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Rajasthan: शेखावाटी के मिजाज से तय होगा राजस्थान का मुखिया, जानिए क्यों प्रदेश की सियासत में अहम है जाटलैंड

Fri, 10 Nov 2023 05:59 AM IST
जलज मिश्रा प्रेम प्रताप सिंह, जयपुर
प्रेम प्रताप सिंह, जयपुर Published by: जलज मिश्रा Updated Fri, 10 Nov 2023 05:59 AM IST
सार

राजस्थान और शेखावाटी का नाम आते ही भैरों सिंह शेखावत का नाम स्वतः ही जुबान पर आ जाता है। शेखावत सीकर जिले के दातारामगढ़ विधानसभा सीट के तहत आने वाले खाचरियावास गांव के रहने वाले थे। आजादी के बाद से पहली विधानसभा से ही विधायक बन गए थे।

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temperament of Shekhawati will decide the Rajasthan CM Rajasthan Election Update
Rajasthan Election 2023 - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

राजस्थान के शेखावाटी को जाटलैंड कहा जाता है। सीकर, झुंझुनू और चूरू जिले को मिलाकर बने इस क्षेत्र में 25 नवंबर केे मतदान के लिए चुनावी रंग चढ़ना शुरू हो गया है। हेरिटेज और हवेलियों के लिए मशहूर शेखावाटी के निवासियों के बीच पार्टी और प्रत्याशियों की जीत-हार और सरकार बनाने-बिगाड़ने का गुणा गणित लगाने का सिलसिला जोर पकड़ने लगा है। इस जाट बहुल इलाके को कांग्रेस का सबसे मजबूत किला माना जाता है, लेकिन मोदी लहर में शेखावाटी ने बाजी पलटने में देर भी नहीं लगाई। इस क्षेत्र से ही प्रदेश के सियासी सूचकांक का मिजाज तय होता है। यहां जिस प्रत्याशी और पार्टी का प्रभाव थोड़ा भी मजबूत हुआ तो समझिए प्रदेश में उसी की सरकार बनने जा रही है। शेखावाटी से प्रेम प्रताप सिंह की रिपोर्ट...
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जयपुर से सीकर, झुंझुनू और चूरू तक लगभग तीन सौ किलोमीटर की दूरी में हर चौराहे और दुकान पर लोग अपने अंदाज में बात करते नजर आए। किसी को अपने विधायक का कामकाज पसंद नहीं आया तो कोई कामकाज से इतना खुश नजर आया कि उसे फिर से विधायक बनाने के लिए प्रचार में जुट गया है। नामांकन के बीच लोग दीपावली मनाने की तैयारी में जुटे हैं। सीकर के फतेहपुर सीट से आने वाले रतन लाल बागड़ी कहते है कि इस बार किसी के लिए एकतरफा नहीं है। बगावत करने वाले ज्यादा है, जिससे प्रत्याशियों को सीट बचानी मुश्किल हो रही है। जिले की हर सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बागी चेहरे चुनाव के लिए ताल ठाक रहे हैं। झुंझुनू जिले के मंडावा सीट के रहने वाले गौरव शर्मा कहते है कि चुनाव का असली रंग तो दीपावली के बाद ही पता चलेगा। दुकानदार से लेकर किसान और आम लोग दीपावली की तैयारी और अपने खेतों में काम करने में जुटे हैं, लेकिन इस बार का चुनाव मुकाबले का होने जा रहा है। प्रदेश का अगला सीएम कौन होगा? इससे ज्यादा हमें मतलब नहीं है। हमारा अगला विधायक कौन होगा? इसमें हमें दिलचस्पी है। क्योंकि हमारा काम तो अपने विधायक से पड़ना है। चूरू शहर के पुरुषोत्तम सैनी कहते है कि इस बार वोट का ट्रेंड बदल रहा है। लोग जातिगत समीकरण के अलावा प्रत्याशी की बोलचाल और स्वभाव को भी ध्यान में रखकर वोट करेंगे।
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सालासर बालाजी और खाटूश्याम व रानी सती
चूरू जिले के सालासर बालाजी मंदिर में देशभर के लोग मन्नतें पूरी करने के लिए आते हैं। इसी तरह से सीकर के खाटूश्याम में भी दिल्ली, यूपी, हरियाणा सहित देशभर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। झुंझुनू का रानी सती मंदिर देशभर के अग्रवाल समाज की आस्था का केंद्र है।
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शेखावत के पांच दशक
राजस्थान और शेखावाटी का नाम आते ही भैरों सिंह शेखावत का नाम स्वतः ही जुबान पर आ जाता है। शेखावत सीकर जिले के दातारामगढ़ विधानसभा सीट के तहत आने वाले खाचरियावास गांव के रहने वाले थे। आजादी के बाद से पहली विधानसभा से ही विधायक बन गए थे। 1977 में पहली बार जनता पार्टी से राजस्थान के सीएम बने। उसके बाद 1990 और 1993 में शेखावत के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।  2002-07 के बीच में उपराष्ट्रपति भी रहे। शेखावाटी झुंझुनू के ही जगदीप धनखड़ अब उपराष्ट्रपति हैं।

