{"_id":"67f4d85710363b6c5e0f390e","slug":"survival-iim-indore-dr-ananya-mishra-blog-let-mind-be-stable-with-rtuchitt-2025-04-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिजीविषा: ऋतुचित्त से हो चित्त स्थिर, क्या होगा अगर हम ऐसा कर सकें","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
जिजीविषा: ऋतुचित्त से हो चित्त स्थिर, क्या होगा अगर हम ऐसा कर सकें
सार
हर ऋतु, चाहे वह सुख हो या दुख, केवल समय का एक हिस्सा है। जैसे गर्मी के मौसम में हम पंखा या एसी का उपयोग करते हैं, वैसे ही जीवन की कठिन परिस्थितियों में हमें अपनी आंतरिक शांति का सहारा लेना होता है।
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ऋतुचित्त का अभ्यास जीवन में एक अद्वितीय शक्ति लाता है।
- फोटो : freepik
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विस्तार
क्या आपने कभी अनुभव किया है कि जैसे मौसम बदलता है, वैसे ही मन भी बदलता रहता है? कभी सुख, कभी दुःख, कभी प्रेम, कभी घृणा, हमारे भीतर यह उतार-चढ़ाव अनवरत चलते रहते हैं। ये बदलाव बाहरी मौसम के समान हैं, जो समय के साथ होते रहते हैं। हम जिन स्थितियों में होते हैं, उनसे हमारा मन भी प्रभावित होता है। लेकिन, क्या होगा अगर हम उस चंचल मन को स्थिर कर सकें? क्या होगा अगर हम भीतर से इतना सशक्त हो सकें कि कोई भी बाहरी परिस्थिति हमें हिला न सके?
इससे जुड़ा एक अद्भुत सिद्धांत है जिसे हम “ऋतुचित्त” कहते हैं। ऋतुचित्त का अर्थ है, वह मानसिक अवस्था जहां मन बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। जब मन स्थिर होता है, तब वह किसी भी ऋतु (मौसम) की तरह अप्रभावित रहता है। जैसे गर्मी, सर्दी, या बारिश अपने समय पर आती हैं, वैसे ही मन की अवस्थाएं आती हैं, लेकिन एक स्थिर और साधक व्यक्ति उनके बीच भी शांत और स्थिर रहता है। यह स्थिति केवल संतों की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति इसे पा सकता है, अगर वह सही मार्ग का अनुसरण करे।
ये भी पढ़ें: जिजीविषा: विचारों का प्रवाह और आत्मा की गति है मारुत तत्व
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जीवन की यात्रा में, हम अक्सर बाहरी मौसमों के बदलाव को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं- गर्मी की तपिश, वर्षा की फुहारें, शरद की ठंडक। लेकिन, जब बात हमारे आंतरिक मनोभावों की आती है, तो हम उन पर नियंत्रण पाने की चेष्टा में संघर्षरत रहते हैं। क्या हो यदि हम अपने मन को भी ऋतुओं की भांति स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होने दें? यही विचार ‘ऋतुचित्त’ का है-एक ऐसा मन जो परिस्थिति के अनुसार सहजता से ढलता है, बिना किसी प्रतिरोध के।
कल्पना कीजिए, आप एक व्यस्त सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और अचानक कोई वाहन आपके सामने आ जाता है। स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है क्रोध या झुंझलाहट। लेकिन, यदि आपका चित्त ‘ऋतुचित्त’ है, तो आप उस क्षण को एक परिवर्तनशील परिस्थिति के रूप में देखेंगे, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए शांत रहेंगे। यह न केवल आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, बल्कि आपके निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
