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आज का रहस्य: बेहद रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर, जानिए क्या है इसका इतिहास

Mon, 11 Oct 2021 12:18 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: धर्मेंद्र सिंह Updated Mon, 11 Oct 2021 12:18 PM IST
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mysterious story of 1100 years old maa mahamaya temple know the history behind this temple
रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

भारत में कई अनोखे और चमत्कारिक मंदिर हैं जिनसे कई रहस्य जुड़े हुए हैं। इनमें कई ऐसे मंदिर हैं जिनके रहस्यों को आज तक कोई नहीं सुलझा पाया है। इसी कड़ी में हम आपको 11 सौ साल पुराने माता के मंदिर के बारे में बताते हैं जिससे कई रोचक कहानियां जुड़ी हुई हैं। यह चमत्कारिक मंदिर झारखंड के गुमला जिले में स्थित है। गुमला जिला मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर घाघरा प्रखंड के हापामुनी गांव में स्थित इस मंदिर का निर्माण 1100 साल पहले विक्रम संवत 965 में हुई थी। हिंदुओं के आस्था केंद्र इस मंदिर की खास बात यह है कि मां महामाया को आज भी बक्शे में बंद कर रखा जाता है।



चैत कृष्णपक्ष परेवा (अमावस्या) को डोल जतरा का महोत्सव होता है। इसी दिन मंजूषा (बक्शे) को डोल चबूतरा पर निकाला जाता है और मंदिर के मुख्य पुजारी बक्शे को खोलकर महामाया की पूजा करते हैं। पुजारी आखों पर पट्टी बांधकर मां की पूजा करते हैं। आईए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी कथाएं...

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रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

मां की मूर्ति को खूली आंखों से नहीं देख सकते 

चमात्कारिक मां महामाया मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि मां की मूर्ति को खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता है जिसकी वजह से मां महामाया की मूर्ति को बक्शे में बंद कर रखा जाता है। इसलिए मंदिर में प्रतीक के तौर पर दूसरी मूर्ति भी स्थापित की गयी है जिसकी भक्त पूजा करते हैं। चैत्र कृष्णपक्ष परेवा (अमावस्या) को यहां पर हर साल डोल जतरा महोत्सव का आयोजन होता है। इस दौरान मंजूषा (बक्शे) को मंदिर के बाहर चबूतरा पर रखा जाता है और इसके बाद मंदिर के मुख्य पुजारी माता की पूजा करते हैं। लेकिन पूजा करते समय पुजारी की आंखों पर पट्टी बांधी दी जाती है। मंदिर के मुख्य पुजारी विशेष अवसर पर पूजा करते हैं।

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रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

इस आंदोलन से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

बताया जाता है कि प्रसिद्ध महामाया मंदिर का इतिहास लरका आंदोलन से जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोग बताते हैं कि हापामुनी गांव का एक व्यक्ति जिसका नाम बरजू राम था वह मां महामाया की मंदिर में पूजा कर रहा था। उसी समय बाहरी लोगों ने यहां हमला कर दिया और बरजू राम की पत्नी-बच्चे को मार दिया। बरजू के दोस्त राधो राम ने बरजू को बताया कि उसकी पत्नी और बच्चे की हत्या हो गई है। इसके बाद राधो राम ने मां महामाया की शक्ति से हमलावरों से लड़ गया। तब मां महामाया ने प्रकट होकर राधो राम से कहा कि तुम अकेले इन आक्रमणकारियों से लड़ सकते हैं, लेकिन तुम पीछे देखोगे तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग हो जाएगा।

मां भगवती की कृपा से राधो राम अपनी तलवार से हमलावरों पर विजय पाने लगा, लेकिन उसने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा उसका सिर धड़ से अलग हो गया। राधो राम जिस स्थान पर पूजा करता था उस जगह पर आज उन दोनों की समाधि है। मुख्य मंदिर आज भी खपरैल का ही बना हुआ है। मंदिर में कई देवी देवताओं की प्रतिमा है। 

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रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
भूतों को किया था समाप्त

महामाया मंदिर के बारे में बताया जाता है कि हापामुनी गांव में 11 सौ साल पहले यहां पर एक मुनी आए हुए थे। वह बहुत कम बोलते थे और मुंडा जाति के लोग उनको हप्पा मुनी कहकर पुकारते थे। मुंडा भाषा में हप्पा का मतलब होता है चुप रहना। मुनी के नाम पर ही इस गांव का नाम हप्पामुनी पड़ा, लेकिन गांव का नाम बदलकर बाद में हापामुनी गांव कर दिया गया। मांडर थाना क्षेत्र में दक्षिणी कोयल नदी है जहां एक विशाल दह है जिसे लोग इस समय बियार दह के नाम से जानते हैं। लोग कहते हैं कि यहां पर हीरा एवं मोती मिलती है। 
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रहस्यमयी है 1100 साल पुराना मां महामाया मंदिर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock


बताया जाता है कि विक्रम संवत 959 में हीरा एवं मोती की खोज करने गए हजारों लोग दह में डूबकर मर गए। यह बात फैल गई कि दह में डूबकर मरने वाले लोग अपने-अपने गांव में भूत बनकर घूम रहे हैं। हप्पामुनी के निर्देश पर वहां के नागवंशी राजा ने मां भगवती को लाने के लिए विंध्याचल चले गये। राजा ने विंध्याचल में 3 साल तक मां भगवती की तपस्या की। तपस्या के बाद राजा मां भगवती के इस्ट को लेकर पैदल आ रहे थे। इसी दौरान उन्होंने टांगीनाथधाम में देवी भगवती को जमीन पर रख दिया और मां जमीन में समां गयी। मुनी ने माता की स्तुति की जिसके बाद मां भगवती मुरलीधर को लेकर बाहर आयीं। राजा भगवती को लेकर गांव आए जिससे गांव से भूतों का तांडव समाप्त हुआ। इसके बाद मंदिर में मां भगवती को स्थापित किया गया। 

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