Frozen Water on Moon: साल 2009 में एक रॉकेट चांद की सतह से नौ हजार किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से टकराया था जिसका वजन दो टन है। इस टक्कर के बाद इतनी भीषण आग निकली की चांद की सतह सैकड़ों डिग्री सेल्सियस गर्म हो गई। काले गहरे क्रेटर (गड्ढे) से सफेद रोशनी निकलती नजर आई। इस क्रेटर का नाम कैबियस है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने लूनर क्रेटर ऑब्जरवेशन एंड सेंसिंग सैटेलाइट (LCROSS) की जानबूझकर चांद की सतह से टक्कर कराई थी। नासा यह जानना चाहता था कि चांद पर अंधेरे वाले इलाके में रॉकेट के टकराने से क्या होता है? या कैसी धूल या धुआं बाहर निकलता है?
इस रॉकेट के पीछे नासा ने अपना एक दूसरा अंतरिक्षयान भेजा था जिससे टक्कर के दौरान की तस्वीरें ली जा सकें। इसके साथ ही नासा का लूनर रीकॉनसेंस ऑर्बिटर दूर से ही परी घटना का निरीक्षण कर रहा था। दोनों अंतरिक्षयानों की तस्वीरों को देखने के बाद वैज्ञानिक हैरत में पड़ गए। वैज्ञानिकों ने चांद की सतह पर रॉकेट की टक्कर से उठने वाली धूल में 155 किलोग्राम पानी का भाप देखा। उस दौरान पहली बार चांद की सतह पर पानी मिला था।
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चांद के अंधेरे इलाके का खुला हस्य
- फोटो : Twitter @UUx4whxHO5injW3
नासा के अमेस रिसर्च सेंटर में लूनर क्रेटर ऑब्जरवेशन एंड सेंसिंग सैटेलाइट के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर एंथनी कोलाप्रेट ने इस नजारे को हैरतअंगेज बताया था। उन्होंने कहा कि तस्वीरों की जितनी बार जांच की गई उतनी बार नतीजा वही था। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्लैनेटरी साइंटिस्ट मार्क रॉबिन्सन का कहना है कि चांद पर पानी का कोई स्रोत नहीं है और ना कोई खान है यह सच्चाई है।
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- फोटो : Pixabay
उनका कहना है कि चांद पर वायुमंडल नहीं है। वहां पर बेहद एक्सट्रीम पर्यावरण की वजह से कही से पानी बनने और रुकने की कोई संभावना नहीं रहती है। एक अंतरिक्षयान ने 25 साल पहले जब चांद के ध्रुवों पर हाइड्रोजन की खोज की थी तब भी वहां पर बर्फ जमी होने की संभावना जताई गई थी। इस थ्योरी को LCROSS की तरफ से प्रमाणित भी किया गया।
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जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर सिस्टम रिसर्च के साइंटिस्ट वैलेंटीन बिकेल ने एक चौकाने वाली बात बताई है। उनका कहना है काफी जांच के बाद यह जानकारी मिली है कि चांद पर छह लाख किलोग्राम पानी मौजूद है। इनमें से चांद के जिन दोनों ध्रुवों के ज्यादातर इलाके हैं वहां पर हमेशा अंधेरा रहता है। इनको पर्मानेंटली शैडोड रीजन्स (PSRs) कहा जाता है। इन इलाको में कैबियस की तरह क्रेटर्स मौजूद हैं। यहां हमेशा अंधेरा रहता है, क्योंकि कभी सूरज की रोशन नहीं पहुंचती है।
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एक दूसरे वैज्ञानिक का कहना है कि कुछ पर्मानेंटली शैडोड रीजन्स प्लूटो से भी ठंडे हैं जिसका मतलब है कि वहां पर जरूर बर्फ होगी और इनके पिघलने की उम्मीद बेहद कम है। उन्होंने संभावना जताई है कि इनके अंदर पड़ी बर्फ करोड़ों साल से वैसी की वैसी ही हो। उनका कहना है कि यहां धरती पर पानी के बनने और उत्पत्ति का कोई संबंध हो। यह लंबे अंतरिक्ष मिशन के दौरान इंसानों के काम आ सके।