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क्या इससे बेहतर रास्ता नहीं हो सकता?: एमडीआर के बीच सामने आया लागत और डिजिटल अर्थव्यवस्था का सवाल

Fri, 18 Sep 2026 06:23 AM IST
Pravin Kaushal प्रवीण कौशल
Updated Fri, 18 Sep 2026 06:23 AM IST
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सार
यह सही है कि यूपीआई व्यवस्था के संचालन को पैसे की कमी झेलने नहीं दी जा सकती, पर यह भी एक तथ्य है कि भारत ने यूपीआई के जरिये जो हासिल किया, वह दुर्लभ है। उसने ऐसी सार्वजनिक भुगतान व्यवस्था बनाई है, जिसका अध्ययन पूरी दुनिया करती है। यह सहेजने लायक है, भले ही इसके लिए कोई कीमत चुकानी पड़े।
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यूपीआई शुल्क से किसका फायदा और किसका नुकसान? - फोटो : amarujala.com

विस्तार

ज्यादातर भारतीयों के लिए यूपीआई से भुगतान करना ऐसा रहा है, मानो कुछ खर्च ही नहीं हुआ। बस क्यूआर कोड स्कैन किया, पिन डाला और भुगतान हो गया। लेकिन, कुछ तरह के यूपीआई लेनदेन के लिए अब यह तस्वीर बदलने वाली है। 15 अक्तूबर से 2,000 रुपये से अधिक का यूपीआई भुगतान लेने वाले व्यापारियों (मर्चेंट) को 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) चुकाना होगा। यानी, 3,000 रुपये के बिल पर दुकानदार को 12 रुपये और 50,000 की खरीदारी पर 200 रुपये का शुल्क देना होगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक की रकम पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। सवाल यह है कि असल में क्या बदलेगा।


लोगों के बीच होने वाला लेनदेन बिल्कुल मुफ्त रहेगा, फिर रकम चाहे कितनी भी हो। जो दुकानदार यूपीआई के जरिये महीने में एक लाख रुपये तक का भुगतान लेते हैं, उनसे भी यह शुल्क नहीं लिया जाएगा। ऑटो-पे, यानी रिकरिंग ऑटो-पे मैंडेट पर भी कोई तय एमडीआर लागू नहीं होगा। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और यूटिलिटी सेवाओं जैसी कुछ श्रेणियों में 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर पांच रुपये का तय शुल्क लगेगा, जबकि पूंजी बाजार से जुड़े लेनदेन पर 0.02 प्रतिशत शुल्क लगेगा, जिसकी अधिकतम सीमा भी 300 रुपये है। मंत्रालय का कहना है कि 96 प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन मुफ्त बने रहेंगे। इस तर्क पर निष्पक्षता से विचार किया जाना चाहिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में ही यूपीआई ने लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये के करीब 2,366 करोड़ लेनदेन किए। इतने बड़े यूपीआई नेटवर्क को सुचारु रखने के लिए सर्वर, साइबर सुरक्षा और तकनीकी उन्नयन पर लगातार खर्च करना पड़ता है।


जनवरी 2020 में यूपीआई से एमडीआर हटा दिया गया था। तब से बैंकों व पेमेंट एप्स को बुनियादी मर्चेंट लेनदेन से बहुत कम कमाई हुई है। वित्त मंत्री ने कई ऐसे देशों का उदाहरण दिया है, जहां डिजिटल भुगतान पर लागत आती है। तर्क सीधा है-चाय की दुकान और सब्जी बेचने वाले छोटे कारोबारियों को छोड़कर बड़े व्यापारियों से कुछ शुल्क लिया जाए। दरअसल, पूरी बहस एक ही आंकड़े के इर्द-गिर्द घूम रही है-एक यूपीआई लेनदेन को पूरा करने की लागत। पर, ज्यादा उपयोगी आंकड़ा यह है कि उसी भुगतान को पुराने तरीके से करने में कितनी लागत आती थी। इसे ऐसे समझिए। कोई यात्री बस में सफर करने के लिए हर महीने 1,500 रुपये खर्च करता था। फिर, वह मेट्रो से सफर करने लगा। अब उसे 800 रुपये देने पड़ते हैं और यात्रा का अनुभव भी बेहतर हो गया। अगर वह 800 रुपये के खर्च की शिकायत करने लगे, तो वह बचत को नजरअंदाज करते हुए केवल बिल देख रहा है। यूपीआई की नीति पर चल रही बहस भी कुछ ऐसी ही है।