मनोविज्ञान के अनुसार, “Emotional Regulation” या भावनाओं का नियंत्रण, इस सिद्धांत से मेल खाता है। जब हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखते हैं, तो हम अपने चित्त को स्थिर कर पाते हैं। यदि, किसी दिन हमारा मन उदास है, तो हम उस उदासी को पहचानते हैं, लेकिन उसे अपनी पहचान नहीं बनने देते। हम जानते हैं कि यह सिर्फ एक ऋतु है, जो समय के साथ बदल जाएगी। इस तरह, हम अपने मन को बाहरी परिस्थितियों से अनावश्यक रूप से प्रभावित होने से बचाते हैं। भगवद्गीता में, श्रीकृष्ण अर्जुन को समत्व की शिक्षा देते हैं: “समत्वं योग उच्यते”—अर्थात, समता ही योग है। यह समता बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन की ओर संकेत करती है, जहां मन सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है। यह अवस्था प्राप्त करने के लिए मनोविज्ञान में ‘इमोशनल रेगुलेशन’ या ‘भावनात्मक नियंत्रण’ का उल्लेख मिलता है, जो हमें अपनी भावनाओं को पहचानने, समझने और प्रबंधित करने की क्षमता प्रदान करता है।
ये भी पढ़ें: इस मौसम में कुछ ऐसा है जो बेचैन कर देता है, गर्मी को अपनाएंगे तो ही मिलेगी शीतलता
इसी प्रकार मनोविज्ञान में, ‘कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग’ एक तकनीक है जिसमें हम किसी परिस्थिति को नए दृष्टिकोण से देखते हैं, जिससे हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया बदलती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई सहकर्मी आपकी आलोचना करता है, तो इसे व्यक्तिगत आघात मानने के बजाय, इसे सुधार के अवसर के रूप में देखना ‘कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग’ है। यह प्रक्रिया ‘ऋतुचित्त’ के विकास में सहायक होती है, जहां हम प्रत्येक परिस्थिति को एक नए अनुभव के रूप में स्वीकारते हैं।
ऋतुचित्त का अभ्यास जीवन में एक अद्वितीय शक्ति लाता है। सोचिए- सोशल मीडिया पर कितनी बार हम दूसरों के कमेंट्स या लाइक्स से अपनी मानसिक स्थिति को प्रभावित होते हैं। कभी हम खुश होते हैं, कभी निराश। कभी कुछ लोग हमारी तारीफ करते हैं, तो कभी कोई आलोचना करता है। लेकिन जब हमारे भीतर एक स्थिर चित्त होता है, तो न तारीफ से हमारा अहंकार बढ़ता है, न आलोचना से हमारा आत्मविश्वास टूटता है। हम अपने वास्तविक स्वभाव में रहते हैं, जो न तो दूसरों की स्वीकृति से प्रभावित होता है, न ही अस्वीकृति से। श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है...
अर्थात, जब कोई व्यक्ति जीवन के कई जन्मों के बाद ज्ञान प्राप्त करता है, तो वह यह समझ पाता है कि अंततः सब कुछ परमात्मा है। यही ज्ञान उसे अपनी असल पहचान तक पहुंचाता है, जिससे वह इस जीवन के हर परिवर्तन और ऋतु से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान उसे यह समझने में मदद करता है कि हर ऋतु, चाहे वह सुख हो या दुख, केवल समय का एक हिस्सा है।
जैसे गर्मी के मौसम में हम पंखा या एसी का उपयोग करते हैं, वैसे ही जीवन की कठिन परिस्थितियों में हमें अपनी आंतरिक शांति का सहारा लेना होता है। वह शांति जो न मौसम से प्रभावित होती है, न किसी और से। यही ऋतुचित्त का सच्चा अभ्यास है। यह केवल एक मानसिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में शांति और समृद्धि का द्वार खोलता है।
