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मुगलों के समय कुछ इस तरह से मनाया जाता था क्रिसमस, बादशाह अकबर भी जाते थे चर्च

Fri, 25 Dec 2020 05:51 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Fri, 25 Dec 2020 05:51 PM IST
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आगरा किला - फोटो : अमर उजाला

दिल्ली समेत दूसरे शहरों और उनके होटलों में क्रिसमस का जश्न मनाती आज की पीढ़ी को यह जानकर हैरानी होगी की मुगल शासक भी क्रिसमस मनाते थे। औरंगजेब और कुछ कठपुतली राजाओं को छोड़ दिया जाए तो अकबर से लेकर शाह आलम तक के मुगल शासकों ने क्रिसमस मनाया है। मध्ययुगीन यूरोप में क्रिसमस का जन्म हुआ था लेकिन उत्तर भारत में इसकी शुरुआत अकबर के समय हुई जिसने एक पादरी को आगरा में अपने राजदरबार में आमंत्रित किया था।



मुगलकाल में आगरा पूर्व का सबसे आलीशान शहर था। दिवंगत लेखक थॉमस स्मिथ ने कहा था कि जो भी यूरोपवासी इस जगह पर आता था वो इसकी गलियों की चकाचौंध, व्यापार की समृद्धि और हार की तरह महलों के साथ सजी यमुना नदी की ख़ूबसूरती को देखकर प्रभावित हो जाता था।

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बादशाह अकबर - फोटो : सोशल मीडिया

आगरा में दिखता था क्रिसमस का रंग
वह कहते थे, "यह एक महानगर था जिसमें इटली के सुनार, पुर्तगाल और डच के जहाज के मालिक थे। फ्रांस के पर्यटक, व्यापारी और मध्य एशिया एवं ईरान के कारीगरों समेत मध्य पूर्व के विद्वान आगरा का दौरा करते थे।" इतने विदेशियों के होने के कारण उन दिनों क्रिसमस एक बड़ी चीज हुआ करता था।

फ्रांसिस्कन एनल्स बताते हैं कि "एक जनसमूह की खुशी पूरे शहर में फैली रहती थी।" बाजारों में त्योहार की छटा साफ दिखती थी। दिसंबर की सर्द हवा में बाजारों में रंग बिरंगे मेहराब, बैनर और कई देशों के झंडे लहराते दिखते थे। "तुरही, शहनाई बजती थी, पटाखे फूटते थे और चर्च का घंटा बजता था।"

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अकबर चर्च - फोटो : सोशल मीडिया

अकबर ने पादरी को शहर में एक भव्य चर्च बनाने की अनुमति दी थी जिसमें कई भारी घंटे लगे थे और उसमें से एक अकबर के बेटे जहांगीर के शासनकाल में गिर गया। कोतवाली शहर में इसको एक हाथी भी नहीं ले जा सकता था। यह घंटा जहांगीर के भतीजे के लिए हुए एक भव्य कार्यक्रम के दौरान टूट गया। कहा जाता है कि उस समय चर्च का कर्मचारी 'खुशी से पागल हो गया था' और घंटे को तब तक बजाता रहा जब तक वह टूटकर गिर नहीं गया।

सौभाग्य से इस दौरान कोई घायल नहीं हुआ और कर्मचारी की नौकरी भी नहीं गई। अकबर और जहांगीर इस त्योहार को मनाते थे और आगरा के किले में पारंपरिक भोज मे भाग लेते थे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

बिशप की तरह अकबर का स्वागत
क्रिसमस की सुबह अकबर अपने दरबारियों के साथ चर्च आते थे और प्रतीकात्मक रूप से ईसा मसीह के जन्म को दिखाने के लिए बनाई गई गुफा को देखते थे। शाम में हरम की महिलाएं और युवा राजकुमारी लाहौर में चर्च का दौरा करती थीं और मोमबत्तियां पेश करती थीं। अकबर जब हर क्रिसमस पर आगरा के चर्च में आते थे तो उनका स्वागत एक 'बिशप की तरह' होता था, घंटियां बजाई जाती थीं और भजन गाए जाते थे। जो यूरोपवासी मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें करते थे और लड़ते थे वो सब कुछ भूलकर इस त्योहार में भाग लेते थे।

आगरा और शायद उत्तर भारत उनके लिए क्रिसमस पर खेले जाना वाला खेल लेकर आया। क्रिसमस की रात वह आमतौर से छोटे बच्चे और बच्चियों को परियों के परिधान पहनाकर ईसा मसीह के जन्म का नाटक खेला करते थे।

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Christmas Tree - फोटो : Pixabay

शाही फौज पर सुरक्षा का जिम्मा
अकबर और जहांगीर के समय नाटक को बेहतर तरीके से आयोजित किया जाता था। नाटक के दौरान शांति बनाए रखने के लिए शाही फौज आती थी क्योंकि बिन बुलाई जनता के कारण प्रदर्शन टूटने का खतरा रहता था। नाटक की रिहर्सल बाजार के इलाके में होती थी जिसे अब 'फुलट्टी' के नाम से जाना जाता है। वहां ब्रिटिश मुख्यालय हुआ करता था। 1632 के बाद नाटक बंद कर दिया गया, क्योंकि शाहजहां का पुर्तगालियों से मतभेद हो गया था।

हुगली बंदरगाह बंद करने के बाद आगरा में चर्च को तोड़ दिया गया और इसाईयों द्वारा सार्वजनिक प्रार्थना पर पाबंदी लगा दी गई। उस समय सैकड़ों पुर्तगाली कैदी आगरा में थे जो बंगाल से लाए गए थे। लेकिन 1640 में जब मुग़लों और पुर्तगालियों के बीच रिश्ते ठीक हुए तो उन्हें आगरा में फिर से चर्च बनाने की अनुमति दी गई। चर्च अभी भी मौजूद है लेकिन मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला के समय तक नाटक नहीं खेला जाता था। रंगीला ने आगरा और दिल्ली में अकबर के समय से रह रहे फ्रांस के बर्बनों और डच लोगों की सहायता की थी।

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