2 अप्रैल 2011 के दिन नहीं रहा आंसुओं पर काबू, तेंदुलकर का सपना हुआ पूरा
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एमएस धोनी के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल चुकी थी। 2011 विश्व कप में उसे जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था और इसका दबाव टीम इंडिया के प्रत्येक खिलाड़ी के चेहरे पर स्पष्ट रूप से दिख रहा था। बहरहाल, टीम इंडिया ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया और फाइनल में प्रवेश किया। फैंस को डर था कि कही 2003 विश्व कप की कहानी रिपीट न हो जाए जब ऑस्ट्रेलिया ने भारत को फाइनल में 125 रन से हराकर खिताब जीता था। मगर धोनी की सेना एक विशेष मकसद के साथ मैदान पर उतरी थी।
धोनी ब्रिगेड का लक्ष्य महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का सपना पूरा करना था। सचिन ने अपने 24 साल के करियर में लगभग बल्लेबाजी की सारी उपलब्धियां हासिल की, लेकिन विश्व कप की ट्रॉफी उनकी इस लिस्ट में शामिल नहीं थी। बहरहाल, उनका सपना पूरा नहीं होने पर पहला संकट तब मंडराते हुए दिखा जब श्रीलंका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। वैसे बता दें कि इस मैच में दो बार टॉस हुआ था। पहली बार में श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा ने ध्यान ही नहीं दिया कि उन्होंने हेड कॉल किया है या फिर टेल। वैसे, श्रीलंका को भी अपने महान ऑफस्पिनर मुथैया मुरलीधरन को यादगार विदाई देना थी, जो अपना आखिरी वन-डे इंटरनेशनल मैच खेल रहे थे।
टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने वाली श्रीलंका ने अनुभवी बल्लेबाज महेला जयवर्धने (107) के शतक की मदद से निर्धारित 50 ओवर में 6 विकेट खोकर 274 रन बनाए। थिसारा परेरा ने (22*) की तेजतर्रार पारी ने श्रीलंका को सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचाया और टीम इंडिया के फैंस की धड़कने तेज कर दी। टीम इंडिया की तरफ से जहीर खान और युवराज सिंह ने दो-दो विकेट लिए जबकि हरभजन सिंह को एक सफलता मिली। इसके बाद टीम इंडिया के फैंस तब और घबरा गए जब वीरेंदर सहवाग बिना खाता खोले पहले ही ओवर में पवेलियन लौट गए।
अपने सपने को पूरा करने की जुगत में लगे सचिन तेंदुलकर ने दो आकर्षक बाउंड्री जरुर लगाईं, लेकिन 18 रन बनाकर वो भी पवेलियन लौट गए। इसके बाद गौतम गंभीर (97), एमएस धोनी (91*), विराट कोहली (36) और युवराज सिंह (19*) ने टीम इंडिया को चैंपियन बनाते हुए सचिन सहित फैंस को सबसे बड़ा गिफ्ट दिया। जीत के बाद क्रिकेटरों समेत फैंस की आँखों में खुशी के आंसू देखने को मिले। कुछ देर बाद टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने सचिन तेंदुलकर को अपने कंधों पर बैठाकर मैदान का चक्कर लगवाया। ये दिन भारतीय क्रिकेट फैंस के दिलों में आज भी ताजा है। ये भारत की उपलब्धि मानी जाती है।