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किसान आंदोलन: महाराष्ट्र की 'चारी किसान हड़ताल' जो करीब छह सालों तक चली थी

Fri, 01 Jan 2021 01:46 PM IST
योगेश जोशी फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश जोशी Updated Fri, 01 Jan 2021 01:46 PM IST
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farmers protest in india maharashtra farmers protest for 6 years farmers strike in india
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock

दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा चुका है लेकिन पंजाब और हरियाणा से आए किसान इसकी परवाह किए बिना दिल्ली और हरियाणा के बॉर्डर पर जमे हुए हैं।किसान छह महीनों तक विरोध-प्रदर्शन करने की तैयारी के साथ आए हैं। एक महीने तो उनके यहां पर विरोध-प्रदर्शन करते हुए हो गए और वो अब तक बिल्कुल भी पीछे नहीं हटते दिख रहे हैं। केंद्र सरकार जब तक तीन नए कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती तब तक वो अपना विरोध जारी रखेंगे। यह उनका साफ तौर पर कहना है। कई लोग किसानों के छह महीने तक आंदोलन जारी रखने को लेकर उत्सुकता से भरे हुए हैं।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
  • 'चारी किसान हड़ताल'

इसी तरह से कुछ लोगों को इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि महाराष्ट्र में छह साल तक किसानों का एक आंदोलन चला था। छह सालों से इसमें शामिल किसी किसान ने खेती नहीं की।इसकी वजह से भुखमरी की नौबत तक आ चुकी थी लेकिन किसान अपने रुख पर कायम रहे। ये सुनकर आपको ताज्जुब हो सकता है लेकिन यह सच है। महाराष्ट्र में ये किसान आंदोलन एक इतिहास बन चुका है। इसे 'चारी किसान हड़ताल' कहते हैं। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में खोटी व्यवस्था के खिलाफ किसानों का ये आंदोलन चला था।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
  • महाराष्ट्र में बटाईदार कानून

ये हड़ताल पहली बार रायगड ज़िले के अलीबाग के नजदीक चारी गांव में हुई थी। इसकी वजह से महाराष्ट्र में कृषि क्षेत्र में कई अहम बदलाव हुए थे। बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने इस आंदोलन का समर्थन किया था। उनकी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के बीज भी आप इस आंदोलन में देख सकते हैं। किसानों और मजदूरों के नेता नारायण नागु पाटिल ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था और अंग्रेजों को घुटने पर आने पर मजबूर कर दिया था। इस आंदोलन की वजह से महाराष्ट्र में बटाईदार कानून लागू हुआ। हम किसानों के इस सबसे ज्यादा वक्त से चलने वाली हड़ताल के बारे में विस्तार से जानेंगे लेकिन उससे पहले हम संक्षिप्त में खोटी व्यवस्था को समझने की भी कोशिश करेंगे।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
  • खोटी व्यवस्था क्या है?

खोट लोग बड़े जमींदार थे। पेशवा के वक्त से इन्हें मान्यता मिली हुई थी। इनका मुख्य काम सरकार की ओर से किसानों से राजस्व वसूलना था और उसे सरकार तक पहुंचाना था। जहां खोट लोग रहते थे उन गांवों को खोटी गांव कहते थे।

कृषीवल अखबार के संपादक एसएम देशमुख ने चारी किसानों के हड़ताल पर गहराई से अध्ययन किया है। वो कहते हैं, "खोट लोग खुद को सरकार समझते थे और गरीब किसानों को लूटते थे। ये किसान पूरे साल कड़ी मेहनत करते थे लेकिन आखिर में सारे अनाज खोट के पास चले जाते थे। सिर्फ यही नहीं बल्कि खोट अपने निजी कामों के लिए भी उनका इस्तेमाल करते थे।" इन किसान मजदूरों को कोल कहते थे। ये दूसरे की जमीन पर काम करते थे।

देशमुख बताते हैं, "खोट लोग किसानों को बरगला कर रखते थे क्योंकि वे लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। खोट लोगों ने काबुलायत जैसी व्यवस्था शुरू की थी। इस व्यवस्था के अंदर 11 महीने के लिए खेत ठेके पर दिए जाते थे। खोट लोग एक एकड़ ज़मीन के बदले एक खांडी चावल की मांग करते थे। अगर कोई किसान नहीं दे पाता था तो उससे अगले साल इसका डेढ़ गुना लिया जाता था। इसलिए जी तोड़ मेहनत करके भी किसानों के हाथ कुछ नहीं आता था।"

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI

"बटाईदारी वाली खेती में अगर किसानों ने सब्जियां या फिर आम, नारियल या कटहल का पेड़ लगाया तो उस पेड़ के फलों पर खोट का अधिकार होता था। यह एक अलिखित समझौता था। हालांकि किराए पर दिए गए जमीन पर पूरे समुदाय का हक होता था लेकिन खोट इस पर अपना मालिकाना हक जताते थे। खोट किसानों और बटाईदारों को जबरदस्ती अपने निजी काम करने पर मजबूर करते थे। अपने खेतों में भी उनसे काम लेते थे।"

देशमुख आगे बताते हैं, "अगर कोई बटाईदार पर्याप्त रूप से राजस्व नहीं दे पाता था तो उसके पूरे परिवार को गुलाम समझ लिया जाता था। कोंकण के क्षेत्र में यह अमानवीय व्यवस्था लागू थी।"

9वीं सदी के अंत में खोटी व्यवस्था को कई जगहों पर चुनौती मिलनी शुरू हुई। रत्नागिरी के खेड तहसील और रायगढ़ के पेन तहसील में इस तरह की कोशिशें शुरू हुई थीं, लेकिन इन कोशिशों को नाकाम कर दिया गया।1921 से 1923 के बीच रायगढ़ में खोट लोगों के खिलाफ अलग-अलग स्तरों पर आंदोलन हुए, लेकिन वो सभी आंदोलन कुचल दिए गए। नारायण नागु पाटिल इन सभी घटनाक्रम को अपने सामने होते हुए देख रहे थे, उन्होंने खोटी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला लिया। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपने आस-पास के कई गांवों का दौरा किया।

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