केदारनाथ आपदा के एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पैदल मार्ग पर बसाए गए नए पड़ावों की सुरक्षा तो दूर, इसके लिए योजना तक नहीं बन पाई है। एवलांच जोन में होने के कारण यहां निरंतर भूमिगत पानी रिस रहा है, जिससे भूधंसाव हो रहा है। साथ ही पड़ावों के ठीक नीचे से बह रही मंदाकिनी नदी के तेज बहाव से भूमि कटाव से भूस्खलन का दायरा बढ़ रहा है।16/17 जून 2013 की आपदा ने केदारनाथ में व्यापक तबाही मचाई थी।
Kedarnath: आपदा के बाद नए पैदल मार्ग पर बसाए पड़ावों की सुरक्षा भगवान भरोसे, लिनचोली सहित इन जगह पर भू-कटाव
रामबाड़ा से केदारनाथ तक पूरा नया मार्ग एवलांच जोन में हैं। यही नहीं, इन पड़ावों के ठीक नीचे से बह रही मंदाकिनी नदी के बहाव से हो रहे कटाव से भूस्खलन हो रहा है, जिससे कभी भी किसी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता है।
यही नहीं, यहां एमआई-26 हेलिपैड के ठीक ऊपर भैरवनाथ मंदिर पहाड़ी भी भूस्खलन से दरक रही है, बावजूद यहां सुरक्षा कार्य तो दूर योजना तक नहीं बन पाई है।
पर्यावरणविद जगत सिंह जंगली का कहना है कि केदारनाथ पुनर्निर्माण के साथ नए मार्ग पर सुरक्षा के इंतजाम जरूरी है। केदारनाथ से रामबाड़ा तक मंदाकिनी नदी के देानों तरफ सुरक्षा दीवार बनाई जाए और क्षेत्र में पनपने वाली वनस्पतियां उगाई जा, जिससे भूस्खलन के दायरे को नियंत्रित किया जा सके। साथ ही पड़ावों पर स्थायी निर्माण न किया जाए, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र काफी ढलान वाला है, जो सुरक्षित भी नहीं है।
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आपदा के बाद केदारनाथ तक पहुंचने के लिए मंदाकिनी नदी के दाई तरफ से जो नौ किमी रास्ता बनाया गया है, वह एवलांच जोन में है, जिस कारण यहां निरंतर खतरा है। एवलांच क्षेत्र में स्थायी निर्माण करना जोखिम भरा है, इसलिए जरूरी है कि हल्का निर्माण किया जाए और भूमिगत पानी के रिसाव को कम करने के लिए यहां तकनीक के आधार पर ठोस प्रबंधन किया जाए। - प्रो. यशपाल सुंदरियाल, पूर्व विभागाध्यक्ष भू-विज्ञान, एचएनबीकेविवि श्रीनगर गढ़वाल