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केदारनाथ आपदा की 5वीं बरसी: विनाश लीला की ये 12 कहानियां झकझोर देंगी

Mon, 18 Jun 2018 06:44 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 18 Jun 2018 06:44 AM IST
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kedarnath flood 2013 fifth year most scaring stories
most horrible photos of kedarnath disaster - फोटो : file photo
साल 2013 में उत्तराखंड पर आज ही के दिन कुदरत की विनाश लीला ने कोहराम मचाया था। इस महाप्रलय को पांच साल बीत गए, लेकिन भयानक मंजर को बयां करती ये कहानियां आज भी झकझोर देती हैं।
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केदारनाथ आपदा - फोटो : amar ujala

केदारघाटी में आई आपदा ने इंसानी फितरत के कई रूप सामने ला दिए थे। पहला पक्ष इंसानी फितरत लोभी की थी। जिसका नजारा गौरी गांव में दिखाई दिया। यहां पर आपदा के कारण फंसे लोगों को मदद करने के बजाए उन्हें लूटा जा रहा था। कुछ स्थानीय लोग मदद करने के एवज में लोगों से पैसे ले रहे थे। हवाई सेवाओं के जरिए फेंके जा रहे फूड पैकेट को भी कब्जे में करके बेच रहे थे। वहीं कुछ नेपाली मजदूरों द्वारा तीर्थ यात्रियों के जेवरात, कपड़े व सामान लूटने की घटना भी सामने आई। एक छोटी मदद करने के लिए भी हजार रुपये तक मांग रहे थे। लेकिन क्षेत्र में कुछ लोग ऐसे भी थे जो अतिथि देवों भव: की कल्पना को चरित्रार्थ कर रहे थे। ऐसे ही एक इंसान हैं पावर हाऊस सोनप्रयाग में तैनात दर्शन लाल गैरोला। आपदा के वक्त अतिवृष्टि व मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ के कारण 17 जून को लगभग तीन हजार तीर्थ यात्री सोनप्रयाग व मुंडकट्या के बीच फंस गए थे। सोन गंगा नदी का पुल बहने से फंसे लोगों को नदी पार करने में दिक्कतें हो रही थी। लोगों की स्थिति को देखते हुए श्री गैरोला का दिल पसीज गया और उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर मदद की ठानी। एक रस्सी के सहारे नदी के दूसरे छोर पर खड़े लोगों के पास तक कुल्हाड़ी पहुंचाई और एक बड़ा पेड़ काटने का इशारा किया। पेड़ काटने के बाद इसे पावर हाउस से अटका कर अस्थाई पुल बनावाया। जिससे फंसे लोग आर-पार हो पाए। 

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केदारनाथ आपदा - फोटो : amar ujala

आपदा के वक्त बदरीनाथ में होटल में पानी घुसने पर यहां ठहरे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया था। होटल में रुके सहारनपुर निवासी सविता और उसके रिटायर्ड बैंक अधिकारी पति भी सुरक्षित ठौर की तलाश में बाहर निकले। होटल के बाहर बाढ़ जैसे हालात में हर तरफ मौत की गूंज थी। सविता और उसके पति एक-दूसरे का हाथ थामे पहाड़ पर ऐसे स्थान की तलाश कर रहे थे, जहां पानी का बहाव न हो। घंटों सुरक्षित स्थान की तलाश में सुबह हो गई। पानी और मलबे के साथ आया हल्की गति का झोंका सविता के पति को लगा। वह चोटिल हो गए, साहसी सविता ने पति का हाथ नहीं छोड़ा। मलबे से बचाया तो वह अचेत थे। सहायता के लिए घंटों चीखती रही, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। पति को खो चुकी सविता ने शव को सुरक्षित जगह रखा और बारिश रुकने, मदद मिलने का इंतजार करती रही। प्रशासन की टीम ने पति के शव के साथ फफकती सविता से घर का पता और मोबाइल नंबर लिया।सविता के बेटे मुकेश नागपाल को प्रशासन ने पिता सुरेंद्र नागपाल की मौत होने, मां के जिंदा होने की सूचना दी। मुकेश देहरादून में सहस्रधारा स्थित हैलीपैड पहुंच गया था। सुबह से शाम तक बदरीनाथ जाने के लिए व्यवस्था में लगा रहा। मुकेश ने बताया कि उन्हें बदरीनाथ ले जाने के लिए दो लाख रुपये मांगे जा रहे थे। तब हैलीपैड पहुंचे पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को देखकर मुकेश हाथ जोड़कर रोने लगा। इसके बाद साकेत ने कंपनी संचालकों से उसे बदरीनाथ पहुंचाने को कहा और खुद चॉपर में सवार होकर मातली चले गए। तब जाकर मुकेश को कंपनी संचालक बदरीनाथ ले गए।

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kedarnath dham after three years of disaster - फोटो : file photo

आपदा को भंयकर मंजर देख केदारनाथ से दून पहुंची दिल्ली निवासी नेहा मिश्र ने बताया था कि 17 जून 2013 की सुबह तकरीबन छह बजे धमाके की आवाज आई। किसी को पता नहीं चला कि क्या हुआ। करीब सात बजे अचानक बचाओ-बचाओ की आवाज गूंजी। आपदा में मां, दादी और नानी को खो देने वाली नेहा ने बताया कि पानी के रूप में प्रलय दबे पांव आया। इससे पहले कि किसी को एहसास होता पानी मंदिर में तेजी से चारों तरफ घूमा और परिसर के दक्षिणी गेट को तोड़ता मौजूद श्रद्धालुओं को मलबे में दफन कर गया। मंदिर के चारों ओर 400 मीटर एरिया में मौजूद सात हजार लोगों में से एक हजार ही बचे। बचने वाले भी वे हैं जो होटलों और भवनों के ऊपर वाले तलों पर पहुंच गए थे। जल प्रलय के बाद हर तरफ केवल मलबा-ही-मलबा था। डर इतना कि कहीं पैर के नीचे कोई शव न हो। 

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most horrible photos of kedarnath disaster

आपदा के दिन तीर्थयात्री तेज बारिश के बीच गंगोत्री से लौट रहे थे कि मल्ला के पास भूस्खलन होने लगा। कुछ देर वाहन रोका तो पूरा मार्ग मलबे में पट गया। चार दिन किसी तरह खुले आसमान के नीचे काटे। अब तो बस भगवान एक बार हमें घर पहुंचा दे तो दोबारा यहां आने की नहीं सोचेंगे। यहां असुविधाएं ऐसी कि जैसे शासन-प्रशासन है ही नहीं। गंगोत्री घाटी से 25 से 30 किमी पैदल दूरी तय कर उत्तरकाशी पहुंचे रतलाम मध्यप्रदेश के 120 तीर्थयात्रियों ने अपनी पीड़ा ऐसे ही बयां की थी। यात्री दल में शामिल रामचंद्र ने बताया कि जीवन के छह दशक पार कर चुका हूं, लेकिन ऐसी त्रासदी कभी नहीं देखी। इसी दल में शामिल रमेश सोलंकी ने कहा कि भगवान एक बार हमें सकुशल घर पहुंचा दें तो दोबारा यहां आने की नहीं सोचेंगे। नलूणा में फंसे सांगानेर जयपुर के नंदकिशोर ने बताया कि जब बारिश हो रही थी, तब हमें यकीन नहीं हो रहा था कि घर जा भी पाएंगे या नहीं। पास के गांव में 25 हजार रुपये में तीन कमरे लेकर किसी तरह भूखे-प्यासे चार दिन काटे थे।

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