उत्तराखंड को ऐसे ही देवभूमि नहीं कहा जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार समस्त 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास यहीं है।
इन सभी देवी-देवताओं का हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। माना जाता है कि ये देवी-देवता हर कष्ट का निवारण करने के लिये किसी पवित्र शरीर के माध्यम से लोगों की बीच आते हैं। इस प्रक्रिया को जागर कहते हैं।
और जिन 'डंगरियों' पर ये पवित्र आत्माएं अवतरित होते हैं उन्हें 'देवताओं की सवारी' कहा जाता है।
जागर का मतलब होता है 'देवताओं को जगाना'। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ग्राम देवताओँ की पूजा की जाती है, जैसे गंगनाथ, गोलु, भनरीया, काल्सण आदि। उत्तराखंड के लोग ग्राम देवताओं को जगाने के लिए जागर लगाते हैं।
जागर मंदिर अथवा घर में कहीं भी लगाया जा सकता है। जागर "बाइसी" तथा "चौरास" दो प्रकार के होते हैँ. बाइसी बाईस दिनों तक जागर किया जाता है। कहीं-कहीं दो दिन का जागर को भी बाईसी कहा जाता है। चौरास मुख्यतया चौदह दिन तक चलता है। पर कहिं कहिं चौरास को चार दिनों में ही समाप्त किया जाता है।