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Rajasthan election: 15 किमी दूर से पानी लाती हैं महिलाएं, चाहे जिसकी सरकार बने नहीं बदली यहां की सूरत

Thu, 16 Nov 2023 07:50 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 16 Nov 2023 07:50 PM IST
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सार
बवाद गांव में केवल एक ही तालाब है। पूरे गांव की आबादी लगभग 1500 लोगों की है। पूरा गांव इस छोटा तालाब से ही पानी पीता है। इसी तालाब के पानी को जानवर भी पीते हैं और इसी तालाब के पानी को सामान्य लोग भी अपने पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं...
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Rajasthan election: There is only one pond in Bawad village, entire village drinks water from this small pond
Rajasthan Election - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

नागौर की सितारा देवी की उम्र लगभग 62 वर्ष हो चुकी है। करीब 45 साल पहले जब उनकी शादी यहां के एक गांव में हुई थी, तब उनके सामने बहुत सी कठिनाइयां थीं। समय के साथ इन कठिनाइयों में कुछ कमी तो जरूर आई है, लेकिन एक चीज आज तक नहीं बदली है और वह है इस गांव में पानी की समस्या। सितारा देवी को अपने विवाह के समय भी गांव से लगभग 14-15 किलोमीटर दूर बड़ी जौहड़ से पीने के लिए पानी लाना पड़ता था, आज भी उन्हें वहीं से पानी लाकर परिवार के सदस्यों की प्यास बुझानी पड़ती है, घर के लिए भोजन बनाना पड़ता है।

बवाद गांव में केवल एक ही तालाब है। पूरे गांव की आबादी लगभग 1500 लोगों की है। पूरा गांव इस छोटा तालाब से ही पानी पीता है। इसी तालाब के पानी को जानवर भी पीते हैं और इसी तालाब के पानी को सामान्य लोग भी अपने पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यहां के सभी घरों में जमीन में एक बड़ा टैंक (जिसे स्थानीय भाषा में टांक कहा जाता है) बनाया जाता है। इस टैंक में एक बार पानी से भर दिया जाता है, तो कुछ दिनों में गंदा पानी और मिट्टी नीचे बैठ जाती है। ऊपर साफ पानी बचता है, जिससे प्यास बुझाई जाती है और खाना बनाया जाता है।

आजादी के लंबे कालखंड में यहां हर दल के नेता-प्रतिनिधि चुने गए हैं। जनता हर राजनीतिक दल से पानी पीने की मांग करती रही है, लेकिन कोई भी दल इन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं उपलब्ध करा सका है। इस दौरान अगर कुछ बदला है, तो वह है गांव तक आने वाली सड़क। गांव तक आने वाली पगडंडी अब काली पक्की सड़क बन गई है। गांव तक नेताओं और व्यापारियों की बड़ी-बड़ी गाड़ियां आने लगी हैं। इससे जीवन की कुछ कठिनाई कम हुई हैं।

बवाद गांव के सुशील कुमार शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि बारिश के पानी को इस तालाब में इकट्ठा कर लिया जाता है और उसी पानी को पूरा गांव पीता है। जब तक तालाब का पानी गांव के लोगों की प्यास बुझा सकता है, तब तक तो सब कुछ ठीक रहता है, लेकिन गर्मियों में जब तालाब का पानी सूख जाता है, तो लोगों की जिंदगी मुश्किल हो जाती है। गांव से लगभग 14-15 किलोमीटर दूर बड़े जौहड़ से पानी लाना पड़ता है और उसी से लोगों की प्यास बुझानी पड़ती है।

समय के साथ अब ट्रैक्टर से पानी के बड़े टैंकर भी गांव आने लगे हैं। खारे पानी का टैंकर 500 से 800 रुपये में मिल जाता है। मीठे पानी का टैंकर लगभग 1500 रुपये की कीमत में आता है। एक टैंकर पानी घर पर ला देने के बाद लगभग 20-25 दिन एक छोटे परिवार का काम चल जाता है। लेकिन गरीब परिवार यह कीमत नहीं चुका पाता है, जिससे गर्मियों में उनका भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। केंद्र-राज्य सरकार हर परिवार को कुछ आर्थिक मदद देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने का दावा करती हैं। लेकिन बवाद गांव की महिलाएं बताती हैं कि इससे कई गुना कीमत तो उन्हें अकेले पीने के पानी के लिए चुकाना पड़ता है।

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