यूपीआई से होने वाला हर भुगतान नकद लेनदेन की कई लागतों को घटा देता है। इसका बड़ा लाभ सरकार और पूरी अर्थव्यवस्था को मिलता है, न कि यूपीआई करने वाले व्यक्ति को। यूपीआई में ऐसी कई विशेषताएं हैं, जिन्हें अर्थशास्त्री ‘सार्वजनिक वस्तु’ से जोड़ते हैं। यह खुला और परस्पर उपयोग योग्य है, जिससे कोई भी बैंक या भुगतान एप इससे जुड़ सकता है। ढांचा तैयार होने के बाद हर अतिरिक्त लेनदेन की लागत कम रहती है तथा नए उपयोगकर्ताओं व व्यापारियों के जुड़ने से इसका नेटवर्क और उपयोगी होता जाता है। यूपीआई से बनने वाला डिजिटल रिकॉर्ड आर्थिक गतिविधियों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ता है। कारोबारी इसके आधार पर ऋण, बचत और व्यापार की नई सेवाएं विकसित कर सकते हैं। यूपीआई भारत को भुगतान का अपना मजबूत आधार देता है, जिससे वह निजी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर निर्भर नहीं रहता। इसका लाभ लेनदेन में शामिल न होने वाले लोगों को भी मिलता है, जिसे अर्थशास्त्री ‘सकारात्मक बाह्य प्रभाव’ कहते हैं। इसलिए, यूपीआई का आकलन केवल निजी लागत और निजी आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसे सामाजिक लाभ और सामाजिक लागत के पैमाने पर देखना होगा। इस नजरिये से देखें, तो असली सवाल यह है कि ऐसे आधारभूत ढांचे पर शुल्क क्यों लगाया जाए, जिसका लाभ किसी एक भुगतान से कहीं आगे तक पहुंचता है।

अब सोचने वाली बात है कि असल में इस बदलाव की कीमत कौन चुकाएगा? यह भरोसा कि ग्राहकों से शुल्क नहीं लिया जाएगा, इस धारणा पर टिका है कि व्यापारी इसे खुद वहन करेंगे। पर, भारत में खुदरा कारोबार शायद ही कभी इस तरह चलता है। ऐसे में, इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान, फर्नीचर के शोरूम, चिकित्सालय और अन्य दुकानों पर अब ‘यूपीआई शुल्क’ या नकद भुगतान करने जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 0.4 प्रतिशत शुल्क भले ही कम हो, लेकिन किसी जौहरी या ठेकेदार को दोबारा नकद भुगतान की ओर लौटाने के लिए इतना भी काफी हो सकता है, जबकि यूपीआई का उद्देश्य ऐसी आदत को खत्म करना था। वहीं, 96 प्रतिशत लेनदेन मुफ्त रहने का आंकड़ा भी पूरी तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि यह सिर्फ लेनदेन की संख्या बताता है, रकम नहीं। 2,000 रुपये से अधिक के भुगतानों की संख्या कम हो सकती है, पर उनमें बड़ी रकम शामिल होती है। ऐसे डिजिटल रिकॉर्ड कर वसूली के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

यहां एक राजनीतिक चूक भी है। यूपीआई उन चुनिंदा सार्वजनिक व्यवस्थाओं में से है, जो लगभग सभी लोगों के लिए प्रभावी ढंग से काम करती हैं। ऐसे में, शुल्क की शुरुआत, चाहे कितनी भी सावधानी से की जाए, यह संदेश दे सकती है कि मुफ्त सेवा का दौर खत्म हो रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि व्यवस्था को धन की कमी से जूझने दिया जाए। यदि यूपीआई को सुरक्षा और मजबूती के लिए धन की जरूरत है, तो बजट में इसे महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचे के रूप में धन दिया जाना चाहिए। साथ ही, इसकी तुलना नकदी प्रबंधन के उन खर्चों से करनी चाहिए, जिन्हें यूपीआई ने खत्म किया है। सरकार हर साल दूसरी जगहों पर जितना खर्च करती है, उसकी तुलना में यह राशि मामूली ही है। बैंकों और भुगतान एप को यूपीआई नेटवर्क पर आधारित सेवाओं, जैसे ऋण, आंकड़ा विश्लेषण और व्यापारी सेवाओं से कमाई करने की अनुमति दी जा सकती है, न कि खुद व्यवस्था से। अगर एमडीआर बना रहता है, तो सरकार को बताना चाहिए कि इससे कितनी कमाई हुई, पैसा कहां गया, और एक साल बाद नकदी के इस्तेमाल के आंकड़ों के आधार पर इस शुल्क की समीक्षा करनी चाहिए।

भारत ने यूपीआई के जरिये जो हासिल किया, वह दुर्लभ है। उसने ऐसी सार्वजनिक भुगतान व्यवस्था बनाई है, जिसका अध्ययन आज पूरी दुनिया करती है। इसकी ताकत सिर्फ तकनीक नहीं थी। ताकत यह थी कि इसका इस्तेमाल लगभग मुफ्त था। यह सहेजने लायक है, भले ही इसके लिए कोई कीमत चुकानी पड़े।      
-लेखक तकनीकी एवं सामाजिक उद्यमी, सार्वजनिक नीति टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।
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