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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: फाउंटेनहेड अपने विश्वासों के अनुसार

Mon, 31 Aug 2026 04:32 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Mon, 31 Aug 2026 04:32 PM IST
सार

 ‘फाउंटेनहेड’ पर 1949 में किंग विडोर ने करीब दो घंटे की फिल्म बनाई है। कहानी और फिल्म में कई समानता है। प्रतिभाशाली वास्तुकार नायक हॉवर्ड रोर्क (गैरी कूपर) में आत्मसम्मान और दृढ़ विश्वास में कूट-कूट कर भरा है।

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history of world cinema The Fountainhead directed by King Vidor
सिनेमा की दुनिया - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

हाल में किंग विडोर निर्देशित फिल्म ‘फाउंटेनहेड’ देखी। किताब बहुत पहले पढ़ी थी, तब मोटी-मोटी किताबें पढ़ना शगल था। 700 से ऊपर पन्नों की किताब पढ़ना अब नहीं होता है। सोशल मीडिया के कारण ऐसा नहीं है, उम्र के कारण है। शक्तिशाली कलम की धनी ऐन रैंड की इसी नाम की ‘फाउंटेनहेड’ किताब 1943 में प्रकाशित हुई।

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रशियन-अमेरिकन लेखिका ऐन रैंड का मूल नाम एलिसा रोसेनबाउम है। उन्होंने ‘फाउंटेनहेड’ के अलावा कई किताबें लिखीं, मगर प्रसिद्ध केवल दो हुई ‘फाउंटेनहेड’ और ‘एटलस श्रग्ड’। एक समय पाठकों के बीच इन किताबों की धूम थी। कई लोग इनसे प्रभावित एवं प्रेरित थे। आज यह मजाक और बेवकूफी लग सकता है।
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इसी ‘फाउंटेनहेड’ पर 1949 में किंग विडोर ने करीब दो घंटे की फिल्म बनाई है। कहानी और फिल्म में कई समानता है। प्रतिभाशाली वास्तुकार नायक हॉवर्ड रोर्क (गैरी कूपर) में आत्मसम्मान और दृढ़ विश्वास में कूट-कूट कर भरा है। वह उत्कृष्ट कार्य करता है और इस बात को जानता है। सर्वोत्तम संभव संरचनाएं बनाने की कोशिश करता है।
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इस ईमानदार विजनरी वास्तुकार का मत है, दुनिया में सारे आविष्कार व्यक्तिगत उपलब्धि हैं। सामूहिक प्रतिभा कोई वास्तविकता नहीं है। लेकिन समाज उसके इस विचार से सहमत नहीं है। दुनिया में ऐसे लोग हैं, जो ऐसी प्रतिभा को नष्ट करना चाहते हैं।

उपन्यास प्रत्येक पात्र को विस्तार से विकसित-चित्रित करता है, फिल्म में यह संभव नहीं है। अपने मिशन में हॉवर्ड रोर्क को कई अड़चनों का सामना करना पड़ता है। उसके सामने आर्थिक समस्या है, पेशेगत स्पर्धा है (जिसके झांसे में वह अंत तक नहीं आता है)। मेहनती हॉवर्ड को समाज अविवेकी, विनाशी और अनियंत्रित वास्तुकार के रूप प्रचारित करता है। हॉर्वर्ड अंत तक डिगता नहीं है, भले ही अपने विचारों, सत्यनिष्ठा का खामियाजा भुगतता है।

हॉवर्ड रोर्क के विचार देखिए: 'एक घर में भी व्यक्ति की तरह ही अखंडता हो सकती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी व्यक्ति में होती है... घर का हर हिस्सा इसलिए मौजूद होता है, क्योंकि घर को उसकी आवश्यकता होती है- और किसी अन्य कारण से नहीं।' 

उपन्यास मुख्य पात्रों के नाम- पीटर कीटिंग, एल्सवर्थ टूही, गेल वायनांड, हॉवर्ड रोर्क- चार भागों में विभाजित है। गे फ्रैंकन (जोनाथन हेल) की बेटी, स्वतंत्र विचारों वाली डोमिनिक फ्रैंकन को अलग अध्याय में नहीं रखा गया है, मगर वह एक विशिष्ट पात्र है। फिल्म में यह पात्र पैट्रिशिया नील ने निभाया है। चालाक पीटर कीटिंग अपने स्वार्थ केलिए उसकी ओर आकर्षित है। उपन्यास एवं फिल्म दोनों में दिखाया गया है, दुनिया के अधिकांश लोग यह नहीं जानते हैं, वे वास्तव में क्या चाहते हैं। 

अखबार का मालिक गेल वायनांड (रेमंड मेस्सी) एक दिलचस्प पात्र है, उसका मूल्य उद्योग से लाभ कमाना है। इसके एवज में वह दूसरों के विचारों को बढ़ावा देने के लिए अखबारों का साम्राज्य खड़ा करता है। समाज की बेहतरी अथवा बद्तरी से उसका कुछ लेना-देना नहीं है। जबकि रोर्क अपने लिए काम करता है, समाज की बेहतरी उसका ध्येय है। एल्स्वर्थ टूही एक बौद्धिक, आर्ट क्रिटिक पत्रकार है। जो आर्किटेक्ट न होते हुए भी इस विषय के विशेषज्ञ की हैसियत रखता है। वह सामूहवाद की वकालत करता है। 

