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प्रदूषण और सियासत : क्या वाकई पर्यावरण प्रदूषण एक राजनीतिक मुद्दा बन रहा है?

Tue, 11 Feb 2025 01:32 PM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Tue, 11 Feb 2025 01:32 PM IST
सार

यमुना का जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण एक निर्णायक राजनीतिक मुद्दा बना। इसे एक सुखद संयोग मानना चाहिए। यह बात राजनीतिक दलों को जितना जल्दी समझ में आ जाए, उतना ही बेहतर होगा। आज यह  सच्चाई सबके सामने है कि हर आने वाला साल पिछले साल की तुलना में अलग और  मुश्किल होता जा रहा है।

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Delhi Election it is a happy coincidence that environmental pollution is becoming a political issue
प्रदूषण को राजनीतिक मुद्दा बनाने की शुरुआत यदि होती है तो यह अच्छी बात होगी। - फोटो : self

हाल के दिल्ली विधानसभा चुनावों में यमुना का जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण एक निर्णायक राजनीतिक मुद्दा बना। इसे एक सुखद संयोग मानना चाहिए। मुफ्त के चंद पैसे की लालच देकर चुनाव जीतना तो आसान है, परन्तु मानव जीवन कहीं उससे ज्यादा मूल्यवान है, यह बात राजनीतिक दलों को जितना जल्दी समझ में आ जाए, उतना ही बेहतर होगा। आज यह  सच्चाई सबके सामने है कि हर आने वाला साल पिछले साल की तुलना में अलग और  मुश्किल होता जा रहा है।



अभी फरवरी  महीने में  दिल्ली और एन सी आर का तापमान सामान्य से सात डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया है। बसन्त ऋतु ठीक से आई नहीं और हम सीधे ग्रीष्म ऋतु में प्रवेश गए। जनवरी महीने में ठंड के मौसम  का अन्तराल भी इस साल छोटा ही रहा। बसन्त  ऋतु का इंतजार सभी करते हैं, पर इस साल बसन्त ऋतु कब आई, जैसे पता ही नहीं चला। पेड़ों पर नई कोपलें नहीं दिखाई दे रहीं। कोयल की कूक कहीं सुनाई नहीं दे रहीं। बागों में अभी आम के वृक्षों पर कहीं अमराई नहीं आई।
 

आमतौर पर बसन्त पंचमी के दिन आम की बौर को देखने की परम्परा रहीं है। अब फरवरी महीने में जैसे मार्च-अप्रैल  का अहसास होने लगा है। धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर अब गांवों और खेती-किसानी पर भी  साफ नज़र आने लगा है। फरवरी महीने में जिस तरह की तपिश महसूस हो रही है, उससे खासतौर पर गेहूं की फसल प्रभावित होने का अंदेशा किसानों  को भी होने लगा है। जाहिर है कि गेहूं  का उत्पादन कम होने से देश की खाद्यान्न सुरक्षा प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती।


भारत में छह तरह की ऋतुएं और छह तरीके के क्लाइमेटिक जोन हैं। ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर और बसन्त। हमारी परंपरागत् जीवन पद्धति सदैव ऋतुचर्या, दिनचर्या और आहार -बिहार से प्रभावित रही हैं। आधुनिक जीवन शैली के दबाव और प्रभाव में हमारे निजी जीवन में जो बदलाव आ रहा हैं ,उसे ही आज जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण बताया जा रहा है। हाल में दिल्ली में सम्पन्न 'प्रकृति संवाद' में शामिल प्रोफेसर दिलीप कुलकर्णी का मानना है कि "जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए हमें अपनी जीवन शैली बदलना होगा, जीवन की दृष्टि बदलनी होगी और जीवन का ध्येय बदलना होगा।"

हमें अपनी जरूरतें कम करनी होगी। विलासिता के जीवन से मुक्त होना होगा। हमें समझना होगा कि अधिकतम सुविधाओं का उपयोग आधुनिक जीवन की पहचान भले हो,  पर अब प्रकृति के पास उतने संसाधन नहीं बचें हैं कि वह हर आदमी की सुविधाभोगी और विलासितापूर्ण जीवन की हर जरुरत को पूरा कर सकें। इस लिए आज 'सर्कुलर इकोनॉमी' का प्रचार बड़े जोर-शोर प्रचार किया जा रहा हैं। हमें उन चीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए जिसे हम 'रिन्यू' कर सकें, 'रिसाइकल' कर सकें, 'रिप्रोड्यूस' कर सकें और 'रिप्लेस' करने के बजाय जहां तक सम्भव हो 'रिपेयर' कर सकें, बाकि चीजों के उपभोग को हमें 'रिफ्यूज' करना होगा अथवा 'रिजेक्ट' करना होगा।
 

