12 साल पर भ्रमण पर निकलीं कर्णप्रयाग की मां उमा देवी सोमवार को विधि-विधान के साथ अपने मूल मंदिर के गर्भगृह में विराजमान हो गईं। मां को विदा करते हुए भक्त रो पड़े। इससे पहले देवी मंदिर परिसर में खूब नाची, रोई और भक्तों के गले मिलीं। मंदिर परिसर जागरों, मांगल गीत और देवी उमा के जयकारों से गुंजायमान रहा। जब तक देवी की डोली मंदिर परिसर में रही, तब तक कई देवी-देवताओं के पश्वा देवनृत्य करते रहे। अब उमा देवी की डोली 12 साल बाद गर्भगृह से बाहर आकर फिर भ्रमण पर निकलेंगी।
12 साल में सिर्फ एक बार बाहर निकलती है ये देवी, भगवान शिव से जुड़ा है रहस्य
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सोमवार सुबह पांच बजे ब्रह्ममुहूर्त में पुजारी राजेंद्र पुजारी, अजय पुजारी, गोविंद, रविंद्र, हरीश पुजारी, प्रदीप ने मंदिर में पूजा शुरू की। साथ ही मंदिर के गर्भ गृह की मूर्तियों और मंदिर परिसर में तीन दिनों से विराजमान उमा देवी की डोली का शृंगार किया। साढ़े आठ बजे से साढ़े 11 बजे तक दुर्गा सप्तशती, रुद्री, चंडी, विष्णुसहस्त्रनाम सहित आदि पाठों से देवी-देवताओं का आह्वान किया।
तीन दिनों से चल रहा यज्ञ का समापन भी हुआ। इसके बाद देवी की डोली लाटू देवता के निशाण के साथ ही नारायण और उमा देवी के निशाणों की पूजा की गई। इसके बाद उमा देवी की डोली निशाणों के साथ मंदिर प्रांगण में पहुंची। दोपहर 12 बजे देवी की डोली और निशाण ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। साढ़े 12 बजे देवी उमट्टा धार पहुंची। इसके बाद देवी डिम्मर गांव के समीप पहुंची। मैतियों से मिलने के बाद देवी दोपहर दो बजे मंदिर परिसर पहुंची। मंदिर में देवनृत्य के बाद देवी की डोली ने पौने तीन बजे गर्भ गृह में प्रवेश किया।
मां उमा देवी के डोली यात्रा के समापन पर मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। देवी के दर्शनों के लिए रविवार शाम से ग्रामीण पहुंचने शुरू हो गए थे। सोमवार शाम देवी के गर्भ गृह में प्रवेश करने के बाद पांच बजे तक मंदिर परिसर में डटे रहे। इस दौरान श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन भी किया गया।
मां उमा का मायका डिम्मर माना जाता है। मान्यता है कि डिम्मर के एक बुजुर्ग के सपने में उमा देवी बाल रूप में प्रकट हुईं। तब से डिम्मर को देवी का मायका माना जाता है, जबकि कपीरी में शिव का विशाल छांतेश्वर महादेव मंदिर है। बताया जाता है कि छांतेश्वर महादेव (शिव) की पत्नी उमा थीं। इसलिए कपीरी पट्टी के गांव मां उमा के ससुराली माने जाते हैं। कपीरी के जस्यारा, कंडारा, किमोली, बणसोली, डोंठला सहित 50 से अधिक गांवों के लोग देवी की दिवारा यात्रा को पुजारियों के साथ निभाते हैं।