में धारण कर तपस्या की थी। जहर के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया था। यहीं से भगवान शिव नीलकंठ महादेव कहलाये थे।
मणि कूट पर्वत के शीर्ष पर स्थित भगवान शिव का पौराणिक नीलकंठ धाम जहां सावन के महीने में बड़ी संख्या में शिव भक्त कावड़ लेकर जलाभिषेक के लिए पहुंचते है। मान्यता है कि विष पीने के बाद भगवान शिव के शरीर में तेज़ जलन से इस स्थान पर काफी शांति मिली थी। देवताओं के आग्रह पर इस स्थान पर भोलेनाथ ने शिवलिंग की उत्पति की। तब से देव और मानव यहां आराधना कर रहे हैं।
नीलकंठ मादेव की कावड़ यात्रा के लिए शिव भक्तों में नया जोश ओर उमंग उठने लगती है। अपने क्षेत्र से बड़ी संख्या में कावड़ लेकर यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इनका पहला पड़ाव होता है हरिद्वार, जहां हरकी पौड़ी पर स्नान करके ये आगे ऋषीकेश पहुंचते हैं।