फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   India China Ties after BRICS Delhi wait and watch bilateral relations normalizing watch thinking of Dragon

पिक्चर अभी बाकी है: द्विपक्षीय संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, क्या चीन की सोच वाकई बदल रही है?

Sat, 19 Sep 2026 08:21 AM IST
ज्योति भास्कर डॉ. मोहन भंडारी (रिटा. लेफ्टिनेंट जनरल)।
डॉ. मोहन भंडारी (रिटा. लेफ्टिनेंट जनरल)। Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 19 Sep 2026 08:21 AM IST
विज्ञापन
सार
2026 की घटनाओं से ऐसा लग रहा है कि भारत व चीन के बीच तनाव कम करने और आपसी संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। परंतु, यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों देश किसी सीमा समझौते पर पहुंच गए हैं। प्रारंभ ही आरंभ है या यों कहें कि पिक्चर अभी बाकी है।
loader
India China Ties after BRICS Delhi wait and watch bilateral relations normalizing watch thinking of Dragon
दिल्ली में ब्रिक्स बैठक और जिनपिंग के दिल्ली दौरे के बाद भारत चीन संबंध पर नजरें (फाइल) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स-एजेंसी

विस्तार

पश्चिमी मीडिया, विशेषकर अमेरिकी और बीबीसी ने हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन को ट्रंप के साये से घिरा देखा है। यह उन राष्ट्रों का भी मत है, जो पश्चिमी सोच का अनुसरण करते हैं। इतना जरूर है कि वैश्विक परिस्थितियों-जैसे अमेरिकी टैरिफ नीतियों, पश्चिमी एशिया तथा रूस-यूक्रेन युद्ध व वैश्विक आर्थिक दबाव-इन सबके बीच भारत-चीन संबंधों में एक सतर्क और कूटनीतिक सुधार की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है।



याद रहे कि 2020 की गलवां झड़प के बाद पिछले कुछ समय में भारत-चीन के संबंधों में थोड़े-बहुत बदलाव आए हैं। भारत-चीन संबंधों का इतिहास करीब छह दशकों से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1962 के युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच कई बार सीमा पर तनाव की स्थिति बनी। 1967 में नाथूला-चो ला, 1975 में तुलुंग ला, 1986-87 में सुमदोरोंग चू, 2017 में दोकलाम और 2022 में तवांग में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आईं। अगर 64 वर्षों का विश्लेषण किया जाए, तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं रहा। जिनपिंग और उनके सलाहकारों को भी एहसास हो चुका है कि आज का भारत आर्थिक व सैन्य रूप से सक्षम है।


शी जिनपिंग का करीब सात वर्षों बाद भारत का दौरा अपने आप में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। दोनों नेताओं ने यह माना कि अब आपसी विरोध का समय टल चुका है और दोनों राष्ट्रों को सहयोगियों की तरह बर्ताव करना चाहिए। राजनीतिक व कूटनीतिक भाषाओं व लहजों में भी बदलाव देखा गया। इस बात पर भी सहमति बनी कि सीमा विवाद को आपसी संबंधों में जहर नहीं घोलने दिया जाएगा। हर क्षेत्र में सकारात्मक वार्ताएं हुईं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि वर्षों बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, लिपुलेख दर्रे के रास्ते भारत-तिब्बत व्यापार और हवाई सेवाओं की दोबारा शुरुआत दोनों देशों के संबंधों में सुधार का संकेत हैं। भारत ने चीनी पेशेवरों के लिए व्यावसायिक वीजा के नियमों में भी कुछ ढील दी है, ताकि भारतीय उद्योगों को तकनीकी दिशा दी जा सके। हालांकि, आज भी दोनों देशों के कुल मिलाकर लगभग 90,000 सैनिक अपनी-अपनी सीमाओं पर तैनात हैं। युद्ध की स्थिति तो नहीं है, पर तनाव जरूर है। आपसी विश्वास की कमी है। स्वतंत्रता के बाद जॉनसन लाइन और मैकमोहन लाइन समेत पूरी सीमाएं जमीन पर नहीं खींची गई हैं। और, यही मुख्य विवाद है। 1962 के युद्ध को हुए 64 साल बीत चुके हैं। और कितने साल यही स्थिति चलती रहेगी?

