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Indore News: महू-कालाकुंड के155 साल पुराना मीटर गेज ट्रेक नदी, पहाड़, झरने बनाते है यादगार

Fri, 21 Aug 2026 05:29 PM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: Abhishek Chendke Updated Fri, 21 Aug 2026 05:29 PM IST
सार

इंदौर की हेरिटेज ट्रेन एक बार फिर पर्यटकों को रोमांचक सफर पर ले जाने के लिए तैयार है। 155 साल पुराने मीटर गेज ट्रैक पर चलने वाली यह ट्रेन महू से कालाकुंड के बीच पहाड़ों, सुरंगों, नदियों और झरनों के बीच से गुजरती है। 

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Indore News: The 155-year-old Mhow-Kalakund meter-gauge track offers a memorable journey amidst rivers, mounta
155 साल पुराने ट्रेक पर हेरिटेज ट्रेन - फोटो : amarujala

विस्तार

इंदौर में हेरिटेज ट्रेन का सफर अब शुरू होने वाला है। ट्रेन का ट्रायल रन हो चुका है। यह सफर इसलिए खास रहता है, क्योंकि ट्रेन 155 साल पुराने मीटर गेज ट्रैक पर दौड़ती है। इस सफर को तीन सुरंगें, नदियाँ, पहाड़ और झरने यादगार बनाते हैं।

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देशभर में जितनी भी ट्रेनें पहाड़ों पर चलती हैं, उनमें महू-कालाकुंड ट्रैक ही सबसे पुराना है। 1905 में कालका-शिमला ट्रैक बनाया गया था। महू-कालाकुंड ट्रैक पर जाने में एक घंटे से ज्यादा का समय लगता है, क्योंकि ट्रैक पर चढ़ाई रहती है। पातालपानी से कालाकुंड तक चढ़ाई ज्यादा रहती है। इस कारण ट्रेन हमेशा रुकती है। यहाँ क्रांतिकारी टंट्या मामा की समाधि है। कहा जाता है कि आदर स्वरूप ट्रेन समाधि पर रुकती है।
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Indore News: The 155-year-old Mhow-Kalakund meter-gauge track offers a memorable journey amidst rivers, mounta
हरी-भरी वादियों में आसान होगा सफर - फोटो : amarujala

दस किलोमीटर का सुहाना सफर

महू से कालाकुंड तक दस किलोमीटर का सफर सबसे सुहाना होता है। इस ट्रैक में तीन सुरंगें आती हैं। इसके अलावा अंग्रेजों के जमाने के ब्रिज से ट्रेन गुजरती है। ट्रेन में बैठे-बैठे पातालपानी झरना यात्रियों को नजर आता है। इसके अलावा विंध्याचल पर्वत माला के पहाड़ इस सफर को और मनोहारी बनाते हैं। पहले यह ट्रेन कालाकुंड होते हुए ओंकारेश्वर तक जाती थी, लेकिन अब ओंकारेश्वर तक ब्रॉडगेज ट्रैक अलग से बन रहा है। इस कारण अब 155 साल पुराना ट्रैक सिर्फ हेरिटेज ट्रेन के लिए ही सुरक्षित रखा गया है।

होलकर राजपरिवार ने दिया था पैसा

इस ट्रैक के निर्माण के लिए अंग्रेजों को होलकर राजवंश ने भी पैसा दिया था और हाथियों के जरिए रेलवे पटरियाँ पहाड़ों पर पहुँचाई गई थीं। तब पहाड़ों को काटकर ट्रेन की पटरियाँ बिछाना आसान नहीं था। सबसे कठिन था पातालपानी के पास से बहने वाली बरसाती नदी पर रेलवे ब्रिज बनाना, लेकिन तब इतना मजबूत ब्रिज बनाया गया, जो अभी भी काम आ रहा है। दो-तीन दिन बाद फिर अब इस ट्रैक पर पर्यटक यात्रा का लुत्फ ले सकेंगे।

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