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हमारे मन का स्थिरता की ओर बढ़ना कोई आसान काम नहीं है, परंतु यह पूरी तरह से संभव है। मन में कभी न कभी उथल-पुथल होगी, परंतु जैसे नदी के गहरे पानी में मछली की गति बिना किसी रुकावट के रहती है, वैसे ही हम भी अपनी गहरी शांति में रहते हुए उथल-पुथल का सामना कर सकते हैं। जब हम यह समझ जाते हैं कि जीवन में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक अस्थायी स्थिति है, तो हम खुद को उसके साथ जोड़ने की बजाय उससे बाहर खड़ा हो पाते हैं।
जब हम अपने मन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करते हैं, तो हम उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं। अगर हम हर भावनात्मक प्रतिक्रिया को अपनी पहचान बनाने देते हैं, तो हम उस भावना के गुलाम बन जाते हैं। लेकिन अगर हम उसे एक अस्थायी स्थिति के रूप में देखते हैं, तो हम उससे मुक्त हो सकते हैं। यही है मानसिक स्थिरता की कुंजी।
हम अपने जीवन के हर पहलू में जल्दी परिणाम चाहते हैं- कभी अपनी नौकरी, कभी रिश्तों, कभी व्यक्तित्व के मामले में। लेकिन क्या हम यह समझते हैं कि हर चीज़ का एक समय होता है, और समय के साथ जीवन के ऋतु भी बदलते रहते हैं? एक व्यक्ति जो जीवन में मेहनत करता है और अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखता है, वह किसी भी बाहरी बदलाव से प्रभावित नहीं होता। उसका चित्त हमेशा स्थिर रहता है।
ये भी पढ़ें: कभी शांत ही नहीं बैठता, क्या आपने सोचा है, मन किससे भाग रहा है?
ऋतुचित्त का अभ्यास करने के लिए हमें पहले अपने भीतर की आवाज़ को सुनना सीखना होगा। जब हम अपने अंदर की स्थिति से वाकिफ होते हैं, तो हम बेहतर तरीके से बाहरी दुनिया से जुड़ सकते हैं। अपने चित्त को स्थिर करने के लिए हमें पहले अपनी भावनाओं और विचारों का निरीक्षण करना होगा। जब हम यह जानते हैं कि हर परिस्थिति अस्थायी है, तो हम उसे स्वीकार कर सकते हैं और शांति पा सकते हैं। जब हमारे मन की स्थिरता कायम रहती है, तब हम किसी भी जीवन की परिस्थिति से ना तो डरते हैं, और ना ही उसे भागने का रास्ता तलाशते हैं। हम उसे पूरी तरह से स्वीकारते हैं और उसी में अपने सर्वोत्तम प्रयासों को डालते हैं।
ऋतुचित्त का अभ्यास करना हमें सिखाता है कि जीवन के उतार-चढ़ाव हमारे नियंत्रण से बाहर हैं, लेकिन हमारी प्रतिक्रिया उन्हें नियंत्रित करने में हमारी शक्ति है। जब हम अपने भीतर की शांति को जान पाते हैं, तो हम किसी भी ऋतु से प्रभावित नहीं होते। यह शांति हमें जीवन की सबसे बड़ी स्थिरता देती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखिका के निजी विचार हैं। वे आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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इससे जुड़ा एक अद्भुत सिद्धांत है जिसे हम “ऋतुचित्त” कहते हैं। ऋतुचित्त का अर्थ है, वह मानसिक अवस्था जहां मन बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। जब मन स्थिर होता है, तब वह किसी भी ऋतु (मौसम) की तरह अप्रभावित रहता है। जैसे गर्मी, सर्दी, या बारिश अपने समय पर आती हैं, वैसे ही मन की अवस्थाएं आती हैं, लेकिन एक स्थिर और साधक व्यक्ति उनके बीच भी शांत और स्थिर रहता है। यह स्थिति केवल संतों की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति इसे पा सकता है, अगर वह सही मार्ग का अनुसरण करे।
