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सत्ता और सियासत: बस, शिवराज और सिंधिया का ध्यान रखो, सीएम को दिल्ली का इशारा
Mon, 18 Nov 2024 04:21 PM IST
दिनेश शर्मा
अरविंद तिवारी
अरविंद तिवारी
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Mon, 18 Nov 2024 04:21 PM IST
सार
प्रदेश के दो बड़े भाजपा नेताओं की खींचतान अब सार्वजनिक हो गई है। मामला भी ऐसा है कि नाराजगी का इजहार अब खुलकर होने लगा है। दरअसल पूरा मामला इंदौर में दबदबे को लेकर है।
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अरविंद तिवारी का क़ॉलम
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों यही फार्मूला काम कर रहा है। तमाम क्षत्रपों से घिरे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को दिल्ली से इशारा कर दिया गया है कि बस, शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया का ध्यान रखो, वह भी इनके क्षेत्र से जुड़े मामलों में, बाकी में आपको फ्रीहैंड। यादव ने भी इसी गुरु मंत्र का अनुसरण करना शुरू कर दिया है और यही कारण है कि जो उन्हें सुहा रहा है, वही इन दिनों मध्य प्रदेश में देखने को मिल रहा है। कभी प्रदेश की सत्ता में दबदबा रखने वाले क्षत्रप बेचैन हैं और दिक्कत यह है कि दिल्ली की मंशा को भांपते हुए वे चाहते हुए भी तीखे तेवर दिखा नहीं पा रहे हैं।
असली दिक्कत इंदौर में दबदबे की
प्रदेश के दो बड़े भाजपा नेताओं की खींचतान अब सार्वजनिक हो गई है। मामला भी ऐसा है कि नाराजगी का इजहार अब खुलकर होने लगा है। दरअसल पूरा मामला इंदौर में दबदबे को लेकर है। एक नेता चाहते हैं इंदौर के मामले में सबकुछ उनके मुताबिक हो। शुरुआत में ऐसा हुआ भी, लेकिन धीरे-धीरे दूसरे नेता पर इंदौर का रंग चढ़ने लगा और जल्दी ही समझ आ गया कि जिसके कब्जे में इंदौर, वही मीर। बस, इसी के बाद उन्होंने इंदौर में पांव पसारना शुरू कर दिए तो टकराहट बढ़ी और अब तो स्थिति यह है कि इसी टकराहट के चलते कुछ दिन बाद यदि कोई बड़ी खबर सुनने को मिले तो चौंकिए मत।
आखिर ऐसा क्या खास है इस इमारत में
इंदौर में विजयनगर चौराहे के पास की एक बड़ी बिल्डिंग इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा का मुद्दा बनी हुई है। इस बिल्डिंग में कुछ ही दिन पहले खुले एक ऑफिस में अलग-अलग कारोबार से जुड़े लोग किसी से मिलने के इंतजार में लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। यदि नंबर आ जाए और बातचीत के बाद ठोस आश्वासन मिल जाए तो फिर आपकी बल्ले-बल्ले। इंदौर के रियल इस्टेट कारोबारियों को इस ऑफिस से बहुत ज्यादा उम्मीद है, इसलिए यहां सबसे ज्यादा भीड़ उन्हीं लोगों की रहती है। इनमें भी उन कारोबारियों की संख्या ज्यादा है, जिनके जमीनों से संबंधित मामले बहुत उलझे हुए हैं। खास बात यह है कि ऑफिस खोलने वालों का इंदौर से कभी ज्यादा वास्ता नहीं रहा।
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पदाधिकारी पटवारी ने बनाया, हाजिरी कमलनाथ के दरबार में
तमाम कोशिशों और दिल्ली दरबार में कई दिग्गजों को साधने के बाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की परेशानी कम नहीं हो रही है। ताजा मामला भी कुछ ऐसा ही है। बड़ी मशक्कत के बाद पटवारी लंबी-चौड़ी टीम बनाने में तो सफल हो गए, लेकिन जिनको उन्होंने पदाधिकारी बनाया उनमें से कई ने बनने के बाद से ही कमलनाथ के दरबार में दस्तक देना शुरू कर दिया। उनके जन्मदिन के मौके पर ऐसे कई नेता हाजिरी भरने छिंदवाड़ा पहुंचे और यह कहने से भी नहीं चूके कि साहब, आपके मेहरबानी से ही हमें यह मौका मिला है। है, न ये पटवारी के लिए चिंता की बात। वैसे पटवारी की टीम में शामिल कई नेता उनके ही खिलाफ मुखरता दिखाने में भी पीछे नहीं रह रहे।
