15 अगस्त 1947 यानी वह तारीख जिस दिन हमारा देश लगभग 200 सालों की गुलामी के बाद आजाद हुआ। आजादी के पहले तक, भारत में क्रिकेट सिर्फ राजघरानों और रईसों तक ही सीमित था। इस खेल में वैसे तो हमें सभी सफलताएं आजादी के बाद ही मिल पाई, लेकिन सबसे सुखद तस्वीर आई लंबे सूखे के बाद, जब हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजों को उन्हीं के खेल में पटका।
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विजय हजारे
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बात 1951-52 की है। जब नील हॉवर्ड और डोनाल्ड कार की अगुवाई में इंग्लिश टीम भारत दौरे पर आई। इस सीरीज के लिए टीम इंडिया के कप्तान चुने गए विजय हजारे। सीरीज में पांच टेस्ट खेले जाने थे। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में हुए शुरुआती मुकाबले ड्रॉ पर छूटे थे। कानपुर का चौथा टेस्ट भारत हार गया।
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भारत बनाम इंग्लैंड 1951
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अब श्रृंखला के चार टेस्ट खेले जा चुके थे और इंग्लिश टीम 1-0 से आगे चल रही थी। अभी तक भारतीय खिलाड़ियों का निजी प्रदर्शन तो शानदार रहा था, लेकिन एक टीम के रूप में भारत अपनी साख नहीं बना पाया था। पांचवां और आखिरी टेस्ट चेन्नई में होना था। भारत के पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने को पूरा आकाश था।
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पॉली उमरीगर
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पिछले चार टेस्ट में बुरी तरह फेल होने रहने वाले पॉली उमरीगर को इस टेस्ट से ड्रॉप कर दिया गया था, उनकी जगह टीम में शामिल किए गए अधिकारी के घायल होने के कारण उमरीगर की टीम में दोबारा एंट्री हुई और उन्होंने ऐन मौके पर शतक ठोक दिया और इस तरह भारत ने अपने इतिहास का पहला टेस्ट आठ रन से जीता।
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लाला अमरनाथ
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यह प्रभावशाली जीत थी। इस भारतीय टीम में मुश्ताक अली, अमरनाथ जैसे कई अनुभवी खिलाड़ी थे तो पंकज राय, गोपीनाथ, दिवेचा और फड़कर जैसे युवा जांबाज भी थे। कभी भारत पर शासन करने वाले इंग्लैंड को उसी के राष्ट्रीय खेल में हराकर आजाद भारत के इन खिलाड़ियों को कितनी खुशी और कितना गर्व हुआ होगा इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते।