मानदंड सामान्य नहीं हैं
एनआरएन ने सप्ताह में 70 घंटे काम करने की वकालत की, जबकि एसएनएस ने कहा कि सप्ताह में 90 घंटे काम करना चाहिए। मैं यह मानता हूं कि उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह उनके विचार से सही था। एनआरएन ने कहा, "भारत की कार्य उत्पादकता पूरे विश्व में सबसे कम में से एक है, इसलिए मेरा अनुरोध है कि हमारे युवाओं को यह कहना चाहिए कि यह मेरा देश है और मैं सप्ताह में 70 घंटे काम करना चाहता हूं।" जब इस टिप्पणी पर बहस शुरू हुई तो उन्होंने पीछे हटने से मना कर दिया। एसएनएस ने एक वीडियो में कहा, ''ईमानदारी से कहूं तो मुझे खेद है कि मैं रविवार को आपसे काम नहीं करा पा रहा हूं। मुझे आपसे रविवार को काम कराने में बहुत खुशी होगी। मैं रविवार को काम करता हूं।
कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए दिन में 8 घंटे काम करने वाला कानून सबसे पहले जर्मनी में साल 1918 में बना। तब से ‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम’ करने का मानदंड वैश्विक हो गया। हालांकि, मैं ऐसे किसी को नहीं जानता, जो ‘मनोरंजन’ पर प्रतिदिन 8 घंटे खर्च करता हो। मेरा मानना है कि ‘मनोरंजन’ में खाना, कपड़े धोना, व्यायाम करना, खेल खेलना, फिल्में देखना, अखबार और किताबें पढ़ना, खरीदारी करना, बातचीत करना, गप्पें मारना आदि शामिल हैं। अगर आप इस तरह से देखें तो मनोरंजन के लिए 8 घंटे का समय काफी नहीं लगता है।
ज्यादातर श्रमिक एक ही काम को दोहराते रहते हैं। कुछ नए हुनर सीखकर अधिक कठिन काम करते हैं। जब डेस्क का काम अधिक होने लगा तो नियोक्ता ने 8 घंटे के मानदंड को अपना लिया। डेस्क पर भी अधिकांश समय एक ही काम बार-बार होता है, इसलिए मैं इस बात से सहमत हूं कि बहुसंख्यक कर्मचारी या श्रमिक 8 घंटे के मानदंड को अपना चुके हैं। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और एआई के आने के साथ काम के घंटे कम हो सकते हैं। उन्हें अधिक समय तक काम करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अधिक उत्पादक बनने के लिए उपकरणों, प्रौद्योगिकी और प्रणालियों की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि एनआरएन और एसएनएस की टिप्पणियां ऐसे श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए नहीं थीं।
इसके विपरीत किसान, उनमें भी खासकर स्वरोजगार वाले किसान 8 घंटे वाले मानदंड का पालन नहीं करते हैं। खेती-बाड़ी के काम में तो पहले दिन से ही 10 या 12 घंटे तक काम करने की जरूरत रहती है। इसी तरह डॉक्टर, वकील, जज, आर्किटेक्ट, वैज्ञानिक, अभिनेता आदि पेशेवर दिन में सिर्फ 8 घंटे काम नहीं करते। मैं ऐसे पेशेवरों को जानता हूं, जो 12 घंटे से अधिक काम करते हैं और यहां तक कि शनिवार और रविवार को भी। कुछ सफल पेशेवर काम के लंबे घंटों को लेकर शिकायत करते हैं, जबकि उन्होंने स्वेच्छा से उसे अपनाया है। इसलिए तथाकथित मानदंड सभी मनुष्यों पर लागू होने वाला एक समान नियम नहीं है।
खुद के बारे में सोचें
मुझे दिन में लंबे समय तक काम करने में मजा आता है, लेकिन ‘काम’ की मेरी परिभाषा में कानून का अभ्यास करना, संसदीय कार्य, पढ़ना, लिखना, बोलना, जनता की बात सुनना, पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करना और चुनिंदा सामाजिक कार्यों में भाग लेना शामिल है। मैं हर उस घंटे को काम-काज का मानता हूं, जब मैं सो नहीं रहा होता हूं। कार्य और जीवन संतुलन एक ऐसी चीज है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं को खोजना होता है। मुझे खुशी है कि मैंने अपना संतुलन खोज लिया है।
मुझे लगता है कि अपने काम में भारी सफलता हासिल कर शीर्ष पर पहुंचने के बाद एनआरएन और एसएनएस को भारतीयों के लिए काम के ‘लंबे’ घंटों के बारे में बोलने का हक है। मुझे नहीं लगता कि इसका वित्तीय पुरस्कारों से कोई लेना-देना है, जैसा कि कुछ ट्रोल्स और मीम्स ने संकेत दिया है। मैं ऐसे कई पुरुषों और महिलाओं को जानता हूं, जो बड़ी आय या बड़ी संपत्ति से अप्रभावित रहते हैं- वे संयमी जीवन जीते हैं, सादा खाना खाते हैं, मदिरा का सेवन नहीं करते, साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं, उनमें कोई दिखावटीपन नहीं होता, वे दयालु और विनम्र होते हैं। मेरा मानना है कि एनआरएन और एसएनएस आने वाली युवा पीढ़ी को यह सबक सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे कि लंबे समय तक किया गया उत्पादक कार्य ही एक विकासशील देश को वास्तव में समृद्ध बनाएगा और लाखों लोगों के जीवन में सुधार लाएगा।
मेरे विचार में एनआरएन और एसएनएस द्वारा की गई टिप्पणियों में कुछ भी विवादास्पद नहीं था। कार्य और जीवन के बीच संतुलन बिठाने की सोच कोई बुरी बात नहीं हो सकती है।