दुनियाभर में तमाम तरह के एक्सपेरिमेंट (प्रयोग) होते रहते हैं। हालांकि, इनमें से कुछ के बारे में लोगों का पता होता है, जबकि कुछ गुप्त रूप से ही किए जाते हैं। कुछ इसी तरह का ही एक एक्सपेरिमेंट 1940 के दशक में किया गया था, जिसके बारे में जानकर लोगों की रूह कांप जाती है। इस एक्सपेरिमेंट को 'रशियन स्लीप एक्सपेरिमेंट' के नाम से जाना जाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
आपको बता दें कि इस एक्सपेरिमेंट के लिए जेल में बंद पांच कैदियों के साथ एक डील की गई और उनसे कहा गया कि अगर वो इसका हिस्सा बनते हैं, तो एक्सपेरिमेंट खत्म होने के तुरंत बाद उन्हें छोड़ दिया जाएगा। इसके लिए उन्हें बताया गया कि 30 दिन तक उन्हें बिना सोए रहना होगा, जिसके लिए कैदी राजी हो गए। इसके बाद उन्हें एक एयर टाइट चैंबर में बंद कर दिया गया और उसमें एक गैस डाल दी गई, जिससे कैदियों को नींद न आए और वैज्ञानिक यह देख सकें कि इसका उनपर क्या प्रभाव पड़ता है।
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शुरुआत में तो सबकुछ ठीक था। सारे कैदी आराम से एक दूसरे से बातें करते रहते थे। उनकी बातों को वैज्ञानिक रिकॉर्ड भी करते रहते थे और साथ ही एक कांच के जरिए उनपर नजर भी बनाए हुए थे। करीब एक हफ्ते तक तो सारे कैदियों की हालत ठीक थी, लेकिन उसके बाद उनकी हालत बिगड़ने लगी।
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कैदियों ने धीरे-धीरे एक दूसरे से बात करना बंद कर दिया। वो बैठे-बैठे अपने आप ही कुछ-कुछ बोलते रहते थे। ऐसे ही 10 दिन बीत गए। फिर जैसे ही 11वां दिन आया, एक कैदी अचानक जोर-जोर से चिल्लाने लगा। वह इतनी तेज-तेज चिल्ला रहा था कि कहते हैं कि उसकी वोकल कॉर्ड फट गई थी। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये थी कि उसके चिल्लाने का बाकी कैदियों पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा।
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कैदियों की हालत देखकर वैज्ञानिकों ने इस एक्सपेरिमेंट को रोकने का फैसला किया। उन्होंने 15वें दिन कैदियों वाले चैंबर में वो गैस नहीं डाली, जिसकी मदद से कैदियों को सोने से रोका जाता था। लेकिन इसका उल्टा ही प्रभाव पड़ा। सारे कैदी अचानक से चिल्लाने लगे और कहने लगे कि हमें बाहर मत निकालो, हम बाहर नहीं आना चाहते। इस बीच चैंबर में ही एक कैदी की मौत भी हो गई।