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विक्रमोत्सव: उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य ने की थी विक्रम संवत की शुरुआत, 2080 साल पुराना है इनका इतिहास
Wed, 26 Feb 2025 04:08 PM IST
उज्जैन ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Wed, 26 Feb 2025 04:08 PM IST
सार
उज्जैन में राजा विक्रमादित्य का सिंहासन उनकी कुलदेवी हरसिद्धि माता के सामने स्थित था, जिसके अवशेषों की रोज पूजा होती है। विक्रम टीले को सिंहासन स्थल माना जाता है। 32 मुखों वाला सिंहासन न्याय का प्रतीक था, जिस पर राजा भोज बैठना चाहते थे, लेकिन सफल नहीं हुए।
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उज्जैन में विक्रमादित्य के सिंहासन को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं।
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
बाबा महाकाल की नगरी उज्जयिनी की पहचान महाकाल के अलावा राजा विक्रमादित्य से भी होती है। उन्होंने हिन्दू कैलेंडर विक्रम संवत की शुरुआत उज्जैन से की थी। राजा विक्रमादित्य का 36 पुुतलियों वाले रहस्यमयी सिंहासन को लेकर भी कई किस्से कहानियां उज्जैन में प्रचलित हैं।
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माना जाता है कि राजा विक्रमादित्य का दरबार उनकी कुलदेवी हरसिद्धि माता के मंदिर के सामने लगता था और वहीं उनका सिंहासन स्थित था। उस स्थान पर खुदाई में निकले पत्थरों को सिंहासन के अवशेष मानकर रोज उनकी पूजा होती है और पर्यटक उस विक्रम टीले को भी देखने दूर दूर से आते हैं। उज्जैनवासियों की मान्यता है कि रुद्र सागर के पास जो टीला है, वहां पर सिंहासन जमीन में दबा है। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2015 को इस स्थान पर राजा विक्रमादित्य के सिंहासन वाली प्रतिमा यहां स्थापित की है और अब यहां एक पैदल पुल भी बनाया गया।
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रोज होती है सिंहासन की पूजा
उज्जैन मेंं विक्रमादित्य का एक प्राचीन मंदिर भी है। इसके अलावा सिंहासन के अवशेषों के भी उनकी एक मूर्ति रखी है। पुजारी बताते हैं कि विक्रमादित्य के सिंहासन की रोज पूजा होती है। उनके स्थान पर अलग ही अनुभूति होती है। कई लोग यहां ध्यान लगाकर भी बैठते हैं।
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32 मुखों वाला सिंहासन भी है खास
पंडित रघुनन्दन शर्मा ने बताया कि सिंहासन बत्तीसी के बारे में यह मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य उस सिंहासन पर बैठकर न्याय करते थे और उस पर बने 32 मुख इसमें उनकी सहायता किया करते थे। विक्रमादित्य का राज समाप्त होने के बाद सिंहासन गायब हो गया तो सालों बाद राजा भोज ने इसकी वापस खोज करवाई और उस पर बैठना चाहा, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। सिंहासन की 32 पुतलियों ने राजा विक्रमादित्य की महानता का बखान करते हुए राजा भोज को सिंहासन पर बैठने नहीं दिया।
