रमजान विशेष: सच यही तो है भारत जो हर दिल में बसता है
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इस समय पवित्र रमजान का महीना चल रहा है। इस बार पवित्र महीना रमजान लगभग पूरे विश्व में कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन में ही मनाया जा रहा है। आपको बताता चलूं की पहले में मुझे व्यावसायिक बाध्यता के चलते रमजान का महीना अपने देश के भीतर व बाहर भी कई सारे अन्य मुल्कों में बिताने का अवसर प्राप्त हुआ है इबादत के इस पवित्र महीने के साथ बहुत सारी खूबसूरत, खास व अविस्मरणीय यादें जुड़ी हैं, जिनमें से कुछ आज आप के साथ शेयर करना चाहूंगा।
अपने बचपन का रमजान आज भी मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है। हम बच्चे, जब तक कि हमारे ईद के कपड़े सिलकर तैयार न हो जाते, लगभग दीवाने हुए फिरते थे। अस्सी के दशक तक रेडीमेड कपड़ों का चलन बहुत नहीं था ( थोड़ा-बहुत रिवाज रहा भी होगा, तो वह हमारे जैसे सीमित आय वाले परिवारों की पहुंच से परे की बात थी)।
हमारे माता-पिता तो घर के पास वाली बाजार में स्थित एक परिचित दुकान से हम भाइयों की ईद की पोशाक के कपड़े एक ही थान से कटवा देते थे। खैर, कपड़े खरीदने के फौरन बाद हम पास ही में एक टेलर के यहां अपने कपड़ों की माप देने पहुंच जाते थे।
टेलर साहब बहुत ही बड़े वाले लेट-लतीफ थे। वह कपड़ेे जल्दी तैयार करने का वादा तो कर लेते थे, पर उन्होंने कभी भी चांद रात से पहले हमारे कपड़े सिल कर नहीं दिए। हम उनकी दुकान की खाक लेते न थकते, जब तक कि वह हमारे कपड़े सिलकर न दे देते।
कुछ अन्य ईद विशेष चीजें (जैसे टोपी, बेल्ट, रुमाल, जूते इत्यादि ) ऐसी होती थीं, जो हमारे घर के पास वाली बाजार में नहीं मिलती थी। उनके लिए फिर हमको शहर के दूसरे हिस्से में स्थित चौक बाजार जाना पड़ता था।
चौक की शॉपिंग खत्म करने के बाद, वापसी में हमारे पिताजी घंटाघर स्थित एक मशहूर दुकान की कुल्फी हम सब को जरूर खिलाते थे। घर वापस आते ही, हम भाई-बहन उल्टे पांव पड़ोस के घरों में अपने दोस्तों को ये सारी ईद विशेष चीजें दिखाने भाग जाते थे।
बदले में, पड़ोस के बच्चों को भी उनकी शॉपिंग अंततः हमको दिखानी ही पड़ती थी। हमारी कॉलोनी में रहने वाली हम सब बच्चों की चहेती ‘तिवारी चाची’ जब तक हमारे कपड़ों को ओके न कर देतीं, हमको चैन नहीं आता था।
उन दिनों हमारी सोसाइटी में प्रत्येक बृहस्पतिवार को एक बहुत ही विनम्र, पतले-दुबले, लंबी दाढ़ी वाले फकीर बाबा बिला-नागा आया करते थे। वह सहरीख्वां या सहरीवाले बाबा भी कहे जाते थे, जो रमजान की रातों में आसपास के कई मोहल्लों में जाकर अपनी बुलंद आवाज से लोगों को सहरी के लिए जगाते थे।
उनकी आवाज इतनी मधुर थी कि अक्सर हम बच्चे गैर-रमजान के दिनों में भी, उनकी सहरी विशेष कविता – ‘रोज़ा रखो रमज़ान का…’, उनसे सुनाने की जिद किया करते थे और वह बखुशी हम सब को उसी अंदाज में हर बार तरन्नुम में (गा कर) सुनाया करते थे।
उन दिनों सहरीख्वां एक प्रकार से मानव-अलार्म का काम किया करते थे। वर्तमान दौर में, आधुनिक तकनीक के चलते, यह प्रथा लगभग खत्म सी हो गई है।
नमाज के बाद लोगों से बात करने पर मालूम हुआ कि...
