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केदारनाथ में 13 जून 2013 का वो मंजर, जब लाशों के ढेर और गंगा के प्रकोप से भगवान भी नहीं बच सके
Sun, 07 Feb 2021 02:29 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 07 Feb 2021 02:29 PM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड के चमोली में आई प्राकृतिक आपदा ने साल 2013 में केदारनाथ त्रासदी की याद दिला दी है। साल 2013 में उत्तराखंड में कुदरत ने कहर बरपाया था। इस महाप्रलय में लाशों के ढेर लग गए थे। हजारों लोगों की मौत हो गई थी। जबकि हजारों लोग लापता हो गए थे, जिनका आज भी कुछ पता नहीं चल पाया है। आठवीं शताब्दी का शिव मंदिर भी इस आपदा की वजह से क्षतिग्रस्त हुआ था।
फाइल फोटो
केदारनाथ में जून 2013 को क्या हुआ था
13 से 17 जून के बीच उत्तराखंड में असामान्य रूप से बारिश हो रही थी। इसकी वजह से चोराबारी ग्लेशियर पिघलकर मंदाकिनी में गिरने लगा। नतीजतन नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा और बहाव भी तेज हो गया। इससे बनी बाढ़ का असर उत्तराखंड के साथ ही हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी नेपाल में भी हुआ। इस भयंकर बाढ़ की वजह से भूस्खलन भी हुआ, जिससे जानमाल को बेहिसाब नुकसान पहुंचा।
13 से 17 जून के बीच उत्तराखंड में असामान्य रूप से बारिश हो रही थी। इसकी वजह से चोराबारी ग्लेशियर पिघलकर मंदाकिनी में गिरने लगा। नतीजतन नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा और बहाव भी तेज हो गया। इससे बनी बाढ़ का असर उत्तराखंड के साथ ही हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी नेपाल में भी हुआ। इस भयंकर बाढ़ की वजह से भूस्खलन भी हुआ, जिससे जानमाल को बेहिसाब नुकसान पहुंचा।
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माना जाता है कि इस त्रासदी में लगभग 5000 लोगों की मौत हुई थी। उस समय आपदा में 4200 से ज्यादा गांवों का संपर्क टूट गया था। बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए थे। 11 हजार से ज्यादा भवनों को आंशिक नुकसान पहुंचा था। 172 छोटे-बड़े पुल बह गए थे और कई कई सौ किलोमीटर सड़कों का अस्तित्व खत्म हो गया था। 1308 हेक्टेयर कृषि भूमि को आपदा ने लील लिया था। कुदरत के कहर ने नौ राष्ट्रीय राजमार्ग, 35 स्टेट हाई-वे, 2385 सड़कें, 86 मोटर पुल, 172 बड़े और छोटे पुल बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए थे।
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- फोटो : अमर उजाला
मां गंगा ने रौद्र रूप धारण किया तो उसी में समा गई थी शिव की मूर्ति
आठवीं शताब्दी का शिव मंदिर भी इस आपदा की वजह से क्षतिग्रस्त हुआ था। गंगा ने जब रौद्र रूप धारण किया था तो विश्व पटल पर अपना स्थान बना चुकी भगवान शिव शंकर की मूर्ति भी उसी गंगा में विलीन हो गई थी। हालांकि आज इसे पुन: स्थापित कर दिया गया है।
आठवीं शताब्दी का शिव मंदिर भी इस आपदा की वजह से क्षतिग्रस्त हुआ था। गंगा ने जब रौद्र रूप धारण किया था तो विश्व पटल पर अपना स्थान बना चुकी भगवान शिव शंकर की मूर्ति भी उसी गंगा में विलीन हो गई थी। हालांकि आज इसे पुन: स्थापित कर दिया गया है।
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लापता लोगों की ढूंढखोज का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था ऋषिकेश
2013 में केदारनाथ आपदा ने पहाड़ जाने वाली तमाम सड़कों को उखाड़ फेंका था। आपदा के निशान इस शहर को भी मिले, लेकिन इनके घाव उतने गहरे नहीं थे, जितना सीना पहाड़ का छलनी हुआ था। जब भी आपदा में बिछड़े अपनों को ढूंढने के लिए कोई देश के कोने-कोने से पहाड़ चढ़ने के लिए उतरता उसके कदम तीर्थनगरी आकर ठहर जाते थे। वजह, इससे आगे सड़कें पूरी तरह छलनी थीं।
2013 में केदारनाथ आपदा ने पहाड़ जाने वाली तमाम सड़कों को उखाड़ फेंका था। आपदा के निशान इस शहर को भी मिले, लेकिन इनके घाव उतने गहरे नहीं थे, जितना सीना पहाड़ का छलनी हुआ था। जब भी आपदा में बिछड़े अपनों को ढूंढने के लिए कोई देश के कोने-कोने से पहाड़ चढ़ने के लिए उतरता उसके कदम तीर्थनगरी आकर ठहर जाते थे। वजह, इससे आगे सड़कें पूरी तरह छलनी थीं।