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संघ प्रमुख का न्यूयॉर्क भाषण: खारिज करने से पहले सुनना और समझना क्यों जरूरी है?

Sun, 30 Aug 2026 04:41 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sun, 30 Aug 2026 04:41 PM IST
सार

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने न्यूयॉर्क संबोधन में भारत की विविधता, सामाजिक समरसता, मानवता और भिन्न-भिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक समुदायों के सह-अस्तित्व को प्रमुखता से रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अलग-अलग पहचान, भाषा, पहनावे और पूजा-पद्धतियों के बावजूद एक समाज के रूप में एकजुट रहना न केवल संभव है

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RSS chief Mohan Bhagwat addressed gathering in New Yorks know its significance
मोहन भागवत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान दिए गए संबोधन के बाद देश और दुनिया में एक बार फिर वैचारिक बहस तेज हो गई है। हमेशा की तरह, इस भाषण पर भी प्रतिक्रियाएं दो सुस्पष्ट धड़ों में विभाजित नजर आती हैं। एक वर्ग उनके बयानों को भारत के बहुलवादी और समावेशी दर्शन की वैश्विक अभिव्यक्ति मानकर सराहना कर रहा है तो दूसरा वर्ग संघ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसकी विचारधारा को लेकर सवाल उठाते हुए इसे मात्र एक औपचारिक वक्तव्य करार दे रहा है।

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लोकतांत्रिक समाज में किसी भी संगठन, नेता या विचारधारा पर सवाल उठना न केवल स्वाभाविक है, अपितु यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी भी है। किसी भी संस्था या व्यक्ति को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में सबसे गंभीर चिंता का विषय वह प्रवृत्ति है, जहां किसी व्यक्ति के विचारों का विश्लेषण उसके शब्दों के बजाय उसकी पूर्व-निर्धारित पहचान के आधार पर किया जाने लगता है।
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संघ प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क भाषण का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए कि उन्होंने वास्तव में क्या कहा, न कि केवल इस आधार पर कि वे किस संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं?
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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने न्यूयॉर्क संबोधन में भारत की विविधता, सामाजिक समरसता, मानवता और भिन्न-भिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक समुदायों के सह-अस्तित्व को प्रमुखता से रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अलग-अलग पहचान, भाषा, पहनावे और पूजा-पद्धतियों के बावजूद एक समाज के रूप में एकजुट रहना न केवल संभव है, अपितु यही भारत की वास्तविक सामाजिक ताकत रही है।

यह विचार कोई नया या आधुनिक राजनीतिक प्रयोग नहीं है, अपितु इसकी जड़े भारतीय चिंतन परंपरा में अत्यंत गहरी हैं। वैदिक काल से ही भारत में विचारों की भिन्नता को स्वीकार करने की संस्कृति रही है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” (अर्थात : परम सत्य एक ही है, लेकिन ज्ञानी और विद्वान लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों और तरीकों से व्यक्त करते हैं) इसी दर्शन का आधार प्रस्तुत करता है।

इस दार्शनिक विचार का सीधा अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी आस्था और सिद्धांतों पर पूरी दृढ़ता से कायम रहते हुए भी दूसरों के विचारों और विश्वासों के लिए सम्मानजनक स्थान रख सकता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां ध्रुवीकरण और असहिष्णुता बढ़ रही है, यह सोच और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

भारतीय समाज के समावेशी ढांचे पर चर्चा

संबोधन का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला और महत्वपूर्ण हिस्सा वह था, जहां उन्होंने भारतीय समाज के समावेशी ढांचे पर बात की। संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए या वे समाज का हिस्सा नहीं हैं तो ऐसा व्यक्ति वास्तव में 'हिंदू विचार' और उसकी मूल आत्मा को समझ ही नहीं पाया है। यह वक्तव्य बेहद साफ और सीधी रेखा खींचता है।

