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ऐसे निभाते हैं फर्ज: नाव में बैठकर करती नदी पार, चढ़ती पथरीले पहाड़...ताकि लोगों को लग सके वैक्सीन

Sun, 24 Oct 2021 06:25 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sun, 24 Oct 2021 06:25 PM IST
सार

रीना कहती हैं कि टीकाकरण के शुरुआती दौर में काफी दिक्कतें आई। जागरूकता का अभाव था जिस कारण ग्रामीण टीके लगाना नहीं चाहते थे। वे हमको देखते तो घर में ताला लगाकर भाग जाते थे। कुछ लोग खेत में जाकर छिप जाते। लेकिन हमने हार नहीं मानी।

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Story of Madhya Pradesh Woman who worked day in day out to complete Vaccination target news and updates
मध्य प्रदेश के अलीराजपुर में टीकाकरण का लक्ष्य पूरा कराने वाली - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हाल ही में देश ने वैक्सीन का सौ करोड़ का आंकड़ा पार किया है। आलोचनाओं, संशय और  सवालों के बीच भारत ने यह उपलब्धि हासिल कर दुनिया को दिखा दिया कि कोरोना से जंग में भारत कितना आगे है, लेकिन ये सौ करोड़ का आंकड़ा क्या ऐसे ही छू लिया। कोरोना वॉरियर्स ने इसके लिए जी तोड़ मेहनत की है। किसी ने पहाड़ पर चढक़र कर्तव्य निभाया तो किसी ने घंटों तक भूखे रहकर काम किया। आपको बताते हैं ऐसी ही एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता से जिनके जज्बे की हर कोई तारीफ कर रहा है।
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खबर मध्यप्रदेश के आलीराजपुर से है। यहां के ककरना उपस्वास्थ्य केंद्र में एएनएम रीना  सेंगर पदस्थ है। इनके पास उन गांवों का जिम्मा है जो नर्मदा किनारे बसे होकर डूब क्षेत्र में है। जब वैक्सीनेशन के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए और अभियान चला तो सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि उन गांवों तक टीम कैसे जाएगी क्योंकि वहां पानी भरा रहता है। मार्ग भी सुगम नहीं है  लेकिन रीना ने हार नहीं मानी और खुद को दिए गए लक्ष्य को तो हासिल किया ही, देश की उपलब्धि में भी भागीदार बनीं।
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पैदल चलती थी पहाड़ पर
रीना को टीका लगाने के लिए गांवों में जाना पड़ता। पीठ पर बैग टांगकर हाथ में पानी की बोतल लिए टीकाकरण सामग्री लेकर वे पथ पर बढ़तीं गईं। कई बार दो से तीन किमी के पहाड़ को पार करके पैदल जाना पड़ा तो कभी नाव में बैठकर पहुंचीं। सिर्फ इसलिए कि लोग वैक्सीन लगवाएं और कोरोना की जंग में देश मजबूत बने। बिना थके बिना रूके रीना डटी रही और उनकी इसी जीवटता के चलते आज हर कोई उनकी प्रशंसा कर रहा है।
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शुरुआत में आई परेशानी
रीना कहती हैं कि टीकाकरण के शुरुआती दौर में काफी दिक्कतें आई। जागरूकता का अभाव था जिस कारण ग्रामीण टीके लगाना नहीं चाहते थे। वे हमको देखते तो घर में ताला लगाकर भाग जाते थे। कुछ लोग खेत में जाकर छिप जाते। लेकिन हमने हार नहीं मानी। गांव के सरपंच, स्कूल के शिक्षकों व अन्य लोगों की मदद ली। ग्रामीणों को जागरूक किया। उनको टीके की अहमियत बताई और इसके बाद गांव वाले राजी हुए और टीकाकरण तेजी से हुआ।


ड्यूटी के साथ निभाती मां का फर्ज
रीना की राह आसान नहीं थी क्योंकि सरकारी ड्यूटी के साथ मां का फर्ज भी निभाना था लेकिन रीना ने दोनों फर्ज शिद्दत से निभाए। मूल रूप से बड़वानी की रहने  वाली रीना जिस ककराना उप स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं वहां से एक किमी पैदल चलकर नदी तक पहुंचती थी। इसके बाद नाव में बैठकर गांव जाती। बाद में पथरीले पहाड़ों पर चढऩा पड़ता था। अपना काम खत्म कर घर पहुंचती और मां का फर्ज निभाती। रीना के दो बच्चे हैं। बेटा कई बार साथ आने की जिद करता तो उसे भी साथ लेकर जाती। रीना की इस जीवटता को देख जिलेभर में उनकी प्रशंसा हो रही है। सरकार ने भी तारीफ की है।
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