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जीवन की यात्रा में, हम अक्सर बाहरी मौसमों के बदलाव को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं- गर्मी की तपिश, वर्षा की फुहारें, शरद की ठंडक। लेकिन, जब बात हमारे आंतरिक मनोभावों की आती है, तो हम उन पर नियंत्रण पाने की चेष्टा में संघर्षरत रहते हैं। क्या हो यदि हम अपने मन को भी ऋतुओं की भांति स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होने दें? यही विचार ‘ऋतुचित्त’ का है-एक ऐसा मन जो परिस्थिति के अनुसार सहजता से ढलता है, बिना किसी प्रतिरोध के।
कल्पना कीजिए, आप एक व्यस्त सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और अचानक कोई वाहन आपके सामने आ जाता है। स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है क्रोध या झुंझलाहट। लेकिन, यदि आपका चित्त ‘ऋतुचित्त’ है, तो आप उस क्षण को एक परिवर्तनशील परिस्थिति के रूप में देखेंगे, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए शांत रहेंगे। यह न केवल आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, बल्कि आपके निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
मनोविज्ञान के अनुसार, “Emotional Regulation” या भावनाओं का नियंत्रण, इस सिद्धांत से मेल खाता है। जब हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखते हैं, तो हम अपने चित्त को स्थिर कर पाते हैं। यदि, किसी दिन हमारा मन उदास है, तो हम उस उदासी को पहचानते हैं, लेकिन उसे अपनी पहचान नहीं बनने देते। हम जानते हैं कि यह सिर्फ एक ऋतु है, जो समय के साथ बदल जाएगी। इस तरह, हम अपने मन को बाहरी परिस्थितियों से अनावश्यक रूप से प्रभावित होने से बचाते हैं। भगवद्गीता में, श्रीकृष्ण अर्जुन को समत्व की शिक्षा देते हैं: “समत्वं योग उच्यते”—अर्थात, समता ही योग है। यह समता बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन की ओर संकेत करती है, जहां मन सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है। यह अवस्था प्राप्त करने के लिए मनोविज्ञान में ‘इमोशनल रेगुलेशन’ या ‘भावनात्मक नियंत्रण’ का उल्लेख मिलता है, जो हमें अपनी भावनाओं को पहचानने, समझने और प्रबंधित करने की क्षमता प्रदान करता है।
ये भी पढ़ें: इस मौसम में कुछ ऐसा है जो बेचैन कर देता है, गर्मी को अपनाएंगे तो ही मिलेगी शीतलता
इसी प्रकार मनोविज्ञान में, ‘कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग’ एक तकनीक है जिसमें हम किसी परिस्थिति को नए दृष्टिकोण से देखते हैं, जिससे हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया बदलती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई सहकर्मी आपकी आलोचना करता है, तो इसे व्यक्तिगत आघात मानने के बजाय, इसे सुधार के अवसर के रूप में देखना ‘कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग’ है। यह प्रक्रिया ‘ऋतुचित्त’ के विकास में सहायक होती है, जहां हम प्रत्येक परिस्थिति को एक नए अनुभव के रूप में स्वीकारते हैं।
ऋतुचित्त का अभ्यास जीवन में एक अद्वितीय शक्ति लाता है। सोचिए- सोशल मीडिया पर कितनी बार हम दूसरों के कमेंट्स या लाइक्स से अपनी मानसिक स्थिति को प्रभावित होते हैं। कभी हम खुश होते हैं, कभी निराश। कभी कुछ लोग हमारी तारीफ करते हैं, तो कभी कोई आलोचना करता है। लेकिन जब हमारे भीतर एक स्थिर चित्त होता है, तो न तारीफ से हमारा अहंकार बढ़ता है, न आलोचना से हमारा आत्मविश्वास टूटता है। हम अपने वास्तविक स्वभाव में रहते हैं, जो न तो दूसरों की स्वीकृति से प्रभावित होता है, न ही अस्वीकृति से। श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है...
