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श्याम बेनेगल: कैमरे की आंख में बंद कालखंड... संसार के सर्वश्रेष्ठ भारतीय संविधान की अंतर्कथा जन-जन तक पहुंचाई

Wed, 25 Dec 2024 05:53 AM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Wed, 25 Dec 2024 05:53 AM IST
सार

काश! मायानगरी में जिंदगी की पथरीली जमीन से भावुक रेशे निकालकर उसे फिल्म में तब्दील करने वाले कुछ और श्याम बेनेगल होते।
 

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Shyam Benegal memories A period captured in camera brought inside story of Indian Constitution among citizens
श्याम बेनेगल के निधन से भारतीय सिनेमा में कभी न भरा जा सकने वाला शून्य पैदा हुआ - फोटो : अमर उजाला
करीब तीस साल पहले की बात है। मध्य प्रदेश के छोटे से जिले टीकमगढ़ में घटी एक घटना पर फिल्म समर  बनाने के लिए श्याम बेनेगल अपनी यूनिट के साथ बुंदेलखंड के सागर में पड़ाव डाले हुए थे। वहां मेरी उनसे फिल्म निर्माण प्रक्रिया और उनके जरिये संप्रेषण पर देर तक बात हुई। इस दौरान विश्व में श्रेष्ठ फिल्मकारों के दस नामों में से एक सत्यजीत रे का जिक्र स्वाभाविक ही था। महाविद्यालय में पढ़ रहे 20 साल के श्याम बेनेगल ने एक तरह से एकलव्य बनकर सत्यजीत रे को अपना आदर्श और गुरु मान लिया था। वे उनसे मिले नहीं थे, लेकिन पाथेर पंचाली देखी, तो जैसे जिंदगी की दिशा मिल गई।
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Shyam Benegal memories A period captured in camera brought inside story of Indian Constitution among citizens
श्याम बेनेगल - फोटो : एक्स
श्याम बेनेगल राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता गए थे। रिश्ते के भाई और फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त के कहने पर वहां पाथेर पंचाली देखी। इसके बाद तो वह रात भर सो न पाए। जब तक कोलकाता में रहे, रोज शाम यह फिल्म देखने जाते। हर बार पाथेर पंचाली का एक नया बिंब और नया कोण नजर आता। फिल्म के मोहपाश में ऐसे बंधे कि फिल्मकार बनने का संकल्प लेकर लौटे। उस दोपहर उन्होंने कहा, ‘हमने राय मोशाय जैसे विलक्षण निर्देशक की प्रतिभा को नहीं समझा।’ जिंदगी की पथरीली जमीन से भावुक रेशे निकालकर उसे फिल्म में तब्दील करने वाले सत्यजीत रे के शिष्य श्याम बेनेगल अब हमारे बीच नहीं हैं। यों तो वह 90 साल के थे, लेकिन अपनी सक्रियता से नौजवानों को भी मात देते थे।
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श्याम बेनेगल - फोटो : अमर उजाला
वह हमारे बीच की कहानियों को इस तरह परदे पर पेश करते थे कि वे अनूठी और बेजोड़ बन जाती थीं। मैं जिस समर फिल्म की बात कर रहा हूं, वह भी कुछ ऐसे ही कथानक पर आधारित थी। मध्य प्रदेश में पंचायतों तथा अन्य नगरीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिला, तो उससे अनेक सामाजिक कहानियां निकल कर आईं। टीकमगढ़ जिले में एक दलित महिला सरपंच चुनी गई। पंद्रह अगस्त आया, तो उस महिला को पंचायत में दबंगों ने राष्ट्रध्वज फहराने से रोक दिया। सरपंच जमीन पर बैठी रही और दबंग कुर्सी पर। उन्होंने ही तिरंगा फहरा दिया। इसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई। इसके बाद दबंगों के खिलाफ कार्रवाई हुई। अगला साल आया, तो पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया कि वह दलित महिला सरपंच के राष्ट्रध्वज फहराने के हक को सुनिश्चित करें। ऐसा ही हुआ। उस महिला ने तिरंगा फहराया। इसी कहानी पर श्याम जी फिल्म बनाने पहुंचे थे।
 
Shyam Benegal memories A period captured in camera brought inside story of Indian Constitution among citizens
निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल - फोटो : अमर उजाला
चैनल प्रारंभ करने से पहले जब मैं राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन से चैनल के स्वरूप पर चर्चा कर रहा था, तो उसी दौरान संविधान सभा की बैठकों और उसमें हुई बहसों पर धारावाहिक निर्माण का विचार आया। जाहिर था कि इस काम को सिर्फ श्याम बेनेगल ही कर सकते थे। वह अस्सी बरस के होने वाले थे। पर, उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया।
 
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Shyam Benegal memories A period captured in camera brought inside story of Indian Constitution among citizens
श्याम बेनेगल से जुड़ी यादें (फाइल) - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी
यहां समर का जिक्र मैंने इसलिए किया कि उन्होंने मंडी, अंकुर, भूमिका, जुबैदा, वेल डन अब्बा जैसी अनमोल और चर्चित फिल्में बनाईं। लेकिन उनमें समर का जिक्र कहीं नहीं आता। भारत एक खोज जैसे बेजोड़ धारावाहिक के जरिये उन्होंने भारत के अतीत को परदे पर उतारा। जब मैंने भारत की संसद का दूसरा चैनल राज्यसभा टीवी शुरू किया, तो दिमाग में मंथन चल रहा था कि संसार के सर्वश्रेष्ठ भारतीय संविधान की अंतर्कथा को हर भारतीय तक कैसे पहुंचाया जाए। हमने वास्तव में संविधान को संसद और न्यायपालिका के काम में आने वाली व्यवस्था-पुस्तक मान लिया और अपने आप को अलग कर लिया। इसमें हमारी शिक्षा प्रणाली का भी कुछ दोष है।
 
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