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जंगलों में घूमकर हाथियों का इलाज करता है ये डॉक्टर, 'एलिफैंट डॉक्टर' के नाम से है मशहूर

Mon, 28 Sep 2020 11:35 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Mon, 28 Sep 2020 11:35 AM IST
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tribute to the elephant man of asia Dr. Kushal Konwar who treats elephants by walking in the jungles
हाथियों का इलाज - फोटो : सोशल मीडिया

भारत के वन्यजीव समुदाय में 'एलिफैंट डॉक्टर' के नाम से मशहूर 59 साल के डॉक्टर कुशल कुंवर शर्मा जब हाथियों के बारे में बात करते है तो उनका चेहरा खुशी से खिल उठता है। वे बेहद जोश के साथ कहते है, "मैं हाथियों के साथ ही खुश रहता हूं।" अपनी जिंदगी के 35 साल हाथियों की देखभाल और इलाज करने में गुगार चुके डॉक्टर शर्मा ने असम और पूर्वोत्तर राज्यों के जंगलों से लेकर इंडोनेशिया के जंगल तक हजारों हाथियों की जान बचाई है।



हाथियों के साथ उनके जुड़ाव की कहानी इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि असम तथा भारत के कई राज्यों में उन्हें लोग 'एलिफैंट डॉक्टर' के नाम से पहचानने लगे है। अपनी जान की परवाह किए बगैर हाथियों के इलाज के लिए जंगलों में घूमने वाले डॉक्टर शर्मा ने बीबीसी से कहा, "मैंने हाथियों के साथ अपने जीवन का जितना समय गुजारा है उतना समय मैं अपने परिवार को नहीं दे पाया हूं। खासकर असम के हाथियों से मुझे बहुत प्यार है। मैं यहां के हाथियों की गतिविधियों से उनकी भाषा समझ लेता हूं। उनसे संकेत में बात करता हूं। उनके लिए खाने का सामान लेकर आता हूं। यहां के अधिकतर हाथी अब मुझे पहचानते है।"

tribute to the elephant man of asia Dr. Kushal Konwar who treats elephants by walking in the jungles
हाथियों का इलाज - फोटो : सोशल मीडिया

मुश्किल में फंसे जानवरों की मदद
हाथियों के प्रति उनके प्यार और सेवा को देखते हुए इस साल भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा है। वे देश के पहले पशुचिकित्सक है जिन्हें पद्मश्री मिला है। डॉक्टर शर्मा के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दफ्तर ने पद्मश्री सम्मान के लिए उनका नामांकन भेजा था। वो बताते है, "मुझे कई महीनों तक इस बात के बारे में पता ही नहीं था कि पद्मश्री के लिए मेरा नाम किसने नामांकित किया था। काफी दिनों बाद भारत सरकार के एक अधिकारी ने बातचीत के दौरान बताया कि मेरा नामांकन पीएमओ से भेजा गया था।"

tribute to the elephant man of asia Dr. Kushal Konwar who treats elephants by walking in the jungles
हाथियों का इलाज - फोटो : सोशल मीडिया

बाढ़ के दौरान खासकर कागीरंगा नेशनल पार्क में हाथी समेत कई दुर्लभ प्रजाति के जानवरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। गुवाहाटी स्थित कॉलेज ऑफ वेटरीनरी साइंस के सर्जरी और रेडियोलॉजी विभाग में पढ़ाने वाले प्रोफेसर डॉक्टर शर्मा की गरूरत उस समय सबसे ग्यादा होती है। फिर चाहे उन्हें कोई आधिकारिक तौर पर मदद के लिए बुलाए या नहीं, वे खुद ही मदद के लिए पहुंच जाते है। बीते कई सालों से उन्होंने सैकड़ों वन्य जीवों की जान बचाई है। हाथियों के साथ अपने जीवन के कई भावुक किस्सों का गिक्र करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं कि जब किसी हाथी की मौत होती है तो वो बैचेनी महसूस करते हैं।

वो कहते हैं, "कई साल पहले बाढ़ के कारण एक हथिनी की मौत हो गई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि उसका चार महीने का बच्चा मरी हुई हथिनी का दूध पीने की कोशिश कर रहा था। मेरे लिए वह बेहद दुखदायी पल था। जीवन में ऐसी कई घटनाएं है जिन्हें मैं भूल नहीं पाया हूं।"

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हाथियों का इलाज - फोटो : सोशल मीडिया

बाढ़ के दौरान कागीरंगा नेशनल पार्क में काम करने के अनुभव साझा करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं, "बाढ़ के दौरान कागीरंगा नेशनल पार्क में जानवरों को काफी नुकसान पहुंचता है। कई जानवर मारे जाते हैं। कई बार तो बाढ़ के पानी में हाथी तक बह जाते हैं। बाढ़ के समय कई हाथी के बच्चे अपनी मां से बिछड़ जाते है। ऐसे हालात में उनको देखभाल और सहारे की गरूरत होती है। इसलिए मैं बाढ़ के समय जानवरों की मदद करने वहां जाता हूं।"

"मेरी कोई आधिकारिक ड्यूटी नहीं लगती लेकिन जब बड़ी बाढ़ आती है तो मैं खुद वहां जाता हूं ताकि ग्यादा से ग्यादा जानवरों की जान बचा सकूं। कागीरंगा में सेंटर फॉर वाइल्ड लाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंगर्वेशन का बचाव केंद्र है। बाढ़ में गख्मी हुए जानवरों को वहां लाया जाता है और मैं वहां की टीम के साथ मिल कर घायल जानवरों का इलाज करता हूं।"

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हाथियों का इलाज - फोटो : सोशल मीडिया

'हाथी देते हैं बाढ़ का इशारा'
हाथियों के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. शर्मा कहते है, "हाथी बुद्धिमान जानवर होता है। क्योंकि बाढ़ आने का अनुमान उसे छह-सात दिन पहले ही हो जाता है। इसलिए ग्यादातर हाथी कागीरंगा के जंगल से निकल कर ऊंची पहाड़ी की तरफ चले जाते हैं। यह बात कई वन्यजीव एक्सपर्ट को भी पता हैं। वन अधिकारियों को भी हाथियों की गतिविधियों से पता चलता है कि बाढ़ आने वाली है।"

कई साल पहले आई एक बाढ़ का गिक्र करते हुए डॉ. शर्मा बताते हैं, "बाढ़ से पहले कागीरंगा के लगभग सारे हाथी कार्बी-आंग्लोंग के रास्ते नागालैंड होते हुए म्यांमार तक चले जाते थे और जब बाढ़ का पानी कम होता तो वे वापस लौट आते थे। लेकिन वापस लौटने के दौरान उनके साथ कई हादसे होते थे। नागालैंड में पहाड़ी जनजाति के लोग हाथियों को मार कर खा जाते थे। इन घटनाओं के पीछे हाथी दांत की तस्करी भी एक कारण था। इसलिए जब हाथी वापस कागीरंगा लौटते थे तो उनकी संख्या घट जाती थी। अब हाथियों ने इस बात को समझ लिया है और बाढ़ के दौरान कागीरंगा से बाहर जाना छोड़ दिया है।"

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