उस दौर में राजधानी देहरादून में जनसंघ के प्रमुख लोगों में शुमार स्व. त्रिलोक चंद्र डाबर के यहां अटलजी का खासा आना-जाना था। उनके पुत्र विश्वास डाबर ने बताया कि अटलजी देहरादून आते थे तो उनके पिताजी के पास जरूर रुकते थे।
अटलजी को चाट खाने का बहुत शौक था। 1981 में अटलजी देहरादून आए तो उनके घर पर ही रुके थे। अचानक उन्होंने इंद्रसेन की अपनी पसंदीदा चाट खाने की इच्छा व्यक्त की। डाबर ने कहा कि वह पैदल ही अटलजी को लेकर तिलक रोड स्थित इंद्रसेन की चाट की दुकान पर पहुंचे। वहां बहुत भीड़ थी।
मैंने इंद्रसेन से कहा कि उनके साथ अटलजी आए हैं। चाट पहले खिला तो। इस पर इंद्रसेन ने कहा कि अगर इंदिरा गांधी खुद भी आ जाएं तो भी चाट तो नंबर से ही खिलाऊंगा। इस पर अटलजी बहुत तेजी से हंसे और उन्होंने लाइन में लगकर ही अपनी पसंदीदा चाट खाई।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी अटल बिहारी वाजपेयी खाने पीने के भी खासे शौकीन थे। वे कहा करते थे कि ब्राह्मण खाएगा नहीं तो जिएगा कैसे। हर साल हरिद्वार आने पर वे कभी इश्कलाल तो कभी ओम प्रकाश की चाट खाया करते थे। अरुण दलाल के कंधों पर हाथ रखकर वे चाट गली में जैन के गोल गप्पे भी बड़े शौक से खाते थे।
गंगा सभा के कार्यालय में बैठे हों या जयपुरिया भवन में, हरिद्वार के जनसंघ वाले उनके लिए मथुरावाले की चंद्रकला जरूर लाते थे। अटल जी को बक्खर का रस भरी और खरबूजे के बीज वाली चंद्रकला बहुत भाती थी। अटल जी के हरिद्वार आने पर उनके समर्थक तत्कालीन जनसंघी प्यारेलाल भटेजा, राममूर्ती वीर, सोमदत्त श्रोत्रिय, जय प्रकाश सरायवाले आदि उन्हें कनखल के मंगल और ज्वालापुर के इश्कलाल की चाट जरूर खिलवाते थे।