सन बाथ और स्टीम बाथ के बारे में आपने सुना होगा, लेकिन अमर उजाला आज आपको 'फॉरेस्ट बाथ' से रूबरू कराएगा। सन बाथ की तर्ज पर ही अब उत्तराखंड में जंगल स्नान (फॉरेस्ट बाथ) के लिए भी कोशिश हो रही है।
सन बाथ और स्टीम बाथ के बाद अब जानिए क्या है 'फॉरेस्ट बाथ'
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फॉरेस्ट बाथ का सीधा सा मतलब है कि जंगल में घूमें-फिरें और ताजी आबोहवा का सेवन करें। हाल ही में एचएनबी केंद्रीय विश्वविद्यालय और केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की संयुक्त गोष्ठी में यह मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया भी गया। कहा गया कि फॉरेस्ट बाथ के जरिए प्रदेश के पर्यटन को नया आयाम दिया जा सकता है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं। वैसे फॉरेस्ट बाथ का यह तरीका जापान में खासा प्रचलित है और वहां लोग इस तरीके का इस्तेमाल रोगमुक्त होने के लिए करते हैं।
राज्यों में पर्यटन उद्योग और कौशल विकास विषय पर 28 से 30 अप्रैल तक ऋषिकेश में आयोजित गोष्ठी में फॉरेस्ट बाथ को बढ़ावा देने की वकालत की गई है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी प्रदेशों में प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और शांत वातावरण के कारण फॉरेस्ट बाथ के अलावा सन बाथ का भी आनंद लिया जा सकता है। उत्तराखंड में 3799 हजार हेक्टेयर में जंगल हैं। ऐसे में जंगल की ताजी हवा लेने और धूप के स्नान की भी यहां पर्याप्त संभावना है। अधिकांश गांव जंगलों के पास हैं। गोष्ठी में लगभग 100 विशेषज्ञों ने फॉरेस्ट बाथ को बढ़ावा देने की बात उठाई है। इसको होम स्टे योजना से भी जोड़ा जा सकता है।
ऋषिकेश में आयोजित गोष्ठी में भाग लेकर लौटे पर्यावरणविद डॉ. अजय रावत ने बताया कि शोधों से पता चला है कि फॉरेस्ट बाथ से मनोदशा साथ ही शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार होता है। समय-समय पर यदि फॉरेस्ट बाथ लिया जाए तो यह तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन को कम करता है। पश्चिमी देशों में इस पर शोध भी हो रहा है। भारत में इस पर शोध की जरूरत है। बांज, आंवला, बरगद, पीपल आदि के जंगल इसमें स्वास्थ्य के लिहाज से अधिक फायदेमंद हो सकते हैं।
क्या है फॉरेस्ट बाथ
1982 में यह शुरू किया गया था। वहां इसे सिंग रिंग योकू कहा जाता है। इसके तहत जंगल में कुछ समय तक आराम किया जाता है। हमारे यहां संन्यास और वानप्रस्थ आश्रम का यह हिस्सा रहा है। वर्तमान में हरेला और घुघुतिया पर्व भी इससे जुड़ते हैं।