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मध्य प्रदेश: कर्मचारी की बर्खास्तगी और समय-सीमा के संबंध में श्रम न्यायालय करें निर्णय, हाईकोर्ट का अहम फैसला

Thu, 22 Oct 2026 09:54 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Thu, 22 Oct 2026 09:54 PM IST
सार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि श्रम आयुक्त की भूमिका औद्योगिक विवाद को श्रम न्यायालय भेजने तक सीमित है। जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने छिंदवाड़ा श्रम न्यायालय को मामले के तथ्यों और तीन वर्ष की वैधानिक समय-सीमा पर स्वतंत्र रूप से विचार कर उचित आदेश पारित करने के निर्देश दिए। 

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The Labour Court should make a decision regarding the employee's dismissal and the time limit.
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि श्रम आयुक्त की भूमिका औद्योगिक विवाद को श्रम न्यायालय के समक्ष संदर्भित करने तक सीमित है। विवाद के गुण-दोष पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार श्रम न्यायालय का है। जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ याचिका का निराकरण करते हुए प्रकरण को श्रम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

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मामले में याचिकाकर्ता कंपनी मेसर्स पीबीएम पॉलिटिक्स लिमिटेड ने 29 जनवरी 2020 को तत्कालीन अतिरिक्त श्रम आयुक्त, इंदौर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। कंपनी की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि ज्योत्सना सोमकुंवर से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान श्रम आयुक्त ने मामले को श्रम न्यायालय भेजने का आदेश दिया था।
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याचिकाकर्ता कंपनी की मुख्य आपत्ति थी कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2-ए की उपधारा (3) के तहत निर्धारित तीन वर्ष की समय-सीमा पर विचार किए बिना ही विवाद को श्रम न्यायालय के पास भेज दिया गया।

मामले की सुनवाई के बाद एकलपीठ ने कहा कि श्रम आयुक्त विवाद के गुण-दोष पर अंतिम फैसला देने वाला प्राधिकारी नहीं है। हाईकोर्ट ने छिंदवाड़ा स्थित श्रम न्यायालय को निर्देश दिए कि वह मामले के तथ्यों और समय-सीमा से जुड़े प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से विचार करे। दोनों पहलुओं पर निष्कर्ष निकालने के बाद उचित आदेश पारित किया जाए।

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