पावर, पैसा और पाॅलिटिक्स की भी चासनी
शेखावाटी में पावर, पैसा और पाॅलिटिक्स की भी चासनी दिखती है। ब्यूरोक्रेसी से लेकर सत्ता के केंद्र में शेखावाटी के लोग रहते हैं। यहां के लोगों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है। इलाके के लोग बड़ी संख्या में खाड़ी देशों मजदूर से लेकर बड़े पदों पर बैठे हुए हैं। मुस्लिम व अन्य समाज के लोग भी इन देशों में जाकर पैसे भेजते है। बाहर से खूब पैसा आने के कारण सम्पन्नता अच्छी है।

शिक्षा का हब भी बन गया
राजस्थान में कोटा के बाद सबसे ज्यादा कोचिंग सेंटर सीकर में हैं। पिछले दिनों एक कोचिंग सेंटर पर ईडी के छापे से सीकर और ज्यादा चर्चा में आ गया है। इसे भी राजस्थान की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। यह कोचिंग संस्थान अपने यहां पढ़ने वाले छात्रों को इंटरव्यू में मिलने वाले नंबर के कारण भी चर्चाओं में रहा है। अब चुनाव में भी चर्चा का केंद्र है। सीकर में स्कूल, काॅलेज और कई निजी विश्वविद्यालय भी खुल गए हैं। इससे दूसरे राज्यों के छात्र और शिक्षक भी यहां आ रहे हैं।

जाट और मुस्लिम कॉम्बिनेशन
राजस्थान और खासतौर पर शेखावाटी से आने वाला जाट समाज जिस ओर वोट करता है, उसी दल की सरकार बनने की संभावना प्रबल हो जाती है। कांग्रेस ने यहां जाट और मुस्लिम समाज का कॉम्बिनेशन तैयार किया है। इसके दम पर सत्ता में आने का दावा किया जाता है लेकिन ऐसा भी नहीं कि जाट केवल कांग्रेस का ही साथ देते रहे हों। 2013 के विधानसभा,  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में शेखावाटी ने खुलकर भाजपा के पक्ष में वोट किया था। 2013 में भाजपा की सरकार बनी थी। जबकि दो बार से लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी सीटें भाजपा को मिल रही है। शेखावाटी में सीकर के फतेहपुर, चूरू के राजगढ़ और झुंझुनू में हरियाणवी राजनीति का असर भी देखने को मिलता है।

सीकर  
सीकर जिले की आठ सीटों खंडेला, धोद, सीकर,  लक्ष्मणगढ़, नीमकाथाना, दांतारामगढ़, श्रीमाधोपुर और फतेहपुर में से पिछली बार कांग्रेस ने सात जीती थीं। खंडेला से निर्दलीय जीते महादेव सिंह खंडेला कांग्रेस से तो पिछली बार कांग्रेस के प्रत्याशी सुभाष मील भाजपा से लड़ रहे हैं। लक्ष्मणगढ़ में प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के सामने भाजपा से पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे सुभाष महरिया हैं। डोटासरा की दिक्कत यह है कि प्रदेश अध्यक्ष के नाते दूसरे क्षेत्रों में भी जाना है। दोनों दलों के लिए असंतोष सबसे बड़ी चुनौती है। कुछ सीटों पर वोटर देख रहे हैं कि प्रत्याशी कौन है? यह महत्वपूर्ण है, जो उनके दुख सुख में शामिल हो सकें। जो विधायक पांच साल में कभी-कभार गए। उनके काम नहीं किए। उनके प्रति भारी नाराजगी सामने आ रही है।

झुंझुनू
मंडावा, खेतड़ी, झुंझुनू, नवलगढ़, उदयपुरवाटी, पिलानी और सूरजगढ़ सीटों में लीक से हटकर चलने की परंपरा है। पिछली बार चार सीटें कांग्रेस, दो भाजपा और एक निर्दलीय के खाते में गई थी। नरेंद्र खीचड़ के सांसद बनने के बाद मंडावा में हुए उपचुनाव में कांग्रेस की रीटा चौधरी जीती थीं। इस बार भी मंडावा में सांसद खीचड़ और विधायक रीटा चौधरी के बीच मुकाबला है। नवलगढ़ में भी तीन बार के विधायक कांग्रेस के राजकुमार शर्मा और भाजपा के विक्रम सिंह जाखल में रोचक संघर्ष है। उदयपुरवाटी में बसपा से राजेंद्र गुढ़ा पिछला चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस में चले गए थे। अब वह शिवसेना से लड़ रहे हैं। खेतड़ी और झुंझुनू सीट में भी कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है।


चूरू  
जिले में चूरू, सुजानगढ़, सरदारशहर, रतनगढ़, तारानगर और सादुलपुर सीटें हैं। नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के कारण जिला ज्यादा चर्चा में है। चूरू से विधायक राठौड़ फिर सीट बदलकर तारानगर से मैदान में हैं। यहां नरेंद्र बुढानियां से राठौड़ का मुकाबला है। इस सीट पर कांग्रेस ने फोकस कर दिया है। अभी जिले की छह में से चार सीटें कांग्रेस दो भाजपा के पास हैं। चूरू जिले में मास्टर भंवर लाल मेघवाल और भंवर लाल शर्मा जैसे दिग्गज नेताओं की कमी लोगों को खल रही है।
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