कुंभ मेलों पर स्नान के लिए उन साधुओं के बीच खूनी संघर्ष हुआ करता था, जिनके दर्शन करने देशभर से लाखों श्रद्धालु आते थे। पहले कौन अखाड़ा नहाएगा, इसको लेकर भीषण संघर्ष होता था। कुंभ मेलों में हुए खूनी संघर्षों के बाद अंग्रेजों को अखाड़ों के स्नानक्रम के साथ स्नान समय भी निर्धारित करना पड़ा था।
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हरिद्वार कुंभ
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
वर्ष 1998 के हरिद्वार कुंभ में जूना और निरंजनी अखाड़े के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। संघर्ष की वजह स्नान में अधिक समय लेना था। आमतौर पर ऐसे संघर्ष 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक हर बार होते रहे। 18वीं और 19वीं शताब्दी के स्नान संघर्ष इतने भयानक थे कि प्रत्येक कुंभ में हजारों साधु मारे गए और घायल होते थे। हरिद्वार और प्रयाग में स्नान की जगह न मिलने पर जबरदस्त संघर्ष होते थे।
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गंगा स्नान
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
इसी तरह नासिक और उज्जैन के कुंभ में भी संघर्षों का उल्लेख मिलता हैं। 1903 के हरिद्वार कुंभ में नागा साधुओं और बैरागियों के बीच संघर्ष हुआ। तब अंग्रेज सरकार ने सभी अखाड़ों के श्रीमहंतों को बुलाकर बात की। उस समय अखाड़ा परिषद जैसी कोई इकाई नहीं थी। सभी अखाड़ों से गहन मंथन के बाद अखाड़ों के स्नानक्रम निर्धारण का काम शुरू हुआ जो 1938 के हरिद्वार कुंभ में लिखित रूप ले सका।
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कुंभ
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
अंग्रेजों ने चारों कुंभ नगरों में अखाड़ों के अलग क्रम एवं स्नान समय निर्धारित किया। उदाहरण के लिए हरिद्वार कुंभ में पहले शाही स्नान पर निरंजनी, दूसरे शाही स्नान पर जूना और तीसरे शाही स्नान पर महानिर्वाणी अखाड़ा सबसे पहले स्नान करते हैं। आखिरी चौथा स्नान केवल बैरागी अखाड़ों के लिए तय है। सभी कुंभ नगरों के स्नानक्रम अलग-अलग हैं। इसके विपरीत नासिक कुंभ में बैरागी अखाड़े नासिक और संन्यासी नागा अखाड़े त्रयम्बकेश्वर में स्नान करते हैं।
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हरिद्वार कुंभ
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
बता दें कि कुंभ मेले की शुरुआत रमता पंचों के नगर प्रवेश से होती है। देश के विभिन्न गांवों और शहरों में तीन बरस भ्रमण करने के बाद जिस दिन अखाड़ों की अलग-अलग भ्रमणशील जमातें कुंभ आयोजन वाले नगर में पहला कदम रखती हैं, उसी दिन से अखाड़े के सांस्कृतिक पृष्ठ खुल जाते हैं। एक-एक कर सभी 13 अखाड़ों के नगर प्रवेश और फिर पेशवाई के माध्यम से अखाड़ा प्रवेश के बाद कुंभ के शाही स्नान शुरू होते हैं।