चीन और भारत आज संपूर्ण विश्व में अपना-अपना विशेष स्थान रखते हैं। अमेरिकी टैरिफ और अन्य आर्थिक नीतियों के बावजूद, चीन भारत का बड़ा आयात भागीदार बना हुआ है। आर्थिक दबावों का सामना इस समय दोनों देश कर रहे हैं। ब्रिक्स के 11 राष्ट्र यह बात अच्छी तरह समझ गए हैं कि विकासशील देशों के हित मिल-बैठकर ही तय किए जा सकते हैं। शायद यही वजह है कि उन्होंने अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करने और डिजिटल भुगतान तंत्र को मजबूत करने की स्वीकृति भी दी है। हालांकि, चुनौतियां और अविश्वास कायम हैं। अमेरिका इस गठबंधन को डॉलरशाही के विपरीत देख रहा है। सख्त टैरिफ नीतियों के बावजूद, उसका व्यापार घाटा लगभग 89 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। ऐसे में, उसका डॉलर के वर्चस्व को लेकर चिंतित होना जायज है। हालांकि, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और वैश्विक दक्षिण की एकजुटता के कारण भारत व अमेरिका में कुछ कूटनीतिक तनाव और संतुलन की स्थिति जरूर बनी है। विश्व के लगभग सभी राष्ट्र अमेरिका की नीतियों से परेशान हैं। इस सम्मेलन में विकासशील देशों की आर्थिक सुरक्षा के लिए रूस, भारत और चीन को एक मंच पर आना पड़ा है।

अब सीधे सीमा विवाद की ओर चलते हैं। एकदम से यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत और चीन अब किसी सीमा समझौते पर पहुंच गए हैं। चीनी राष्ट्रपति के भारत आने और आपसी बातचीत से यह झलकता है कि भले ही चीन की सोच में बुनियादी बदलाव न आया हो, पर एक सामरिक और कूटनीतिक बदलाव अवश्य दिखाई पड़ रहा है। जो कूटनीतिक और सैन्य संवाद गलवां हिंसा के बाद ठप हो गया था, अब उसमें सुधार दिखाई पड़ रहा है। दोनों सेनाओं के बीच गश्त और शांति बहाल करने की पहल भी शुरू हो गई है। चीन का मानना है कि सीमा के प्रश्न को दीर्घकालीन और कूटनीनिक नजरिये से देखा जाए, ताकि द्विपक्षीय संवाद और आपसी व्यापार प्रभावित न होने पाएं। ऐसे में, अगर सीमा विवाद को खत्म करना है, तो चीन को पहला कदम उठाना ही होगा, तभी आगे की वार्ता संभव हो सकेगी। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साझा समझौते को पढ़कर यह कहना सही होगा कि भारत को व्यापार, कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चों पर बड़े लाभ मिलने की उम्मीद है। नए सदस्य जुड़ने से तेल, भारतीय कृषि उत्पादों, फार्मा, ऑटोमोबाइल और डिजिटल सेवाओं के लिए निर्यात बाजार खुल रहे हैं। इस समझौते में चीन का बड़ा योगदान रहा।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद काफी जटिल है। चीन ने पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन के करीब 37,244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर नियंत्रण कर रखा है। मध्य सेक्टर में हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड के कुछ इलाकों पर भी चीन अपना दावा करता है। पूर्वी सेक्टर में तो चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश के करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा करता है। हाल ही में, चीन की तरफ से एक खबर आई है, जिसमें उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से अपने सैनिकों, सैन्य सामान और सैन्य ढांचों को घटाने की बात कही है। अगर इसकी पुष्टि होती है, तो यह एक स्वागतयोग्य कदम है। भारत ने अपने सिद्धांतों और परंपराओं को कायम रखते हुए अपना पक्ष रखा है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों, संधियों और मान्यताओं पर आधारित है। वर्षों पहले भारत ने चीन से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (संयुक्त राष्ट्र) में सीमा विवाद ले जाने का आग्रह किया था, जिसे चीन ने टाल दिया था। अब लगता है कि चीन की जरूरत ही उसे भारत के करीब ला रही है।

अगर भारत और चीन सीमा विवाद को आपस में मिल-बैठकर सुलझा लेते हैं, तो भारत, चीन और रूस का घनिष्ठ समीकरण विश्व शांति को स्थिर करने में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है। फिलहाल, यह कहना सही होगा कि 2026 में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और आपसी संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। परंतु, यह न समझा जाए कि सीमा विवाद समाप्त हो गया है। प्रारंभ ही आरंभ है या यों कहें कि पिक्चर अभी बाकी है।

अगर भारत और चीन आपस में मिल-बैठकर इस 64 साल के सीमा विवाद के द्वंद्व को शांतिपूर्वक हल कर लेते हैं, तो यह अभूतपूर्ण कदम विश्व शांति के लिए एक स्वर्णिम अवसर होगा। जब इतने साल बीत गए, तो दो या तीन साल और सही।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed