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जिजीविषा: जो ज्ञान भीतर तक उतरता है, वह जीवन भर साथ रहता है
सार
ज्ञान शाब्दिक नहीं होता, यह आत्मिक होता है। यह सब तभी संभव है, जब ज्ञान का लक्ष्य केवल अर्जन नहीं, आत्मान्वेषण हो। यह यात्रा जब सच्चे अर्थों में आरंभ होती है, तब शब्द मौन हो जाते हैं और मौन से एक नई दृष्टि जन्म लेती है।
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ज्ञान आध्यात्मिक अध्ययन का मार्ग।
- फोटो : AI
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विस्तार
प्रश्न अक्सर यह नहीं होता कि हम क्या जानते हैं, बल्कि यह होता है कि हम जो जानते हैं, उसे हम कैसे आत्मसात करते हैं। ज्ञान केवल स्मृति का विषय नहीं, वह चेतना का विस्तार है। यह वही विस्तार है, जहां आत्मा अपने स्वाभाविक स्वरूप में लौटती है। हम सब कभी न कभी इस प्रश्न से जूझते हैं "मुझे यह जानना क्यों आवश्यक है? क्या केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए? क्या केवल समाज में मान बढ़ाने के लिए? या फिर अपने भीतर की किसी गहरी जिज्ञासा के उत्तर के लिए?”
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हमारा मस्तिष्क स्वयं को नये ज्ञान के अनुसार ढालने लगता है
प्राचीन भारत में ज्ञान कभी मात्र सूचना नहीं रहा, वह एक साधना रहा है। "सा विद्या या विमुक्तये" यह उपनिषदों का सूत्र है, जिसका अर्थ है... वही विद्या है, जो मुक्त करती है। यह मुक्ति केवल सांसारिक दुखों से नहीं, बल्कि अपने अज्ञान से, अपनी सीमित धारणाओं से, अपने भीतर के भ्रम से होती है। आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि जब हम कुछ नया सीखते हैं, तब हमारे मस्तिष्क में न्यूरोप्लास्टिसिटी सक्रिय होती है। इसका अर्थ है कि हमारा मस्तिष्क स्वयं को नये ज्ञान के अनुसार ढालने लगता है। जब हम सच्चे अर्थों में पढ़ते हैं (न केवल आंखों से, बल्कि अंतरात्मा से) तब हमारे मस्तिष्क में नए ‘सिनैप्टिक कनेक्शन’ बनते हैं। यही कारण है कि आध्यात्मिक ग्रंथों का पाठ केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं होता, वह चेतना को रूपांतरित करने की प्रक्रिया होती है।
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ज्ञान का लक्ष्य केवल अर्जन नहीं, आत्मान्वेषण होना चाहिए
सत्य तो यही है कि ज्ञान ही मुक्ति का कारण है। यह ज्ञान शाब्दिक नहीं होता, यह आत्मिक होता है। इसी कारण वेदांत में कहा गया... "अहं ब्रह्मास्मि" जब जानने वाला और ज्ञेय का भेद मिटता है, तब वास्तविक ज्ञान की शुरुआत होती है। लेकिन आज के युग में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि पढ़ना क्यों? और कैसे? केवल जानकारियों की अधिकता क्या हमें ज्ञानी बना देती है? उत्तर है... नहीं। ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक वह हमारी दृष्टि नहीं बदलता। जब तक वह अहं को क्षीण और समाप्त नहीं करता। जब तक वह भीतर की विनम्रता नहीं उपजाता। एक विद्यार्थी जो पाठ्यपुस्तकों से परे जाकर अपने जीवन में अनुभूति के स्तर पर सीखने लगता है, वही सच्चा साधक बनता है। एक डॉक्टर जो केवल शरीर नहीं, रोगी की चेतना को पढ़ता है वह चिकित्सक नहीं, एक सेवक होता है। एक शिक्षक जो केवल पाठ नहीं, बच्चों की दृष्टि पढ़ता है, वह गुरु होता है। यह सब तभी संभव है जब ज्ञान का लक्ष्य केवल अर्जन नहीं, आत्मान्वेषण हो। इस सन्दर्भ में बुद्ध की एक बात स्मरणीय है। उन्होंने कहा था "अप्प दीपो भव" स्वयं दीपक बनो। इसका अर्थ केवल आत्मनिर्भरता नहीं, यह संकेत है आत्मज्ञान का। कोई और हमारे लिए यह यात्रा नहीं कर सकता। कोई और हमारे लिए समझ नहीं सकता। ज्ञान की यह अग्नि भीतर ही प्रज्ज्वलित होती है।
प्राचीन गुरुकुल पद्धति का रहस्य
