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Autumn is a lesson for us Until old thoughts are eradicated there will be nothing new in life
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प्रकृति का राग पतझड़ हमारे लिए एक सीख: जब तक पुराने विचारों का खात्मा नहीं होगा, तब तक जीवन में कुछ भी नया नहीं
पतझड़ एक विचार है- समय का, परिवर्तन का, जीवन का, संघर्ष का। जब पेड़ से पूरे पत्ते नाता तोड़ देते हैं, तब पेड़ कितना कुरूप दिखाई देता है, लेकिन कुछ समय बाद फिर कोंपलें फूटती हैं और पेड़ हरा-भरा हो जाता है।
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पतझड़ के दौरान श्रीनगर का मुगल गार्डन
- फोटो : एएनआई
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इन दिनों हम सब रास्ते में गिरे सूखे पत्तों को देख रहे होंगे। हमारा मस्तिष्क कहता है कि अब मौसम पतझड़ का है। दिन की धूप दिनों-दिन तीखी होती जा रही है। हवाएं तेज चलने लगी हैं, पत्तों की सरसराहट भी कुछ परिवर्तन का आभास देती है। बंद खिड़की के पास सोने से हवा की ध्वनि भी कुछ नएपन का संकेत देने लगी है।
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पतझड़ के दौरान श्रीनगर का मुगल गार्डन
- फोटो : एएनआई
इन सबका आशय यही है कि प्रकृति अपना बाना बदलने लगी है। इन्सानों की भाषा में कहा जा सकता है कि प्रकृति अपना चोला बदलने लगी है, पर प्रकृति के इस परिवर्तन पर यदि थोड़ा-सा ध्यान दिया जाए तो हम समझेंगे कि यह प्रकृति के विश्राम का क्षण है। कुछ नया करने के पहले इन्सान भी कुछ सोचता है। प्रकृति भी इस प्रयास में है, क्योंकि उसके पास अब भी हमें देने के लिए बहुत कुछ है। यह हम पर निर्भर करता है कि प्रकृति से क्या लें और कितना लें?
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पतझड़ के दौरान श्रीनगर का मुगल गार्डन
- फोटो : एएनआई
पतझड़ यानी उन पुराने पत्तों का शाखा से नाता तोड़ना, जो अब पीले होकर कुम्हलाने लगे थे। उनमें जीनव रस नहीं था। पूरे साल उन्होंने पेड़ का साथ दिया। अब वे अपनी भूमिका समाप्त कर चल पड़े हैं धरतीपुत्र बन खाद बनने को। यहां भी उन्होंने उदारता से पल्ला नहीं झाडा, वे धरती पर जाकर भी उसे उर्वरा बनाने में लग जाएंगे। ऐसा महान संकल्प लेकर वे आए और हमें छोटा-सा संदेश देकर चले गए।
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पतझड़ के दौरान श्रीनगर का मुगल गार्डन
- फोटो : एएनआई
पतझड़ एक विचार है- समय का, परिवर्तन का, जीवन का, संघर्ष का। जब पेड़ से पूरे पत्ते नाता तोड़ देते हैं, तब पेड़ कितना कुरूप दिखाई देता है। लोग उसकी ओर देखकर आहें भरते हैं कि कभी यह भी हरा था। इसके पत्तों की सरसराहट कितनी भली लगती थी। इसकी छांव में हमने खूब मौज-मस्ती की है, पर अब इसमें वह बात कहां? पेड़ पर इस तरह के कटाक्ष करने वालों, थोड़ा ठहर जाओ। अभी पेड़ बाहरी विश्राम के क्षणों में है। उसने सीख देने के लिए पत्तों को अपने से दूर किया है। आज पत्तेविहीन हो गया तो आपने जरा भी देर नहीं की। अभी तो आपने इसका बाहरी स्वरूप ही देखा है। कुछ दिन बाद ही इसमें नए पत्तों की कोंपलें फूटेंगी, तब देखना। कोमल, नरम, मुलायम पत्तों की बहार। वे आते रहेंगे पूरी मस्ती के साथ, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि कब पेड़ पूरी तरह से हरियाली से ढक गया।
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पतझड़ के दौरान श्रीनगर का मुगल गार्डन
- फोटो : एएनआई
हमारे जीवन में भी पतझड़ आ रहा है, गिरते विचारों का और लगातार आ रहा है। हमारे विचार देश, स्वाभिमान, प्रतिष्ठा और परोपकार विहीन हैं। यदि है तो केवल स्वार्थ, धन-लिप्सा, मक्कारी, धूर्तता, बेईमानी, झूठ-फरेब, लूट-खसोट। इन विसंगतियों के साथ हम कुछ भी कर रहे हैं। कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते। अब पेड़ तो हैं नहीं, इसलिए इस पतझड़ में मनुष्य के विचार गिरने लगे हैं। इस मौसम के बाद पेड़ों की रंगत तो बदल जाती है, लेकिन इन्सानों की नहीं बदलती। उसे तो पुराने विचारों ने इस तरह जकड़ लिया है कि नए विचारों का प्रवेश ही बंद हो गया है। जब तक पुराने विचारों का खात्मा नहीं होगा, तब तक जीवन में कुछ भी नया नहीं होगा।
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