हमेशा से ही 82,698 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैदराबाद रियासत की गिनती भारत के प्रमुख राजघरानों में की जाती थी। इसका क्षेत्रफल ब्रिटेन और स्कॉटलैंड के क्षेत्र से भी अधिक था और आबादी (एक करोड़ 60 लाख) यूरोप के कई देशों से अधिक थी। शायद इसके विशेष दर्जे की वजह से ही उसे आजादी के बाद भारत में शामिल होने या न होने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था। उस समय भारत के गृह सचिव रहे एच वीआर आयंगर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'सरदार पटेल का शुरू से ही मानना था कि भारत के दिल में एक ऐसे क्षेत्र हैदराबाद का होना, जिसकी निष्ठा देश की सीमाओं के बाहर हो। भारत की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा था।'
हैदराबाद के भारत में मिलने की हैरान करने वाली कहानी, हुआ था कुछ ऐसा
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नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में रखे इस इंटरव्यू में आयंगर यहां तक कहते हैं कि पटेल की दिली इच्छा थी कि निजाम का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। हालांकि नेहरू और माउंटबेटन की वजह से पटेल अपनी इस इच्छा को पूरा नहीं कर पाए। नेहरू पटेल को हमेशा याद दिलाते रहे कि हैदराबाद में बड़ी संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यक रहते हैं। निजाम से पिंड छुड़ाने के बाद होने वाले असर को संभाल पाना भारत के लिए मुश्किल होगा।
माउंटबेटन को ये खुशफहमी थी कि वो नेहरू की मदद से निजाम को संभाल सकते हैं, लेकिन पटेल ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि 'आपका मुकाबला एक लोमड़ी से है। मुझे निजाम पर कतई विश्वास नहीं है। मेरा मानना है कि आपको निजाम से धोखा ही मिलेगा।' पटेल की नजर में उस समय का हैदराबाद 'भारत के पेट में कैंसर' की तरह था जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था।
सेना भेजने पर पटेल और नेहरू में मतभेद
शुरू में नेहरू हैदराबाद में सेना भेजने के पक्ष में नहीं थे। पटेल के जीवनीकार राजमोहन गांधी लिखते हैं, 'नेहरू का मानना था कि हैदराबाद में सेना भेजने से कश्मीर में भारतीय सैनिक ऑपरेशन को नुकसान पहुंचेगा।' एजी नूरानी अपनी किताब 'द डिसट्रक्शन ऑफ हैदराबाद' में लिखते हैं, 'हैदराबाद के मुद्दे पर कैबिनेट बैठक बुलाई गई थी, जिसमें नेहरू और पटेल दोनों मौजूद थे। नेहरू सैद्धांतिक रूप से सैन्य कार्रवाई के खिलाफ नहीं थे, लेकिन वो इसे अंतिम विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे। वहीं, पटेल के लिए सैनिक कार्रवाई पहला विकल्प था। बातचीत के लिए उनके पास धैर्य नहीं था। नेहरू निजाम की नीतियों के खिलाफ जरूर थे, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उनका उनसे कोई विरोध नहीं था। वो हैदराबाद की संस्कृति के प्रशंसक थे जिसका कि उनकी मित्र सरोजनी नायडू प्रतिनिधित्व करती थीं। लेकिन पटेल को व्यक्तिगत और वैचारिक दोनों तरह से निजाम से नफरत थी।'
इस बैठक का एक और विवरण पटेल के करीबी और उस समय रिफॉर्म्स कमिश्नर वीपी मेनन ने एच वी हॉडसन को 1964 में दिए गए इंटरव्यू में किया है। मेनन के मुताबिक, 'नेहरू ने बैठक की शुरुआत में ही मुझपर हमला बोला। असल में वो मेरे बहाने सरदार पटेल को निशाना बना रहे थे। पटेल थोड़ी देर तो चुप रहे लेकिन जब नेहरू ज्यादा कटु हो गए तो वो बैठक से वॉक आउट कर गए। मैं भी उनके पीछे-पीछे बाहर आया, क्योंकि मेरे मंत्री की अनुपस्थिति में वहां मेरे रहने का कोई तुक नहीं था। इसके बाद राजा जी ने मुझसे संपर्क करके सरदार को मनाने के लिए कहा। फिर मैं और राजा जी सरदार पटेल के पास गए। वो बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनका ब्लड प्रेशर बहुत हाई था। सरदार गुस्से में चिल्लाए-नेहरू अपनेआप को समझते क्या हैं? आजादी की लड़ाई दूसरे लोगों ने भी लड़ी है।'
सरदार का इरादा था कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुला कर नेहरू को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया जाए, लेकिन राजा जी ने सरदार को डिफेंस कमेटी की बैठक में शामिल होने के लिए मना लिया। इस बैठक में नेहरू शांत रहे और हैदराबाद पर हमला करने की योजना को मंजूरी मिल गई।
दुनिया के सबसे अमीर शख्स-निजाम
कई सदियों से हैदराबाद की हीरे की खानों से दुनिया के एक से एक मशहूर हीरे निकलते आए थे। उनमें से एक कोहिनूर भी था। निजाम के पास दुनिया का सबसे बड़ा 185 कैरेट का जैकब हीरा था, जिसे वो पेपर वेट की तरह इस्तेमाल करते थे। निजाम को 'हिज एक्जाल्टेड हाईनेस' कहा जाता था और वो जहां भी जाते थे उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। टाइम पत्रिका ने 1937 में उन्हें दुनिया का सबसे अमीर शख्स घोषित किया था, लेकिन तब भी वो एक कंगाल की तरह फटी शेरवानी और पाजामा पहनते थे।