इस टिप्पणी से कोई वैचारिक रूप से सहमत हो सकता है या असहमत, लेकिन इसे पूर्वाग्रह के कारण अनसुना कर देना उचित नहीं होगा। अपनी संस्कृति, धर्म और पहचान पर गर्व करना तथा साथ ही दूसरे धर्मों और मान्यताओं के लोगों को खुले दिल से स्वीकार करना, ये दोनों बातें एक साथ अस्तित्व में रह सकती हैं। अपने धर्म से प्रेम करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि दूसरों के प्रति विद्वेष रखा जाए। भारत का सामाजिक इतिहास इसी ताने-बाने पर टिका रहा है, जहां विविधता को विभाजन का कारण बनाने के बजाय समृद्धि का माध्यम माना गया।

न्यूयॉर्क में कार्यक्रम के दौरान संघ के विरोध में प्रदर्शन भी देखने को मिले। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। संघ की नीतियों, उसके अतीत और उसके राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठाए जाते रहे हैं और उठाए जाने भी चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में 'विरोध' और 'आरोप' के बीच के बारीक अंतर को समझना बेहद आवश्यक है।

विरोध के पीछे ठोस तर्क, सैद्धांतिक आधार और स्पष्ट दृष्टि होनी चाहिए, जबकि किसी संस्था या व्यक्ति पर लगाए जाने वाले आरोपों के पीछे प्रामाणिक तथ्य और साक्ष्य होने चाहिए। दुर्भाग्य से, आज के सोशल मीडिया चालित सूचना युग में इस विमर्श का स्तर काफी गिरा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किसी लंबे भाषण से 10-20 सेकेंड का कोई हिस्सा या एक वाक्य काटकर वायरल कर दिया जाता है और उसी के आधार पर व्यक्ति का पूरा चरित्र-चित्रण तय कर दिया जाता है। अधिकांश लोग पूरा भाषण सुनने, संदर्भ समझने या उसके पीछे के तर्क को जानने का प्रयास नहीं करते।

इसके साथ ही, हमारी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में एक और नकारात्मक आदत मजबूत हुई है, यह देखने की प्रवृत्ति कि "कौन बोल रहा है", न कि "क्या बोला जा रहा है"। यदि बोलने वाला हमारी पसंद का है, तो उसकी अनुचित बात का भी समर्थन कर दिया जाता है, यदि बोलने वाला विरोधी खेमे का है, तो उसके सबसे तार्किक और समावेशी विचार को भी तुरंत खारिज कर दिया जाता है। यह सोच लोकतांत्रिक विमर्श की गहराई को समाप्त करती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भारतीय समाज में दो अत्यंत स्पष्ट और परस्पर विरोधी दृष्टिकोण मौजूद हैं। समर्थक वर्ग जहां संघ को राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण, आपदा राहत कार्यों और निःस्वार्थ समाज सेवा से जुड़े संगठन के रूप में देखता है, वहीं आलोचक वर्ग संघ की विचारधारा, उसके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप और भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर उसके संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठाता है।

किसी भी बड़े संगठन को निष्पक्षता से समझने के लिए केवल उसके प्रशंसकों की बातें सुनना अधूरा होगा, और केवल उसके कट्टर विरोधियों के दावों पर भरोसा करना भी एकांगी होगा। सही और वास्तविक तस्वीर हमेशा इन दो अतियों के बीच स्थित होती है। किसी संस्था के मूल्यांकन के लिए उसके कार्यों का निष्पक्ष अवलोकन, उसके सिद्धांतों का अध्ययन, उसकी कमियों पर निर्भीक प्रश्न और उसके सकारात्मक योगदान की स्वीकारोक्ति, इन सभी तत्वों का संतुलन आवश्यक है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विदेश की धरती पर भारत की विविधता, सामाजिक सद्भाव और एकता का जो संदेश दिया, उसकी असली सार्थकता इस बात में है कि उसे धरातल पर कितना लागू किया जाता है। यह संदेश केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे व्यावहारिक जीवन में उतरना होगा।

