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Sagar: अष्टकोणीय मंदिर में स्थित है जमीन से निकली गणेश प्रतिमा, मूर्ति के शीश पर लगाई गई है अभिमंत्रित कील
Fri, 22 Sep 2023 02:58 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Fri, 22 Sep 2023 02:58 PM IST
सार
मंदिर निर्माण का कार्य वर्ष 1603 से शुरू हुआ। महाराष्ट्र से आए कारीगरों को यह अष्टकोणीय मंदिर तैयार करने में लगभग 35 साल लग गए थे। 1638 में इस मंदिर की स्थापना हुई और तब ही से यह पूरा क्षेत्र गणेशघाट के नाम से प्रसिद्ध है।
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गणेश जी की दिव्य प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सागर के लाखा बंजारा झील किनारे स्थित श्रीगणेश का अष्टकोणीय मंदिर बुंदेलखंड के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। मराठाकाल में जमीन की खुदाई के दौरान प्रकट हुई श्रीगणेश की यह अद्वितीय चमत्कारिक प्रतिमा स्थापना के बाद से हर साल बढ़ती जा रही थी, जिसे देखते हुए सागर प्रवास पर आए शंकराचार्य ने एक अभिमंत्रित कील प्रतिमा के सिर पर ठोककर गणेशजी को बढ़ने से रोका था। मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर की तरह भारत में अष्टकोणीय श्रीगणेशजी का यह दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है।
जमीन की खुदाई में मिली थी भगवान गणेश की प्रतिमा
मराठाकाल में यहां स्थित प्रतिमा जमीन की खुदाई के दौरान निकली थी, जिन्हें उनके पिता शंकरजी के साथ स्थापित किया गया है। मंदिर निर्माण का कार्य वर्ष 1603 से शुरू हुआ। महाराष्ट्र से आए कारीगरों को यह अष्टकोणीय मंदिर तैयार करने में लगभग 35 साल लग गए थे। 1638 में इस मंदिर की स्थापना हुई और तब ही से यह पूरा क्षेत्र गणेशघाट के नाम से प्रसिद्ध है। मराठा शासक बाजीराव के समय इस मंदिर का निर्माण हुआ थाय़ मंदिर में सभी की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देशभर के श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
गणेश जी की प्रतिमा में लगी है अभिमंत्रित लोहे की कील
पुजारी गोविंदराव आठले ने बताया कि मंदिर में श्रीगणेशजी की प्रतिमा विराजमान कराने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि हर साल प्रतिमा थोड़ी-थोड़ी बढ़ने लगी है, तो उन्होंने सागर प्रवास पर आए शंकराचार्य से संपर्क किया। इसके बाद शंकराचार्य ने यहां आकर गणेशजी की आराधना की और काफी पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने एक अभिमंत्रित लोहे की कील गणेशजी के सिर पर ठोकी, जो आज भी प्रतिमा में देखी जा सकती है। इसके बाद प्रतिमा उसी हाइट में है। यहां गणेशजी को सिर्फ सिंदूर और पीले फूल ही अर्पित किए जाते हैं।
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जमीन की खुदाई में मिली थी भगवान गणेश की प्रतिमा
मराठाकाल में यहां स्थित प्रतिमा जमीन की खुदाई के दौरान निकली थी, जिन्हें उनके पिता शंकरजी के साथ स्थापित किया गया है। मंदिर निर्माण का कार्य वर्ष 1603 से शुरू हुआ। महाराष्ट्र से आए कारीगरों को यह अष्टकोणीय मंदिर तैयार करने में लगभग 35 साल लग गए थे। 1638 में इस मंदिर की स्थापना हुई और तब ही से यह पूरा क्षेत्र गणेशघाट के नाम से प्रसिद्ध है। मराठा शासक बाजीराव के समय इस मंदिर का निर्माण हुआ थाय़ मंदिर में सभी की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देशभर के श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
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गणेश जी की प्रतिमा में लगी है अभिमंत्रित लोहे की कील
पुजारी गोविंदराव आठले ने बताया कि मंदिर में श्रीगणेशजी की प्रतिमा विराजमान कराने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि हर साल प्रतिमा थोड़ी-थोड़ी बढ़ने लगी है, तो उन्होंने सागर प्रवास पर आए शंकराचार्य से संपर्क किया। इसके बाद शंकराचार्य ने यहां आकर गणेशजी की आराधना की और काफी पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने एक अभिमंत्रित लोहे की कील गणेशजी के सिर पर ठोकी, जो आज भी प्रतिमा में देखी जा सकती है। इसके बाद प्रतिमा उसी हाइट में है। यहां गणेशजी को सिर्फ सिंदूर और पीले फूल ही अर्पित किए जाते हैं।
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