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यजुर्वेद पारायण अनुष्ठान: 250 साल में पहली बार हो रहा अनुष्ठान, वेद की मूल ऋचाओं का किया जा रहा सस्वर पाठ

Sat, 15 Jun 2024 04:55 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: अरविंद कुमार Updated Sat, 15 Jun 2024 04:55 PM IST
सार

उज्जैन में हो यजुर्वेद पारायण का दिव्य अनुष्ठान इतिहास रचेगा। 250 साल में पहली बार हो रहे अनुष्ठान में वेद की मूल ऋचाओं का सस्वर पाठ किया जा रहा है। आयोजन का मुख्य उद्देश्य वेद के मूल रूप का हो यथावत संरक्षण है।

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Ujjain Yajurveda Parayan Anushthan ritual is being performed for first time in 250 years
यजुर्वेद पारायण अनुष्ठान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उज्जैन का अवंतिका तीर्थ एक बार फिर इतिहास रचने वाला है। श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी शक्ति पीठ आश्रम नृसिंह घाट उज्जैन में 25 दिवसीय शुक्ल यजुर्वेद का ऐतिहासिक घनपाठ वेदमूर्ति ऋषभ शर्मा द्वारा किया जा रहा है। एकाकी घनपाठ पारायण का आयोजन पिछले 250 साल में मध्यप्रदेश में पहली बार हो रहा है। वेद अध्ययन और पठन-पाठन की परंपरा काल और आक्रांताओं के प्रभाव से मध्यप्रदेश में अत्यंत न्यून हो गई थी।

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साल 2010 के बाद से परमपूज्य संत राज राजेश्वरी नृसिंह घाट वाले श्री राघवानंद महाराज जी के आशीर्वाद से वेदरत्न उमेश जी शर्मा ने उज्जैन में शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा का अध्यापन प्रारंभ किया। वेदमूर्ति ऋषभ शर्मा ने मध्यप्रदेश में शुक्ल यजुर्वेद का अध्ययन पूर्ण कर इस ऐतिहासिक एकाकी घनपारायण का आयोजन करने का संकल्प लिया है, जिसे वे पूर्ण करने में लगे हैं। वेद की मूल संहिता पाठ के साथ-साथ ऋचाओं के उच्चारण की 11 विशिष्ट पद्धतियों, जिनमें घनपाठ भी शामिल है। घनपाठ की इस विधा को अत्यंत कठिन और समय-साध्य बताया जाता है। इसे सीखने के लिए एक बालक को प्रतिदिन आठ से 12 घंटे न्यूनतम 10 साल तक अभ्यास करना होता है। एक वेद ऋचा का उच्चारण सामान्यत: 40 से 60 सेकेंड में होता है।
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इस अनुष्ठान को करवाने वाले वेद रत्न उमेश जी शर्मा ने बताया कि घनपाठ में उसी ऋचा के उच्चारण में चार से छह मिनट का समय लगता है। वेदों के सही उच्चारण से सृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जबकि त्रुटिपूर्ण उच्चारण से विकार उत्पन्न हो सकते हैं। वेदों में किसी भी प्रकार की त्रुटि और मिलावट से बचने के लिए विस्तृत पारायण विधाओं, जैसे घनपाठ, का पालन किया जाता है।



उन्होंने बताया कि वेद की शुरुआत तो अनादि काल से है। लेकिन इस प्रकार के अनुष्ठान से वेद के प्रति न सिर्फ जागरुकता बढ़ेगी। बल्कि लोग इसका महत्व भी समझ पाएंगे। पूर्व में आक्रांताओं राजाओं के कारण इस प्रकार के अनुष्ठान होना दुर्लभ था। लेकिन अब ऐसी कोई बात नहीं है, अब तो आसानी से धर्म के संरक्षण के लिए इस प्रकार के अनुष्ठान किए जा सकते हैं। एकाकी घनपारायण में मंत्रों के साथ स्वर लगाना मंत्रों की ही शक्ति का परिणाम है।

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