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अपराध लोक: जब 17 साल के किशोर को जिंदा मारकर नाविकों ने उसका मांस खाया, बोले- अगर नहीं खाते तो जिंदा नहीं रहते

Fri, 27 Sep 2024 06:00 PM IST
Kumar Atul कुमार अतुल
Updated Fri, 27 Sep 2024 06:00 PM IST
सार

समुद्री नाविकों के बीच प्राचीन प्रथा थी, यात्रा के दौरान जब भोजन न मिलने से मृत्यु निश्चित हो जाती तो बारी-बारी से लॉटरी निकालते। जिस शख्स का नाम आता उसे मारकर उसका मांस खाकर जिंदा रहते।

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sailors killed a 17-year-old boy alive and ate his flesh
क्राइम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कई कानूनी मामलों की दास्तां सिहरन पैदा कर देती है। रेक्स बनाम डुडले और स्फीफंस का मामला इसी तरह का है। इस मामले में इंग्लैंड के न्यायालय ने तय किया कि घोर आवश्यकता का तर्क लेकर किसी की जान नहीं ली जा सकती है।  
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रेक्स (सम्राट) बनाम डुडले एंड स्टीफेन का मामला साल 1884 का है। आज से 140 साल पहले 16 मीटर लंबे एक छोटे समुद्री जहाज से चार नाविक इंग्लैंड के साउथम्प्टन से 19 मई को ऑस्ट्रेलिया के लिए रवाना हुए। जहाज का कप्तान टॉम डुडले था। उसके साथ एडविन स्टीफंस, एडमंड ब्रूक्स था। इन तीनों के साथ 17 साल का किशोर रिचर्ड पार्कर भी था। 
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डुडले का जहाज बड़ी यात्रा के लिए उपयुक्त नहीं था। केप ऑफ गुड होप से लगभग 2600 किलोमीटर दूर यह समुद्री तूफान में घिर गया। समुद्री थपेड़ों ने जहाज को जर्जर कर दिया था। यह कभी भी डूब सकता था। जहाज पर सवार चारो नाविकों ने तय किया कि सभी लोग जीवन रक्षक नौका में सवार होकर जहाज छोड़कर किस्मत के सहारे खुद को समुद्री लहरों के हवाले कर देंगे। चारों ने ऐसा ही किया। जहाज से वे  शलजम के कुछ टुकड़े और दिशा सूचक यंत्र ही ले पाए। उनके पास ताजा पानी भी नहीं था। दो-तीन दिन तो वे शलजम खाकर रहे। समुद्री तूफान शांत तो हुआ, लेकिन कहीं भी किनारा नजर नहीं आ रहा था। पानी न मिलने से सभी की हालत खराब हो रही थी। किशोर रिचर्ड को जब नहीं रहा गया तो उसने थोड़ा समुद्री खारा पानी ही पी लिया। इससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। इस बीच एक कछुआ हाथ लगा तो उससे लगभग डेढ़ किलो मांस मिला। लेकिन इससे कितने दिन काम चलता। इन नाविकों को लगने लगा कि अब मृत्यु निश्चित है। 
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समुद्री नाविकों के बीच प्राचीन प्रथा थी, यात्रा के दौरान जब भोजन न मिलने से मृत्यु निश्चित हो जाती तो बारी-बारी से लॉटरी निकालते। जिस शख्स का नाम आता उसे मारकर उसका मांस खाकर जिंदा रहते। इन नाविकों ने भी हताश होकर लॉटरी निकालने की सोची। 23-24 जुलाई 1884 की रात डुडले ने साथियों से कहा कि सभी की जान चली जाए इससे बेहतर है कि किसी एक की जान ले लें और उसका मांस खाकर जिंदा रहें। किशोर रिचर्ड पार्कर बीमारी की वजह से कोमा में चला गया था। डुडले को लगा कि वह विरोध भी नहीं कर पाएगा, लिहाजा उसी को मारकर खा लिया जाए। अपने स्टीफंस के समक्ष उसने यह विचार रखा। यह भी तर्क दिया कि उसकी और स्टीफंस की पत्नियां और बच्चे हैं। पार्कर अविवाहित है। ब्रूक्स ने बाद में दावा किया कि वह इस चर्चा में शामिल नहीं था। 