तब मैं भी छोटा ही था। अक्सर, अपने हम-उम्र कजिन्स के मजाक उड़ाने के बावजूद, मैं इफ्तार (रोजा तोड़ने के लिए सूर्यास्त के ठीक बाद का खाना) के लिए अपने मोहल्ले की मस्जिद में जाया करता था। जाहिर सी बात है, उन दिनों मेरी रोजा रखने की उम्र नहीं थी, पर मस्जिद में इफ्तार के लालच में रोजा रखने का नाटक मैं जरूर किया करता था।
इस दिखावे का सिर्फ एक ही कारण था – दूर दराज से आए रोजेदारों के लिए पड़ोस के घरों से मस्जिद भेजे गए स्वादिष्ट पकवान या इफ्तारी। बाद में, जब मैं स्वयं अपने शहर से दूर मुलाजमत के सिलसिले में बाहर रहने लगा, तो मस्जिदों में होने वाली इफ्तारी की अहमियत मुझे अच्छी तरह से समझ आई।
अपने शहर से दूर तन्हा शख्स के लिए, सहरी और इफ्तारी की व्यवस्था कर पाना मुश्किल होता है और अकेले होने की वजह से उसका दिल भी नहीं चाहता। इसके साथ ही, रमजान जैसे खास मौके पर घर से दूर, अपने घर वालों के साथ बैठ कर रोजा खोलने की याद भी बहुत आती है। इसलिए मस्जिदों में अन्य रोजेदारों के साथ इफ्तार करके अपनों से दूर होने का गम कुछ हद तक कम हो जाता है।
रमजान का ही महीना था, जब मुझे ‘इंडस्ट्रियल ट्रक डिजाइन’ के सिलसिले में पहली बार अमेरिका जाने का अवसर प्राप्त हुआ। यहां पर आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि अजनबी देश में एक नए व्यक्ति के लिए सहरी और इफ्तार का इंतजाम करना कितना मुश्किल है।
इसलिए एक-दो दिन तो मैं बड़ा परेशान रहा, पर वीकेंड पर करीब की एक मस्जिद का पता गूगल किया और अगली ही नमाज वहां अदा करने के लिए पहुंच गया। नमाज के बाद लोगों से बात करने पर मालूम हुआ कि मस्जिद से लगे कम्युनिटी सेंटर में हर रोज इफ्तारी का इंतजाम होता है।
यह जान कर, मेरी खुशी का कोई ठिकाना ही न रहा। इसी बहाने मुझे, वहां पर पूरे महीने विभिन्न मुल्कों से आए हुए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ और खूबसूरत लोगों से मिलने का मौका भी मिला।
उस दिन घर वापस लौट कर जब मैंने यह बात अपने फ्लैट-मेट रवि जे. (पूर्व आईआईटियन और वर्तमान में एक बड़ी कंपनी के सी.एफ.ओ ) को बताई, तो उन्होंने भी इफ्तारी में शामिल होने की इच्छा जताई।
इस प्रकार, अगले दिन से हम दोनों लोग वहां जाने लगे। मजे की बात यह कि इफ्तारी इतनी ज्यादा हो जाती थी कि यकीन जानिए उस पूरे महीने हम दोनों ने रात का खाना घर पर नहीं बनाया और हमारा रमजान भी बहुत ही अच्छी तरह से बीता।
अमेरिका से हैदराबाद वापस लौटने के बाद जब तक मैं अपनी तत्कालीन कंपनी ‘सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज’ के सुंदर कैंपस में रहा, वहां समय बहुत ही यादगार गुजरा। कंपनी के फैसिलिटी मैनेजर श्री जोसफ, कैंपस के अंदर रहने वाले बैचलर्स के लिए सहरी व इफ्तार की विशेष व्यवस्था किया करते थे।
हमारे बहुत सारे सहकर्मी व मित्र जो रोजे नहीं भी रखते थे, वह भी कैफेटेरिया में हमारे साथ बैठ कर इफ्तार करते थे। हैदराबाद के ही सहकर्मियों ने पहली बार मेरा परिचय रमजान विशेष हलीम जैसी नायाब व स्वादिष्ट डिश से करवाया।
आपसी भाईचारे तथा सौहार्द के जो नजारे देखने को मिलते हैं, वह दिल को छू लेते हैं...