ये सीएस के दबदबे वाली तबादला सूची थी
मध्य प्रदेश में पिछले दिनों आईएएस अफसरों की बड़ी तबादला सूची जारी हुई। महीनेभर की मशक्कत के बाद जारी हुई इस सूची में मुख्य सचिव अनुराग जैन के प्रशासनिक दबदबे की झलक देखने को मिली। अलग-अलग समीक्षा में बैठकों में वॉर्निंग के बाद भी जो अफसर चेते नहीं, उन्हें मुख्य सचिव उनकी हैसियत दिखाने में भी पीछे नहीं रहे। अनुसूचित जनजाति कल्याण और पशुपालन जैसे बड़े महकमे संभाल रहे ई. रमेश कुमार को इसी का खामियाजा भुगतना पड़ा और विभागीय मंत्रियों से अच्छा तालमेल होने के बावजूद उन्हें दो बड़े विभागों से बेदखल होकर लूप लाइन में जाना पड़ा। इससे इतर कुमार पुरुषोत्तम जैसे काबिल अफसर को अच्छी पदस्थापना भी मिली।
इस केमिस्ट्री में भी कुछ तो राज है
माना जा रहा है कि संजय शुक्ला नगरीय प्रशासन और विकास विभाग के प्रमुख सचिव विभाग के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की पसंद के चलते बनाए गए। जब विजयवर्गीय इंदौर के महापौर थे, तब शुक्ला नगर निगम के आयुक्त हुआ करते थे। शुक्ला की गिनती मुख्यमंत्री के पसंदीदा अफसरों में भी होती है। वे जब मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव थे, तब भरत यादव उनके साथ सचिव की भूमिका में थे, दोनों के बीच गजब तालमेल था। यादव के पास नगरीय प्रशासन आयुक्त का भी प्रभार है। अब शुक्ला इसी महकमे के प्रमुख सचिव हो गए हैं। केमिस्ट्री तो यही कहती है कि दोनों का तालमेल यहां भी बना रहेगा, बस इस जोड़ी को विजयवर्गीय की नजर नहीं लगना चाहिए।
चलते-चलते
चर्चा इस बात की है कि क्या मुख्य सचिव की तरह मध्य प्रदेश के नए डीजीपी का फैसला भी दिल्ली से ही होगा। इसी चर्चा ने कुछ उन अफसरों की उम्मीद को भी जगा दिया है, जिन्हें प्रदेश की सत्ता के समीकरण के चलते इस पद की दौड़ से बाहर माना जा रहा था। ऐसे अफसरों ने दिल्ली दरबार में दस्तक दे दी है और वे ये आश्वासन पाने में भी सफल हो गए हैं कि देर हो सकती है, पर अंधेर नहीं।
पुछल्ला
कद्दावर मंत्रियों की नाराजगी के बाद अब इतना तो हो गया है कि मंत्रियों को अपने विभाग में उनके पसंदीदा अफसर मिलने लगे हैं। जिन अफसरों की अपने विभागीय मंत्रियों से पटरी नहीं बैठ रही थी, उन्हें वहां से रवानगी देने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसका फायदा उठाने में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री भी पीछे नहीं रहे हैं और पिछले दिनों जारी तबादला सूची में इसकी झलक देखने को मिल गई है।
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असली दिक्कत इंदौर में दबदबे की
प्रदेश के दो बड़े भाजपा नेताओं की खींचतान अब सार्वजनिक हो गई है। मामला भी ऐसा है कि नाराजगी का इजहार अब खुलकर होने लगा है। दरअसल पूरा मामला इंदौर में दबदबे को लेकर है। एक नेता चाहते हैं इंदौर के मामले में सबकुछ उनके मुताबिक हो। शुरुआत में ऐसा हुआ भी, लेकिन धीरे-धीरे दूसरे नेता पर इंदौर का रंग चढ़ने लगा और जल्दी ही समझ आ गया कि जिसके कब्जे में इंदौर, वही मीर। बस, इसी के बाद उन्होंने इंदौर में पांव पसारना शुरू कर दिए तो टकराहट बढ़ी और अब तो स्थिति यह है कि इसी टकराहट के चलते कुछ दिन बाद यदि कोई बड़ी खबर सुनने को मिले तो चौंकिए मत।
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आखिर ऐसा क्या खास है इस इमारत में
इंदौर में विजयनगर चौराहे के पास की एक बड़ी बिल्डिंग इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा का मुद्दा बनी हुई है। इस बिल्डिंग में कुछ ही दिन पहले खुले एक ऑफिस में अलग-अलग कारोबार से जुड़े लोग किसी से मिलने के इंतजार में लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। यदि नंबर आ जाए और बातचीत के बाद ठोस आश्वासन मिल जाए तो फिर आपकी बल्ले-बल्ले। इंदौर के रियल इस्टेट कारोबारियों को इस ऑफिस से बहुत ज्यादा उम्मीद है, इसलिए यहां सबसे ज्यादा भीड़ उन्हीं लोगों की रहती है। इनमें भी उन कारोबारियों की संख्या ज्यादा है, जिनके जमीनों से संबंधित मामले बहुत उलझे हुए हैं। खास बात यह है कि ऑफिस खोलने वालों का इंदौर से कभी ज्यादा वास्ता नहीं रहा।