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥” (गीता 7.19)
अर्थात, जब कोई व्यक्ति जीवन के कई जन्मों के बाद ज्ञान प्राप्त करता है, तो वह यह समझ पाता है कि अंततः सब कुछ परमात्मा है। यही ज्ञान उसे अपनी असल पहचान तक पहुंचाता है, जिससे वह इस जीवन के हर परिवर्तन और ऋतु से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान उसे यह समझने में मदद करता है कि हर ऋतु, चाहे वह सुख हो या दुख, केवल समय का एक हिस्सा है।
जैसे गर्मी के मौसम में हम पंखा या एसी का उपयोग करते हैं, वैसे ही जीवन की कठिन परिस्थितियों में हमें अपनी आंतरिक शांति का सहारा लेना होता है। वह शांति जो न मौसम से प्रभावित होती है, न किसी और से। यही ऋतुचित्त का सच्चा अभ्यास है। यह केवल एक मानसिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में शांति और समृद्धि का द्वार खोलता है।
ये भी पढ़ें: छोड़ दें नियंत्रण, यदि सब कुछ ईश्वरीय इच्छा के अनुसार हो रहा है, तो चिंता क्यों करें?
हमारे मन का स्थिरता की ओर बढ़ना कोई आसान काम नहीं है, परंतु यह पूरी तरह से संभव है। मन में कभी न कभी उथल-पुथल होगी, परंतु जैसे नदी के गहरे पानी में मछली की गति बिना किसी रुकावट के रहती है, वैसे ही हम भी अपनी गहरी शांति में रहते हुए उथल-पुथल का सामना कर सकते हैं। जब हम यह समझ जाते हैं कि जीवन में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक अस्थायी स्थिति है, तो हम खुद को उसके साथ जोड़ने की बजाय उससे बाहर खड़ा हो पाते हैं।
जब हम अपने मन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करते हैं, तो हम उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं। अगर हम हर भावनात्मक प्रतिक्रिया को अपनी पहचान बनाने देते हैं, तो हम उस भावना के गुलाम बन जाते हैं। लेकिन अगर हम उसे एक अस्थायी स्थिति के रूप में देखते हैं, तो हम उससे मुक्त हो सकते हैं। यही है मानसिक स्थिरता की कुंजी।
हम अपने जीवन के हर पहलू में जल्दी परिणाम चाहते हैं- कभी अपनी नौकरी, कभी रिश्तों, कभी व्यक्तित्व के मामले में। लेकिन क्या हम यह समझते हैं कि हर चीज़ का एक समय होता है, और समय के साथ जीवन के ऋतु भी बदलते रहते हैं? एक व्यक्ति जो जीवन में मेहनत करता है और अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखता है, वह किसी भी बाहरी बदलाव से प्रभावित नहीं होता। उसका चित्त हमेशा स्थिर रहता है।
ये भी पढ़ें: कभी शांत ही नहीं बैठता, क्या आपने सोचा है, मन किससे भाग रहा है?
ऋतुचित्त का अभ्यास करने के लिए हमें पहले अपने भीतर की आवाज़ को सुनना सीखना होगा। जब हम अपने अंदर की स्थिति से वाकिफ होते हैं, तो हम बेहतर तरीके से बाहरी दुनिया से जुड़ सकते हैं। अपने चित्त को स्थिर करने के लिए हमें पहले अपनी भावनाओं और विचारों का निरीक्षण करना होगा। जब हम यह जानते हैं कि हर परिस्थिति अस्थायी है, तो हम उसे स्वीकार कर सकते हैं और शांति पा सकते हैं। जब हमारे मन की स्थिरता कायम रहती है, तब हम किसी भी जीवन की परिस्थिति से ना तो डरते हैं, और ना ही उसे भागने का रास्ता तलाशते हैं। हम उसे पूरी तरह से स्वीकारते हैं और उसी में अपने सर्वोत्तम प्रयासों को डालते हैं।
ऋतुचित्त का अभ्यास करना हमें सिखाता है कि जीवन के उतार-चढ़ाव हमारे नियंत्रण से बाहर हैं, लेकिन हमारी प्रतिक्रिया उन्हें नियंत्रित करने में हमारी शक्ति है। जब हम अपने भीतर की शांति को जान पाते हैं, तो हम किसी भी ऋतु से प्रभावित नहीं होते। यह शांति हमें जीवन की सबसे बड़ी स्थिरता देती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखिका के निजी विचार हैं। वे आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।