आज सोशल मीडिया और सूचना क्रांति ने ज्ञान को सतही बना दिया है, तब यह और आवश्यक हो जाता है कि हम इस क्षण ठहरें, चुनें, और गहराई से आत्मसात करें। जो पढ़ा जा रहा है, क्या वह जीवन से जुड़ा है? क्या वह हमारी चेतना को रूपांतरित कर रहा है? यदि नहीं, तो वह केवल शोर है, शब्दों का जाल है। प्राचीन गुरुकुल पद्धति का रहस्य यही था कि वहां शिष्य एक मन्त्र को वर्षों तक साधता था, क्योंकि लक्ष्य केवल कंठस्थ करना नहीं, आत्मस्थ करना था। आज भी यही पद्धति प्रासंगिक है, जब हम किसी विचार को ध्यान से पढ़ते हैं, उस पर चिंतन करते हैं, जीवन में उसे उतारते हैं, तब वह विचार हमारा बनता है।
तृष्णा की प्यास को बुझाता है सच्चा ज्ञान
ज्ञान प्राप्ति की इस यात्रा में ‘श्रवण’, ‘मनन’ और ‘निदिध्यासन’ ये तीन चरण बताए गए हैं। पहले हम सुनते हैं, फिर उस पर मनन करते हैं और अंत में उसे जीवन में उतारते हैं। यही आध्यात्मिक अध्ययन का मार्ग है। समकालीन जीवन में यह यात्रा और भी आवश्यक हो जाती है, जहां हम अनेक भूमिकाएं निभा रहे हैं। कोई मां है, कोई पिता, कोई शिक्षक, कोई छात्रा, कोई साधिका, कोई पथिक। हम सब कहीं न कहीं एक बात से जुड़े हैं... भीतर की तृष्णा से। यह प्यास केवल सच्चा ज्ञान ही बुझा सकता है।
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ध्यान और मौन में एक्टिव होता है मस्तिष्क का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क
जब मस्तिष्क अपने तंतु और संयोजनों को पुनः विन्यस्त करता है, जिससे हमारी सोच, अनुभव और स्मरण शक्ति विकसित होती है। जब व्यक्ति अर्थपूर्ण पठन करता है (यानी जो पढ़ा जा रहा है, वह उसके भाव-बोध और आत्म-बोध से जुड़ता है) तो मस्तिष्क का हिप्पोकैम्पस भाग उसे दीर्घकालिक स्मृति में रूपांतरित करता है। यही कारण है कि जो ज्ञान भीतर तक उतरता है, वह जीवन भर साथ रहता है। इसके साथ ही, ध्यान और मौन की स्थिति में मस्तिष्क का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क (DMN) सक्रिय होता है। यह नेटवर्क तब सक्रिय होता है, जब हम बाह्य गतिविधियों से हटकर अंतर्मुख होते हैं... जैसे ध्यान, चिंतन या गहराई से पढ़ना। इस स्थिति में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर स्रवित होते हैं, जो मानसिक शांति, एकाग्रता और आंतरिक संतुलन प्रदान करते हैं। यही वह स्थिति है जिसे योगदर्शन में "धारणा" और "ध्यान" कहा गया है।
ज्ञान की प्राप्ति है गुरु की शरण
जब व्यक्ति एकाग्र होकर मौन में ज्ञान का अभ्यास करता है तो वह केवल सूचना नहीं ग्रहण करता, बल्कि अपने मस्तिष्क की रचना को भी सशक्त करता है। इस प्रक्रिया में उसका आत्म-विश्वास, विवेक और आत्म-नियंत्रण विकसित होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी प्रकार, ग्रंथों में उल्लेखित है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु की शरण में जाना चाहिए। यह गुरु केवल व्यक्ति नहीं, वह चेतना है जो हमें हमारे अज्ञान से बाहर निकालती है। कभी वह गुरु एक पुस्तक हो सकती है, कभी एक अनुभव, कभी एक मौन भी। आवश्यकता है तो बस उस उद्देश्य की और जिज्ञासा की, जो हमें ज्ञानार्जन के लिए प्रोत्साहित करे। वहीं प्यास अंततः तपस्या बनती है। और वही तपस्या आत्मज्ञान में रूपांतरित होती है।
ज्ञान आत्मा की प्रकृति
ज्ञान कोई संग्रह नहीं, वह आत्मा की प्रकृति है। जब हम जानना चाहते हैं, तो हम भीतर लौटना चाहते हैं। और जब भीतर लौटते हैं, तो संसार को नई दृष्टि से देखना आरंभ करते हैं। ज्ञान का अंतिम उद्देश्य क्या है? केवल जानना नहीं, स्वयं को जानना। केवल बदलना नहीं, भीतर से रूपांतरित होना। केवल सफल होना नहीं, सार्थक होना। और जब यह यात्रा सच्चे अर्थों में आरंभ होती है, तब शब्द मौन हो जाते हैं और मौन से एक नई दृष्टि जन्म लेती है।