भारत के इस गांव में बेटियों की विदाई के लिए अनोखी परंपरा अपनाई जाती है। यहां बेटियों की विदाई डोली में नहीं बल्कि घोड़े पर की जाती है। जी हां, सुनने में अटपटा जरूर लगे, लेकिन यह सच है। आगे जानिए इसके पीछे की वजह।
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लाटू देवता
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, उत्तराखंड के चमोली का वांण गांव का लाटू मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए रहस्य बना है। इस मंदिर के अंदर क्या है, आज भी कोई इस बारे में नहीं जानता। यह पहला ऐसा मंदिर है, जिसके अंदर कोई भी श्रद्धालु प्रवेश नहीं करता। लाटू को मां नंदा (देवी पार्वती) का धर्म भाई माना जाता है।
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घोड़े पर विदाई
- फोटो : अमर उजाला
वांण गांव की एक और विशेष परंपरा है। ग्रामीण मां नंदा देवी को डोली में बिठाकर श्री नंदा देवी राजजात यात्रा में कैलाश ले जाते हैं, इसलिए अपनी आराध्य मां नंदा के सम्मान में ग्रामीण अपनी बेटियों की शादी में दुल्हन को डोली के बजाय घोड़े पर बैठाकर विदा करते हैं।
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घोड़े पर विदाई
- फोटो : अमर उजाला
देवाल ब्लाक में समुद्रतल से साढे़ आठ हजार फीट की ऊंचाई पर ब्लाक के अंतिम गांव वांण से करीब 800 मीटर दूर स्थित है लाटू देवता का मंदिर। कहा जाता है कि एक बार मां नंदा के दर्शन के लिए कन्नौज के गौड़ ब्राह्मण लाटू कैलाश पर्वत की यात्रा कर रहे थे। वे वांण गांव पहुंचे।
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लाटू देवता
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
इस दौरान उन्हें तेज प्यास लगी तो उन्होंने पास में ही स्थित एक घर पर पहुंचकर वहां रह रही महिला से पीने का पानी मांगा। महिला ने बताया कि उसकी कुटिया में तीन घड़े रखे हैं। इनमें एक घड़े में पानी है, उससे पानी पी लें, लेकिन लाटू ब्राह्मण भूलवश पानी के घड़े की जगह दूसरे घड़े में रखी मदिरा पी गए।