ऊर्जा स्वराज अभियान चलाने वाले मुम्बई आई आई टी के प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी पिछले कई वर्षों से अपना घर-परिवार छोड़कर  लोगों को यह समझाने में लगे है कि जलवायु परिवर्तन हो चुका है। अब हमें और इन्तजार नहीं करना चाहिए। प्रोफेसर सोलंकी ने उर्जा  बचत के उपाय के तहत  पूरे हफ्ते की जीवनचर्या तय कर रखा है। उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन को ठीक करने के लिए महज  नीति निर्माण करने से, बेहतर तकनीक के उपयोग से अथवा आर्थिक विकास की अधिकतम दर हासिल करने से इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता।


इस समस्या को हमने ही पैदा किया है, इसलिए इसका समाधान ही हमें ही करना होगा। कुल मिलाकर हमें उर्जा खपत की जरूरतें कम करनी होगी। आज हम अपनी उर्जा की जरूरतें पूरी करने के लिए 85% कोयला, पेट्रोल और डीजल के स्रोत पर निर्भर हैं। इस वजह से वायुमंडल में 52% कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ चुकी है। पृथ्वी का तापमान 2.5 फारेनहाइट बढ़ गया है।

सन् 1750 से वाष्प ऊर्जा के आविष्कार के बाद हम जिस औद्योगिक विकास के रास्ते पर चलें, उसका एक ही लक्ष्य था। मशीनों के जरिए अधिकतम उत्पादन और अधिकतम उपभोग को बढ़ावा देना। जहां आवश्यकता न हों, वहां आवश्यकता पैदा करना। यह बताना कि यहीं आधुनिकता की पहचान है। इस  जीवन शैली को अपनायें बिना आप  दुनिया -जहान में पिछड़ जाएंगे। ऐसे ही समय में हमें महात्मा गांधी याद आते है। उनका कहना है-  
 

"एक समय आएगा, जब अपनी जरूरतों को कई गुना बढ़ाने की अंधी दौड़ में लगे लोग, अपने किए को देखेंगे और कहेंगे कि अरे ! हमने यह क्या किया।"


अब यह  बात आम जनता को भी यह बात महसूस होने लगी है। जनता के भाग्यविधाता होने अथवा बनने की होड़ में शामिल राजनेताओं और नीति-निर्माताओं को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाय, उतना ही बेहतर। हमारी मौजूदा  राजनीतिक व्यवस्था में नीति निर्माता कोई और होता हैं। उसे लागू और निगरानी करने वाला कोई और होता हैं। कई बार हमारे राजनेताओं को राजनीतिक दबाव अथवा औद्योगिक प्रभाव की वजह से भी पर्यावरण के नुकसान  की कीमत पर भी  समझौते करना पड़ता है। यहीं हमारे राजनीतिक नैतिकता की असली परीक्षा होती है।

नैतिक उन्नयन और अनुशासन की दृष्टि से भले ही हम एक इंच ऊपर नहीं उठ पाए हों, लेकिन नैतिक पतन के मामले में शायद दुनिया में हमारा जोड़ नहीं। दिल्ली के हालिया विधानसभा चुनाव में खुद को कट्टर ईमानदार होने का दावा करने वाले एक नेता यहीं हश्र हुआ। अच्छा  यह हुआ कि दिल्ली  विधानसभा चुनाव में  यमुना का प्रदूषण और दमघोंटू हो रहे वायु प्रदूषण का मुद्दा चुनावी मुद्दा तो बन ही गया।

इन मुद्दों का समाधान करने का वादा तो चुनाव जीतकर आए दल ने भी किया है। लेकिन यह समझना होगा कि अब बात  सिर्फ आश्वासन से नहीं बनने वाली। इसे 'मिशन मोड' में अभियान चलाकर पूरा करना होगा। ठीक वैसे ही जैसे स्वच्छता मिशन को चलाया जा रहा है। यह साफ-साफ बताना होगा कि हमें  अपनी जीवन शैली में बदलाव करना होगा।

प्रकृति  के पास हमारी हर जरूरत को पूरी करने की क्षमता अब नहीं बची है। प्रकृति की यह अनमोल विरासत हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, हमारे आने वाली पीढ़ी की अमानत है। इसे सहेज कर रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। यहीं समय है जब  हमें व्यक्तिगत स्तर पर भी इस अभियान में शामिल होना होगा। ताकि हम अपना वर्तमान संवारने के साथ -साथ  आने वाली पीढ़ी को एक सुन्दर भविष्य की सौगात सौंप सकें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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