एक पत्रकार कितना शक्तिशाली हो सकता है, एल्स्वर्थ टूही (रॉबर्ट डगलस) इसका एक उदाहरण है। पीटर कीटिंग चापलूसी, छल, धौंस, फुसलाने और ब्लैकमेल में माहिर है, इसी के बल पर वह तरक्की करता जाता है। मगर उसे स्वतंत्र और आत्मनिर्भर लोगों से डर लगता है, जिन्हें वह अपने लाभ के लिए प्रभावित नहीं कर सकता है।

वास्तुकला के साथ शहरी जीवन दर्शाती रचना

वास्तुकला के साथ शहरी जीवन को वर्णित करती इस किताब को पढ़ना सरल नहीं है, शुरू में ढेर-सारी दार्शनिक बातें हैं। पर फिल्म विजुअल माध्यम है, इसे देखना सरल है। इसकी पहुंच भी व्यापक है। फिल्म (किताब) के कुछ संवाद खूब प्रभावशाली हैं, कुछ बानगी देखिए:

अपने विश्वासों एवं इच्छाओं के अनुसार जीवन जीएं।’, ‘दृढ़ता बनाए रखना विशिष्ट है।’ हावर्ड रोर्क जैसे लोग विरल होते हैं, जबकि पीटर कीटिंग जैसे लोग एक खोजें तो चार क्या दस मिलेंगे। रोर्क जैसे लोग मुसीबत में टूटते नहीं हैं, कीटिंग जैसे लोग अपने स्वार्थ केलिए किसी हद तक गिर सकते हैं।

और ये वाक्य आज के संदर्भ में कितने सटीक हैं, ‘मीडिया खतरनाक और कपटी है, अविश्वसनीय लोग लाभ के लिए विनाशकारी विचार फैला सकते हैं। आप जो कुछ भी ग्रहण करते हैं, उसके प्रति सावधान रहें।’ ‘अधिकांश लोगों को यह नहीं पता होता, वे क्या चाहते हैं, इसलिए वे दूसरों की राय को अपना लेते हैं। इससे राय रखने वाले लोगों को बहुत अधिक शक्ति मिल जाती है।’

‘अपनी आत्मा बेचना दुनिया का सबसे सरल कार्य है। प्रत्येक अपने जीवन के हर क्षण यही करता है। अगर मैं आपसे कहूं, आप अपनी आत्मा को बचाकर रखें- यह कितना मुश्किल है, तो क्या आप समझ पाएंगे?’

‘ऑब्जेक्टिविज्म’

उपन्यास एवं फिल्म एक विशेष विचारधारा ‘ऑब्जेक्टिविज्म’ पोषण करती है। उपन्यास एवं फिल्म बौद्धिकों के बीच चर्चा का बायस बनी हालांकि सामान्य पाठक तथा दर्शक ने इसे नहीं सराहा, उसके लिए यह एक मानसिक कसरत भर रहा। ‘ऑब्जेक्टिविज्म’ पद का निर्माण ऐन रैंड ने किया उन्होंने ही इसका पल्लवन-पोषण किया।

उनके अनुसार मनुष्य का ज्ञान एवं मूल्य वस्तुनिष्ठ होते हैं। यह वस्तुनिष्ठता अस्तित्व में होती है। उन्होंने यह पद चुना क्योंकि ‘अस्तित्ववाद’ पद पहले से प्रयोग में था। उनके अनुसार आदमी की अपनी खुशी बडी बात है, वह यह अपने कार्य द्वारा पा सकता है। यही उसके जीवन का नैतिक उद्देश्य है।

इस फिलॉसफी को बहुत सारे लोगों ने स्वार्थ की संज्ञा दी, नकार दिया। ऐसे लोग मानते हैं, स्वार्थी होने से खुशी मिलती है। पैसा आना चाहिए चाहे वह किसी राह से आए, और पैसा दैनंदिन जीवन केलिए आवश्यक है।

यह जीवन की विडम्बन है, यदि आप लोगों का समर्थन चाहते हैं, तो आपको दूसरों के अनुसार जीना होता है। एल्स्वर्थ टूही की तरह लोग किसी की प्रतिभा, स्वतंत्रता, वय्क्तित्ववाद देखते हैं तो तत्काल उसे नष्ट करने में जुट जाते हैं। जबकि प्रतिभाएं नि ही संभ्यता-संस्कृति का विकास किया है।

श्रेष्ठता को पूजने वाले, श्रेष्ठता पाने केलिए संघर्ष करते, अपने मूल्यों और अपने सुख केलिए जीने वाले हॉवर्ड रोर्क को देखिए और स्वयं तय कीजिए आप जैसा जीवन चाहते हैं। ‘फाउंटेनहेड’ उपन्यास भले पढ़ें, या न पढ़ें पर यह श्वेत/श्याम फिल्म अवश्य देख लें।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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