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पदाधिकारी पटवारी ने बनाया, हाजिरी कमलनाथ के दरबार में
तमाम कोशिशों और दिल्ली दरबार में कई दिग्गजों को साधने के बाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की परेशानी कम नहीं हो रही है। ताजा मामला भी कुछ ऐसा ही है। बड़ी मशक्कत के बाद पटवारी लंबी-चौड़ी टीम बनाने में तो सफल हो गए, लेकिन जिनको उन्होंने पदाधिकारी बनाया उनमें से कई ने बनने के बाद से ही कमलनाथ के दरबार में दस्तक देना शुरू कर दिया। उनके जन्मदिन के मौके पर ऐसे कई नेता हाजिरी भरने छिंदवाड़ा पहुंचे और यह कहने से भी नहीं चूके कि साहब, आपके मेहरबानी से ही हमें यह मौका मिला है। है, न ये पटवारी के लिए चिंता की बात। वैसे पटवारी की टीम में शामिल कई नेता उनके ही खिलाफ मुखरता दिखाने में भी पीछे नहीं रह रहे।
ये सीएस के दबदबे वाली तबादला सूची थी
मध्य प्रदेश में पिछले दिनों आईएएस अफसरों की बड़ी तबादला सूची जारी हुई। महीनेभर की मशक्कत के बाद जारी हुई इस सूची में मुख्य सचिव अनुराग जैन के प्रशासनिक दबदबे की झलक देखने को मिली। अलग-अलग समीक्षा में बैठकों में वॉर्निंग के बाद भी जो अफसर चेते नहीं, उन्हें मुख्य सचिव उनकी हैसियत दिखाने में भी पीछे नहीं रहे। अनुसूचित जनजाति कल्याण और पशुपालन जैसे बड़े महकमे संभाल रहे ई. रमेश कुमार को इसी का खामियाजा भुगतना पड़ा और विभागीय मंत्रियों से अच्छा तालमेल होने के बावजूद उन्हें दो बड़े विभागों से बेदखल होकर लूप लाइन में जाना पड़ा। इससे इतर कुमार पुरुषोत्तम जैसे काबिल अफसर को अच्छी पदस्थापना भी मिली।
इस केमिस्ट्री में भी कुछ तो राज है
माना जा रहा है कि संजय शुक्ला नगरीय प्रशासन और विकास विभाग के प्रमुख सचिव विभाग के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की पसंद के चलते बनाए गए। जब विजयवर्गीय इंदौर के महापौर थे, तब शुक्ला नगर निगम के आयुक्त हुआ करते थे। शुक्ला की गिनती मुख्यमंत्री के पसंदीदा अफसरों में भी होती है। वे जब मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव थे, तब भरत यादव उनके साथ सचिव की भूमिका में थे, दोनों के बीच गजब तालमेल था। यादव के पास नगरीय प्रशासन आयुक्त का भी प्रभार है। अब शुक्ला इसी महकमे के प्रमुख सचिव हो गए हैं। केमिस्ट्री तो यही कहती है कि दोनों का तालमेल यहां भी बना रहेगा, बस इस जोड़ी को विजयवर्गीय की नजर नहीं लगना चाहिए।
चलते-चलते
चर्चा इस बात की है कि क्या मुख्य सचिव की तरह मध्य प्रदेश के नए डीजीपी का फैसला भी दिल्ली से ही होगा। इसी चर्चा ने कुछ उन अफसरों की उम्मीद को भी जगा दिया है, जिन्हें प्रदेश की सत्ता के समीकरण के चलते इस पद की दौड़ से बाहर माना जा रहा था। ऐसे अफसरों ने दिल्ली दरबार में दस्तक दे दी है और वे ये आश्वासन पाने में भी सफल हो गए हैं कि देर हो सकती है, पर अंधेर नहीं।
पुछल्ला
कद्दावर मंत्रियों की नाराजगी के बाद अब इतना तो हो गया है कि मंत्रियों को अपने विभाग में उनके पसंदीदा अफसर मिलने लगे हैं। जिन अफसरों की अपने विभागीय मंत्रियों से पटरी नहीं बैठ रही थी, उन्हें वहां से रवानगी देने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसका फायदा उठाने में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री भी पीछे नहीं रहे हैं और पिछले दिनों जारी तबादला सूची में इसकी झलक देखने को मिल गई है।
