कुछ लोग कतर को फारस की खाड़ी की 'बिगड़ी औलाद' करार देते हैं। यहां तक कि पिछले 150 सालों से कतर पर हुकूमत कर रहे अल-थानी खानदान को 'पड़ोस का सबसे मुश्किल परिवार' करार देने वाले लोग भी मिल जाते हैं। कतर अपने पड़ोसी मुल्कों से कूटनीतिक विवाद में उलझा हुआ है। सऊदी अरब, बहरीन और मिस्र को कतर से कुछ शिकायते हैं और उन्होंने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ लिए हैं। ये मुल्क कतर पर चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं, जिससे दोहा इनकार करता है।
150 साल से कतर पर हुकूमत करने वाला वो खानदान, जिसकी कहानी कर देगी हैरान
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अल-थानी खानदान
लंदन में रॉयल इंस्टीट्यूट्स ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "एक परिवार जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर हुकूमत कर रहा था। इसकी अपनी कोई खास अहमियत नहीं थी। लंबे समय से इसे सऊदी अरब के एक सूबे के तौर पर भी देखा गया। लेकिन वक्त के साथ-साथ वे बड़े मुल्कों के इस इलाके में अपना वजूद खड़ा करने में कामयाब रहे।" 1980 और 1990 के दशक के दौरान कतर के आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी और सरकार में बैठे अल-थानी खानदान के दूसरे सदस्यों ने तय किया कि कतर दूसरों के मामलों में दखल नहीं देगा।
शुरू में ये माना गया कि वे जानबूझकर अलग-थलग रहना चाहते हैं लेकिन अल-थानी खानदान की चिंता कतर के भीतर अमन कायम रखने को लेकर ज्यादा थी। लेकिन 1995 में सबकुछ बदल गया। आमिर के शहजादे हमाद बिन खलीफा अल-थानी ने अपने अब्बा की गैरमौजूदगी में बिना किसी खून खराबे के उनकी सल्तनत का तख्तापलट कर दिया।
सऊदी अरब से रिश्ते
जब शहजादे हमाद बिन खलीफा अल-थानी हुकूमत पर कब्जा कर रहे थे तो उनके वालिद आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी स्विट्जरलैंड के दौरे पर थे। पीटर सैलिसबरी के मुताबिक इस वाकये ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर अल-थानी खानदान के रवैये को ही पूरी तरह से बदल दिया। वे कहते हैं, "अलग-थानी खानदान पिछले 20 सालों में जिस तेजी से बदला है, उसकी वजह से कुछ लोग उन्हें मुसीबत करार देने लगे हैं।"
पीटर सैलिसबरी के मुताबिक, "कबायलियों का एक खानदान जिसके रिश्ते सऊदी अरब से हुआ करते थे और जिन्हें नाकाबिलेगौर समझा जाता था, देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिरकत करने वाले नामचीन कद्दावर लोगों का कुनबा बन गया।" वे आगे कहते हैं, और जैसा कि हमने देखा इससे संदेह बढ़े। हमाद बिन खलीफा अल-थानी के अब्बा आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी के सऊदी अरब के साथ करीबी रिश्ते थे लेकिन शहजादे के हुकूमत में आने के बाद तस्वीर बदली। उनकी नीतियों की वजह से पड़ोसी मुल्कों से कतर के मतभेद बढ़ने लगे। कतर के मामले में जो कुछ हुआ, उसे पड़ोसी मुल्क एक खराब उदाहरण के तौर पर देखते हैं।
एलएनजी का निर्यात
हालांकि कतर के पड़ोसी मुल्कों में भी राजशाही निजाम ही है। शेख हमाद ने सत्ता में आते ही प्राकृति गैस के भंडारों के विकास को नई रफ्तार दी। 1996 में कतर इतिहास में पहली बार एलएनजी का निर्यात करने लगा। इसी साल शेख हमाद की हुकूमत का तख्ता पलटने का इलजाम सऊदी अरब पर लगा। कहा गया कि सऊदी अरब शेख खलीफा को सत्ता में फिर से लाना चाहता है। निर्यात से होने वाली आमदनी के बूते कतर जल्दी ही एक क्षेत्रीय शक्ति बन गया।
आज वो लिक्विफाइड नैचुरल गैस या एलएनजी का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इतना ही नहीं वो सऊदी अरब के सबसे बड़े दुश्मन मुल्क ईरान के साथ मिलकर एलएनजी फील्ड के विकास के लिए काम कर रहा है। पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "पड़ोसी मुल्कों को लगा कि कतर में बड़े बदलाव हो रहे हैं। शेख खलीफा की हुकूमत बहुत अलग थी। वे खामोशी से शासन कर रहे थे लेकिन शेख हमाद ताजा हवा के झोंके की तरह थे। जवान, ऊर्जा से लबरेज और खुदमुख्तार शेख हमाद बदलाव चाहते थे।"
तमीम बिन हमाद अल-थानी
शेख हमाद और उनके विदेश मंत्री शेख हमान बिन जासिम अल-थानी ने कतर को एक क्षेत्रीय महाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़ा करने में अग्रणी भूमिका निभाई। आमिर हमाद की हुकूमत में कतर ने न केवल अपनी अंतरराष्ट्रीय नीति का विस्तार किया बल्कि उन्होंने अल-जजीरा नाम का एक न्यूज चैनल भी शुरू किया। देखते ही देखते अल-जजीरा अरब जगत में एक बड़ी आवाज बनकर उभरा। कतर दुनिया भर में एक बड़ा ग्लोबल इन्वेस्टर भी है।
साल 2013 में आमिर ने सत्ता छोड़ने और अपने चौथे बेटे तमीम बिन हमाद अल-थानी को राजगद्दी सौंपने का फैसला किया। तमीम बिन हमाद उस समय 33 साल के थे। पड़ोसी मुल्कों को लगा कि नए आमिर का रवैया संतुलन बनाने वाला होगा लेकिन इस उम्मीद की उम्र बहुत कम रही। मिस्र में मोहम्मद मुर्सी के सत्ता से बेदखल होने के कुछ महीनों बाद शुरुआती खबरे सामने आईं कि नए आमिर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को दोहा में फिर से संगठित होने की इजाजत दे रहे हैं।