इफ्तार से ही संबंधित एक और रोचक घटना बताता हूं। हमारे एक परिचित, प्रोफ़ेसर टी. वी. कट्टीमनी साहब ( पूर्व कुलपति, आई. जी. एन. टी. विश्वविद्यालय ), जब हैदराबाद के मौलाना आजाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे, तो हमेशा रमजान में किसी एक दिन अपने साथी अध्यापकों तथा मित्रों के लिए रोजा इफ्तार का इंतजाम अवश्य करते थे।
मैं खुद कई मर्तबा उनकी इफ्तार पार्टी में शामिल हुआ हूं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब कुछ सालों बाद प्रोफेसर कट्टीमनी साहब का तबादला कुलपति के तौर पर अमरकंटक हो गया, तब भी वह हर साल अपने पुराने साथियों को इफ्तार करवाने के लिए सपरिवार हैदराबाद जरूर आते थे और आज भी उनका यह सिलसिला कायम है।
अक्सर लोगों का प्रयास यही होता है कि त्योहार, अपने गांव -शहर में परिवार तथा मित्रों के साथ ही मनाया जाए। मैं भी यही कोशिश करता हूं कि दुनिया के चाहे जिस कोने में रहूं, ईद अपने वतन प्रयागराज में ही मनाऊं। इसलिए रमजान के अंतिम सप्ताह तक मैं वहां जरूर पहुंच जाता हूं।
घर वापस जाते वक्त, रास्ते में ट्रेनों और हवाईअड्डों पर आपसी भाईचारे तथा सौहार्द के जो नजारे देखने को मिलते हैं, वह दिल को छू लेते हैं। साथ में सफर करने वाले मुसाफिर, हमसफर रोजेदारों को इफ्तार के वक्त बिना किसी भेदभाव के अपना खाना व ठंडा पानी पेश करते हैं और साथ बैठ कर इफ्तार में भी शामिल होते हैं।
गैर मुस्लिम भाई इफ्तार के बाद अपने बैठने की रिजर्व बर्थ, साथी रोजेदारों को नमाज के लिए ऑफर करते हैं। आज भी मेरे शहर प्रयागराज में बचपन के मेरे दो मित्र आशुतोष दुबे और सत्य मोहन सिंह बेसब्री से मेरे वहां पहुंचने तथा साथ इफ्तार करने का इंतजार करते हैं। हम तीनों मित्र पिछले तीस वर्षों से लगभग प्रत्येक वर्ष ऐसा करते आ रहे हैं।
अंत में, आपको एक राज की बात और बता दूं।
मेरी पत्नी ईद विशेष ‘किमामी सेवईं’ बहुत ही लजीज बनाती हैं, पर आपको यह जान कर हैरानी होगी कि हमारी किमामी सेवईं में पड़ने वाली मुख्य सामग्री यानी मावा/खोआ कैसे और कहां से आती है। आज इस राज से भी पर्दा हटा ही देता हूँं।
दरअसल प्रत्येक वर्ष मेरे मित्र आशुतोष दुबे ‘पंडित जी’ अपने एक और खोआ विशेषज्ञ परिचित लल्लूजी के साथ प्रयागराज की मशहूर खोआ मंडी जाकर हमारी सेवईं के लिए बेहतरीन ‘लच्छा खोआ’ ढूंढकर लाते हैं।
मुझे अपने मुल्क की इस बेमिसाल और दुर्लभ गंगा-जमुनी तहजीब पर नाज है – सच में, यही तो है भारत।
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