हमें स्वयं से यह सवाल पूछने होंगे, क्या हम अपने दैनिक जीवन में अपने से अलग धर्म, जाति या संप्रदाय के व्यक्ति के साथ समानता और सम्मान का व्यवहार करते हैं? क्या हम अलग भाषा बोलने वाले या अलग क्षेत्रों से आने वाले नागरिकों को पूरी तरह अपने जैसा मानते हैं? क्या हमारी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां इस समावेशी भावना का प्रतिनिधित्व करती हैं? भारत की विविधता केवल अकादमिक किताबों में लिखा कोई सुंदर विचार नहीं है, यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का जीवंत यथार्थ है। इसलिए, इस विविधता को संरक्षित करने और इसे संकीर्णता से बचाने की जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग और हर संगठन की है।

विरोधी के विचारों को भी सुनने की आदत
 
भारत की बौद्धिक और दार्शनिक परंपरा कभी भी एकतरफा संवाद की नहीं रही। हमारे यहां 'शास्त्रार्थ' यानी तर्कपूर्ण बहस और संवाद की एक समृद्ध विरासत रही है। शास्त्रार्थ का मूल नियम यही था कि विरोधी के विचार को पहले पूरी धैर्य और ध्यान से सुना जाए, उसके तर्कों को समझा जाए और फिर अपने तर्कों से उसका खंडन या समर्थन किया जाए। असहमति होने के बावजूद सामने वाले के प्रति सम्मान बनाए रखना इस परंपरा का मुख्य हिस्सा था।

आज हमारे पास संचार के आधुनिक साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, हम जब चाहें अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि बोलने के साधन बढ़ने के साथ-साथ दूसरों को सुनने का धैर्य लगातार घटता जा रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह भाषण इसी परिप्रेक्ष्य में एक अवसर प्रदान करता है। जो लोग संघ के विचारों से सहमत हैं, वे इन बयानों के आलोक में अपनी जिम्मेदारियों को समझें और इन विचारों को धरातल पर उतारें। जो लोग संघ से असहमत हैं, वे भी पूर्वाग्रह छोड़कर पूरे भाषण को सुनें, उसके तर्कों का विश्लेषण करें और फिर प्रामाणिक सवाल खड़े करें। जो लोग तटस्थ रहकर अपनी राय बनाना चाहते हैं, वे दोनों पक्षों के तर्कों को तौलकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचें।

लोकतंत्र की असली खूबसूरती इस बात में नहीं है कि सब एक जैसा सोचें, बल्कि इस बात में है कि हम एक-दूसरे से पूरी तरह असहमत होते हुए भी एक-दूसरे को सुनने और समझने का धैर्य रखें। किसी विचार से सहमत होना या उसे स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन उस विचार को खारिज करने से पहले उसे सही संदर्भ में समझना बौद्धिक ईमानदारी की प्राथमिक शर्त है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क भाषण को इसी लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। न तो इसे बिना सोचे-समझे पूर्ण सत्य मानकर स्वीकार करने की आवश्यकता है, और न ही बिना सुने आंख बंद करके खारिज करने की। सवाल उठाइए, तीखी आलोचना कीजिए, असहमति प्रकट कीजिए, लेकिन यह सब तथ्य, तर्क और सुनने के धैर्य के साथ होना चाहिए। किसी भी जीवंत लोकतंत्र में सबसे आसान काम बिना सुने आरोप लगा देना है, और सबसे कठिन काम विरोधी विचार को ध्यानपूर्वक सुनना।

आज के समय में भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को इसी कठिन, परिपक्व और धैर्यपूर्ण रास्ते की सबसे ज्यादा जरूरत है। पहले सुनना, फिर समझना और उसके बाद तर्कसंगत निर्णय लेना ही एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज का मार्ग है।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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