अपने विचार को अमली जामा पहनाने के लिए डुडले एक चाकू लाया। स्टीफंस ने पार्कर की टांग पकड़ी। डुडले ने पार्कर का गला रेत दिया। ब्रूक्स बेशक उनके फैसले से सहमत नहीं था लेकिन तीनों ने पार्कर का मांस खाया और खून पीया। कुछ दिन बाद तीनों को बारिश का पानी पीने को मिल गया। एक जर्मन समुद्री जहाज ने उन तीनों को बचा लिया। 6 सितंबर 1884 को तीनों इंग्लैंड के फॉल माउथ नामक स्थान पर पहुंच गए। इस बीच नाविकों ने अपनी जिंदगी बचाने का तर्क देकर कैसे एक बीमार किशोर की हत्या कर उसका मांस खाया, यह दास्तां जंगल में आग की तरह फैल गई। इंग्लैंड के मर्चेंट शिपिंग अधिनियम य के तहत अगर कोई समुद्री जहाज नष्ट हो जाए तो बचे नाविक दल को घटना के बारे में बयान दर्ज कराने होते थे। तीनों ने कस्टम अफसरों को अपना बयान दर्ज कराया। तीनों आश्वस्त थे कि उन्हें हालात को देखते हुए कोई सजा नहीं दी जाएगी। इस बीच इंग्लैंड के पुलिस अफसर जेम्स लेवर्टी ने तीनों को हिरासत में ले लिया। 

 यह मुकदमा बेहद पेचीदा था। अव्वल तो इसमें कोई गवाह नहीं था। अगर कोई स्वीकार भी करता तो यह सिर्फ उसके ऊपर लागू होता। अन्य आरोपियों को उस आधार पर सजा नहीं दी जा सकती थी। कई पुराने मुकदमों और पश्चिमी जगत में प्रचलित समुद्री रूढ़ियों का हवाला भी दिया गया, जिसमें ऐसी परिस्थितियों में लॉटरी निकालकर मरने वाले का नरमांस खाकर जान बचाई गई। 

इस मुकदमे का एक पहलू यह भी था कि रिचर्ड पार्कर का नौसैनिक भाई भी आरोपियों से मिल गया। इसके अलावा आरोपियों के पक्ष में जनमत भी था। 3 नवंबर 1884 को  बैरन हडलस्टन की अदालत में  डुडले और स्टीफंस के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ। बाद में जूरी को भी कोर्ट की प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया। आर्थर चार्ल्स क्यूसी ने इस मुकदमे में मुख्य अभियोजक की भूमिका निभाई। बचाव पक्ष की ओर से आर्थर जेएच कॉलिन्स ने पैरवी की। 

डुडले और स्टीफंस का बचाव करते हुए तर्क दिया गया कि जिंदगी बचाने के लिए रिचर्ड पार्कर को मारकर उसका मांस खाया गया। घोर आवश्यक हालात की वजह से ऐसा करना जरूरी था। यह भी कहा गया कि रिचर्ड पार्कर वैसे भी बीमार था और मरने वाला था। उधर अभियोजन का तर्क था कि कोई भी आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति की जान लेने के औचित्य को सही साबित नहीं कर सकती। समुद्री नौकायन के उस परंपरा की भी दुहाई दी गई जिसमें विपरीत हालात में जहाज का कप्तान सबसे पहला अपना बलिदान देता है, लेकिन डुडले ने बलिदान देने के स्थान पर बीमार और अशक्त किशोर की जान लेने पर जोर दिया। मुकदमे में  करुणावश दूसरों के लिए सूली पर चढ़ने वाले प्रभु यीशु का भी उल्लेख किया गया। जज ने दोनों आरोपियों को मृत्युदंड दिया। हालांकि दोनों को दया की याचिका देने की छूट भी दी गई।  


4 दिसंबर को मुख्य न्यायाधीश लार्ड कोलरिज की अगुवाई में क्वींस बेंच बैठी। मुकदमे के तथ्य दोबारा पूरी तरह से सुने गए। उन हालातों का भी वर्णन किया गया जिसमें घटना हुई थी। बचाव पक्ष ने जज के ऊपर ही आरोप लगाया कि उन्होंने पहले से ही दोनों को सजा देने का मन बना लिया था। मुकदमे में कई उतार चढ़ाव आए। अंत में दोनों आरोपियों को तीन-तीन माह की सजा दी गई। 20 मई 1885 को दोनों को रिहा कर दिया गया। यद्यपि कप्तान डुडले ने अपने आपको दोषी नहीं माना लेकिन बाद में उसने घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि हम पागल भूखे भेड़िए बन गए थे। यह वाकई भयानक दृश्य था, हममे से हर कोई उस किशोर का ज्यादा से ज्यादा मांस खाना चाहता था। भले ही विकट हालात में किशोर की हत्या कर उसका मांस खाने वाले दो आरोपियों को सिर्फ तीन-तीन माह की कैद मिली लेकिन इस फैसले ने यह तय कर दिया कि आवश्यकता का तर्क देकर किसी की जान नहीं ली जा सकती।
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