यह एक दुखद संयोग है कि बलात्कारी बाबा आसाराम ने अपने कथित आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत नैनीताल से की थी।
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यहां से शुरू हुई थी आसाराम की दीक्षा, लेकिन आश्रम में उसने किया ऐसा काम कि वहां से निकाला गया
गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल
Updated Fri, 27 Apr 2018 07:00 AM IST
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Asaram
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आसाराम
- फोटो : self
संत लीलाशाह को भले ही आसाराम गुरु मानता था पर लीलाशाह ने उसे कभी अपना चेला नहीं माना। यहां तक कि उसकी संदिग्ध गतिविधियां देखकर उसे आश्रम से ही निकाल दिया था और उसके यहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया था। आसाराम का नैनीताल में आश्रम बनाने का सपना उसके पुत्र नारायण साईं ने बाद में पूरा किया और यहां मंगोली में एक आश्रम बनाया हालांकि यह चल नहीं पाया।
आसाराम बापू
आसाराम (तब आसूमल) यहां 1960 के दशक में आया था। उसकी गतिविधियां तब भी संदिग्ध थीं। आश्रम से जुड़े लोगों के अनुसार उसका ध्यान जप-तप में कम और आश्रम कब्जाने में ज्यादा था। आसाराम कुश्ती का शौकीन था और साथियों के साथ घंटों कुश्ती के दांव-पेच आजमाता था। तब यदि आसाराम ने आश्रम से कुछ सीखने का प्रयास किया होता तो शायद वह कालांतर में बलात्कारी न बन कर वास्तविक समाजसेवा कर पाता।
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आसाराम बापू
नैनीताल में हनुमानगढ़ी के निकट लीलाशाह आश्रम की स्थापना स्वामी लीलाशाह ने 1940 में कई थी। वे यहां तप और साधना करते थे। उस दौरान वर्षों तक आश्रम के प्रबंधक रहे स्व. गणेश दत्त भट्ट ने खुलासा किया था कि आसाराम के हावभाव और तड़क भड़क से व्यथित लीलाशाह ने उसे बहुत बार समझाया लेकिन उनकी बात न मानने पर चार वर्ष बाद आश्रम से निकाल दिया था।
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आसाराम
- फोटो : SELF
यह एक विचित्र संयोग है कि जिस लीलाशाह को आसाराम अपना गुरु मानने का ढोंग करता था वे सदैव महिलाओं से दूर रहते थे। वे महिलाओं को चरण स्पर्श तक नहीं करने देते थे। स्वामी लीलाशाह ने 1973 में देह त्यागने से पहले आश्रम की जिम्मेदारी भट्ट को सौंप दी थी। 1994 में इसका प्रबंधन बदल गया।