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आस्था, कला और हुनर का संगम: सागर में 50 साल से बन रही दुर्गा प्रतिमाएं, देशभर में रहती है डिमांड
Tue, 06 Oct 2026 08:32 AM IST
सागर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
Published by: सागर ब्यूरो
Updated Tue, 06 Oct 2026 08:32 AM IST
सार
नवरात्रि से पहले सागर में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का निर्माण जोरों पर है। शहर का विश्वकर्मा बंधु परिवार पिछले 50 वर्षों से मूर्तिकला की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। परिवार सालभर दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण में जुटा रहता है।
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मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
नवरात्रि का पावन पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बुंदेलखंड अंचल में तैयारियां जोरों पर शुरू हो गई हैं। शहर में जगह-जगह भव्य पंडाल सजाए जाएंगे और मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमाओं की स्थापना की जाएगी। सागर में दुर्गा पूजन का यह उत्सव विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है और यहां बनी दुर्गा प्रतिमाओं की मांग देश के कई राज्यों में रहती है।
एक तरफ जहां बंगाली और बुंदेली पैटर्न की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ कलाकार अपनी कला से भव्यता की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। ऐसे ही हुनरमंद कलाकारों में शामिल हैं 'विश्वकर्मा बंधु', जिनका परिवार पिछले 50 वर्षों से आस्था और कला का अद्भुत संगम रच रहा है। इनकी बनाई गई कलात्मक प्रतिमाएं इन दिनों सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही हैं और पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
12 महीने मां दुर्गा की सेवा में समर्पित शिल्पी
पारंपरिक शिल्पकला को समर्पित यह परिवार किसी खास मौसम या त्योहार का इंतजार नहीं करता, बल्कि साल के बारह महीने मां दुर्गा की मूर्तियों के निर्माण में जुटा रहता है। छह भाइयों का यह परिवार पीढ़ियों से चली आ रही इस विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। वर्ष 2015 से इस कला में परिवार की युवा पीढ़ी भी पूरी ऊर्जा के साथ उतर आई है, जिसके चलते पारंपरिक शिल्प में आधुनिक सोच और तकनीक का बेहतरीन मेल देखने को मिल रहा है।
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पर्यावरण का ध्यान और आकर्षक थीम
आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जिसे ध्यान में रखते हुए ये शिल्पी पूरी तरह इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल) प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। मूर्तियों के निर्माण में प्राकृतिक रंगों और सुरक्षित सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जिससे आस्था के साथ प्रकृति का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। सागर के इन कलाकारों की विशेषता है कि इनकी हर प्रतिमा एक अलग और आकर्षक थीम पर आधारित होती है। पौराणिक कथाओं से लेकर समसामयिक विषयों पर आधारित ये मूर्तियां हर किसी का मन मोह लेती हैं। इन मूर्तियों की कीमत 51 हजार रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक है, जो उनके आकार, भव्यता और बारीक नक्काशी को दर्शाती है।
ये भी पढ़ें- उज्जैन के पुनीत का कमाल: 502 ग्राम का मीरा कैमरा अंतरिक्ष में पहुंचा, स्पेसएक्स के फैलकॉन-9 से लियो में एंट्री
देश के कई राज्यों तक फैली है ख्याति
विश्वकर्मा बंधुओं के हाथों गढ़ी गई इन मनमोहक प्रतिमाओं की मांग केवल सागर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों के बड़े शहरों तक फैली हुई है। यहां से तैयार मूर्तियां विशेष रूप से जलगांव, नागपुर, भोपाल, दमोह, बांदा, टीकमगढ़, सागर, छिंदवाड़ा सहित आसपास के शहरों में भेजी जाती हैं, जहां पंडालों की शोभा बढ़ाने के लिए इन्हें विशेष रूप से बुक किया जाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी छाई कला
अपनी कला और भव्यता के दम पर इन मूर्तियों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी धूम मचा रखी है। सोशल मीडिया पर इन प्रतिमाओं के वीडियो और तस्वीरें जमकर वायरल हो रही हैं, जिन्हें देशभर के कला प्रेमी और श्रद्धालु बेहद पसंद कर रहे हैं। सागर के इन हुनरमंद शिल्पकारों ने अपनी मेहनत और लगन से न केवल अपने परिवार का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरे देश में सागर शहर की एक विशिष्ट कलात्मक पहचान भी स्थापित की है।
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एक तरफ जहां बंगाली और बुंदेली पैटर्न की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ कलाकार अपनी कला से भव्यता की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। ऐसे ही हुनरमंद कलाकारों में शामिल हैं 'विश्वकर्मा बंधु', जिनका परिवार पिछले 50 वर्षों से आस्था और कला का अद्भुत संगम रच रहा है। इनकी बनाई गई कलात्मक प्रतिमाएं इन दिनों सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही हैं और पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
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12 महीने मां दुर्गा की सेवा में समर्पित शिल्पी
पारंपरिक शिल्पकला को समर्पित यह परिवार किसी खास मौसम या त्योहार का इंतजार नहीं करता, बल्कि साल के बारह महीने मां दुर्गा की मूर्तियों के निर्माण में जुटा रहता है। छह भाइयों का यह परिवार पीढ़ियों से चली आ रही इस विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। वर्ष 2015 से इस कला में परिवार की युवा पीढ़ी भी पूरी ऊर्जा के साथ उतर आई है, जिसके चलते पारंपरिक शिल्प में आधुनिक सोच और तकनीक का बेहतरीन मेल देखने को मिल रहा है।
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पर्यावरण का ध्यान और आकर्षक थीम
आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जिसे ध्यान में रखते हुए ये शिल्पी पूरी तरह इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल) प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। मूर्तियों के निर्माण में प्राकृतिक रंगों और सुरक्षित सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जिससे आस्था के साथ प्रकृति का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। सागर के इन कलाकारों की विशेषता है कि इनकी हर प्रतिमा एक अलग और आकर्षक थीम पर आधारित होती है। पौराणिक कथाओं से लेकर समसामयिक विषयों पर आधारित ये मूर्तियां हर किसी का मन मोह लेती हैं। इन मूर्तियों की कीमत 51 हजार रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक है, जो उनके आकार, भव्यता और बारीक नक्काशी को दर्शाती है।
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देश के कई राज्यों तक फैली है ख्याति
विश्वकर्मा बंधुओं के हाथों गढ़ी गई इन मनमोहक प्रतिमाओं की मांग केवल सागर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों के बड़े शहरों तक फैली हुई है। यहां से तैयार मूर्तियां विशेष रूप से जलगांव, नागपुर, भोपाल, दमोह, बांदा, टीकमगढ़, सागर, छिंदवाड़ा सहित आसपास के शहरों में भेजी जाती हैं, जहां पंडालों की शोभा बढ़ाने के लिए इन्हें विशेष रूप से बुक किया जाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी छाई कला
अपनी कला और भव्यता के दम पर इन मूर्तियों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी धूम मचा रखी है। सोशल मीडिया पर इन प्रतिमाओं के वीडियो और तस्वीरें जमकर वायरल हो रही हैं, जिन्हें देशभर के कला प्रेमी और श्रद्धालु बेहद पसंद कर रहे हैं। सागर के इन हुनरमंद शिल्पकारों ने अपनी मेहनत और लगन से न केवल अपने परिवार का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरे देश में सागर शहर की एक विशिष्ट कलात्मक पहचान भी स्थापित की है।
