मौसम परिवर्तन के चलते साल दर साल बदल रहे गंगोत्री ग्लेशियर के मुहाने व गंगा नदी के उद्गम गोमुख में अब दो नए मुख बन गए हैं। पूर्व में गोमुख के एक मुहाने से निकलने वाली गंगा नदी की धारा अब दो नए मुहानों से भी निकलने लगी है। गोमुख जाने वाले पर्यटक एवं श्रद्धालु तीन मुहाने बनने से गंगोत्री ग्लेशियर के अस्तित्व के प्रति चिंतित हैं, जबकि विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक प्रक्रिया बता रहे हैं।
उद्गम गोमुख में अब गंगा के हुए तीन मुख, विशेषज्ञ बता रहे हैं इसे प्राकृतिक प्रक्रिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
टूट रहे हिमखंड बने वजह
गोमुख में बने एक मुहाने से गंगा नदी की धारा निकलती थी, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में बीते कुछ साल से हो रही भारी बारिश व भूस्खलन ने गोमुख का स्वरूप ही बदल दिया है। वहीं हाल ही में गोमुख यात्रा से लौटे देहरादून निवासी ट्रैकर अंशुल बडोनी ने गोमुख में आ रहे बदलावों को लेकर नया खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि लगातार टूट रहे हिमखंडों के कारण गोमुख में अब दो नए मुख बन गए हैं, जिसके चलते गंगा की धारा अब तीन मुहानों से निकल रही है। ग्लेशियर में जमा मलबे के कारण गोमुख के सामने व पीछे की ओर बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं, जिससे गंगोत्री ग्लेशियर के भारी मात्रा में टूटने की आशंका बढ़ गई है।
मौसम से बदला उच्च हिमालय का पर्यावरण तंत्र
उधर, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के ग्लेशियोलॉजिस्ट डीपी डोभाल ने इसे प्राकृतिक प्रक्रिया बताया है। हालांकि उन्होंने घटना के पीछे बीते वर्ष गोमुख में बनी झील व मौसम परिवर्तन का हाथ होने की संभावना भी जताई है। उन्होंने कहा कि गोमुख में जमा बर्फ सेडिमेंट (छोटे पत्थर) के ऊपर टिकी है, जिससे गंगोत्री ग्लेशियर की अन्य परतों के मुकाबले काफी कच्ची है। ऐसे में गोमुख क्षेत्र में बीते कुछ सालों से हो रही भारी बारिश व भूस्खलन के कारण यह बर्फ आसानी से टूट जाती है। हालांकि बिना सर्वे किए मुहाने बनने के कारणों के बारे में स्पष्ट नहीं कहा जा सकता।
कम बर्फबारी भी अहम कारण
ग्लेशियोलॉजिस्ट डीपी डोभाल ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग ने उच्च हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण तंत्र में कई बदलाव किए हैं। बीते 20-30 साल की रिपोर्ट के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में पहले 4000 मीटर की ऊंचाई वाले हिस्सों तक साल में मात्र 200 मिलीमीटर तक बारिश होती थी, लेकिन आज 5000 मीटर की ऊंचाई वाले हिस्सों में भी साल में 400 मिमी तक बारिश दर्ज की जा रही है। बर्फबारी कम होने से स्नो (कच्ची बर्फ) को आइस (पक्की बर्फ) बनने का मौका नहीं मिल रहा है। इससे स्नो लाइन पीछे खिसकने लगी है और उसके स्थान पर पेड़ पौधे उगने लगे हैं।
निचले इलाकों में मच सकती है तबाही