जिजीविषा: सर्वात्मभाव है अहंकार से मुक्त होने का रहस्य, अद्वितीय अनुभव से हम क्यों हो जाते हैं दूर?
क्या कोई ऐसा दृष्टिकोण हो सकता है जिससे हम हर व्यक्ति में स्वयं को देख सकें? क्या यह संभव है कि किसी अपरिचित की पीड़ा हमें अपनी सी लगे? किसी पशु का भय, किसी वृक्ष की सूखी शाखा, किसी नदी का सूखना- क्या ये सब हमारे भीतर कुछ अनुभव करा सकते हैं?
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किन्तु कुछ समय बाद, उस व्यक्ति ने लोभवश राजा को रुरु की जानकारी दे दी, यह सोचकर कि वह इनाम प्राप्त करेगा। राजा ने रुरु को पकड़ने के लिए सैनिक भेजे। जब रुरु को यह ज्ञात हुआ तो वह स्वयं राजा के पास गया और पूरी घटना सुनाई। राजा उसकी करुणा और सत्यनिष्ठा से प्रभावित हुआ और उस व्यक्ति को दंडित करने का आदेश दिया। परंतु रुरु ने राजा से उस व्यक्ति को क्षमा करने की प्रार्थना की। राजा ने रुरु की बात मानी और उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया।
क्या कोई ऐसा दृष्टिकोण हो सकता है जिससे हम हर व्यक्ति में स्वयं को देख सकें? क्या यह संभव है कि किसी अपरिचित की पीड़ा हमें अपनी सी लगे? किसी पशु का भय, किसी वृक्ष की सूखी शाखा, किसी नदी का सूखना- क्या ये सब हमारे भीतर कुछ अनुभव करा सकते हैं? यदि हां, तो वह संवेदना, वह दृष्टि, वह भाव- वही है सर्वात्मभाव।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। (भगवद्गीता 6.30)
अर्थात, जिसने मुझे हर जगह देखा और हर वस्तु को मुझमें देखा- उसके लिए मैं कभी विलीन नहीं होता और वह मुझसे कभी दूर नहीं होता। यह श्लोक सर्वात्मभाव का मूल है। यह दृष्टि है, जहां कोई 'दूसरा' नहीं रहता। जहां द्वैत नहीं होता, केवल एक व्यापक अनुभव होता है-कि सब कुछ एक ही आत्मा का विस्तार है।
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सर्वात्मभाव का अर्थ है समस्त सृष्टि को अपने आत्म का ही प्रतिबिंब देखना। यह उस अद्वितीय अनुभव का संकेत है, जहां आत्मा की सीमित पहचान समाप्त हो जाती है और हम सबको एक ही चेतना के रूप में महसूस करते हैं। इसे आज भी हम अपनी जीवन के विभिन्न क्षणों में अनुभव कर सकते हैं। कल्पना करें, जब एक मां अपने शिशु की पीड़ा में बेचैन हो जाती है, जब एक डॉक्टर अपने रोगी के दर्द को अपने शरीर में महसूस करता है, जब एक साधक ध्यान में डूबकर श्वासों की गहरी गति से पूरी सृष्टि की धड़कन सुनने लगता है-तब वह सच्चे अर्थों में सर्वात्मभाव का अनुभव करता है।
मनुष्य की सबसे बड़ी व्याधि, सबसे बड़ी जड़ता, ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद है। यही है अहंकार। यही हैं हमारे सीमित विचार और हमारी छोटी-सी पहचान। हम केवल अपनी पहचान में खोकर भूल जाते हैं कि हम वही हैं जो समग्र अस्तित्व के साथ एक हैं। इन सीमाओं को मिटाने का एकमात्र मार्ग है- 'सबमें मैं और मुझमें सब' का साक्षात्कार। यही वह सत्य है जो हमें सर्वात्मभाव में प्रवेश कराता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यही वह अवस्था है जहां अहंकार का बंधन टूटता है और आत्मा की अनंतता का अनुभव होता है। उपनिषदों में कहा गया है-"आत्मैवेदं सर्वं", अर्थात, यह आत्मा ही सब कुछ है। यहां आत्मा किसी एक व्यक्ति का अहम् नहीं, बल्कि वह चैतन्य है जो सबके भीतर विद्यमान है। इसे ही आधुनिक भाषा में यूनिवर्सल कांशियसनेस (Universal Consciousness) कह सकते हैं। यह कोई दार्शनिक कल्पना नहीं, यह सजीव सत्य है।
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अब आधुनिक मनोविज्ञान की ओर दृष्टि डालें। मिरर न्यूरोन्स (Mirror Neurons) पर शोध बताता है कि जब हम किसी और को दर्द में देखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क का वही क्षेत्र सक्रिय हो जाता है जो तब होता है जब हम स्वयं पीड़ा में होते हैं। यानी, हमारी तंत्रिका प्रणाली मूलतः "एकात्मता" के लिए बनी है। यह विज्ञान भी स्वीकार करता है कि मनुष्य स्वभावतः परस्पर जुड़ा हुआ है। किन्तु, हम इस अद्वितीय अनुभव से क्यों दूर हो जाते हैं? क्योंकि हमारी चेतना की सीमा केवल हमारे स्वार्थ, हमारे सुख और दुःख तक ही सीमित हो जाती है। यही वह विकृति है जो हमें 'अलग' बनाती है। यही वह 'मैं' और 'मेरा' का भेद है, जो हमें दूसरों की पीड़ा और सुख से कट कर रखता है। यही हमारी अज्ञानता, या 'अविद्या', का कारण है। और यही हमारे बंधन का मूल स्रोत है।
जब श्रीराम ने लंका में रावण का वध किया और विभीषण को राज्य सौंपा, तब भी उनके हृदय में रावण के प्रति द्वेष का कोई स्थान नहीं था। लक्ष्मण से उन्होंने कहा, 'वह एक महान ज्ञानी था, उसके अंतिम संस्कार की व्यवस्था की जाए'। यह है सर्वात्मभाव-जहां शत्रु और मित्र का भेद समाप्त हो जाता है। वहां केवल आत्मा की उपस्थिति शेष रह जाती है। इस विचार के केंद्र में केवल 'मैं' और 'तू' का भेद नहीं रहता, बल्कि साक्षात ब्रह्म की चेतना होती है। इस अद्वितीय भाव को प्रकट करने का सबसे सहज साधन है-श्रद्धा। श्रद्धा का अर्थ केवल ईश्वर में आस्था नहीं है, बल्कि यह हर जीव में उस ईश्वर की उपस्थिति को स्वीकारने का भाव है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो हम उसमें ईश्वर का अंश पहचानते हैं। यही भावना जब व्यापक हो जाती है, तब वह सेवा, करुणा और अंततः सर्वात्मभाव में परिवर्तित हो जाती है।
सर्वात्मभाव का यह अनुभव हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाता है, जो हमें अपनी सीमाओं को पार करने की शक्ति प्रदान करता है। यह हमें समझाता है कि हम सब एक ही सृष्टि के अंश हैं और हर जीव, हर मनुष्य, हर प्राणी में वही परम तत्व निवास करता है।
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"
यह मंत्र मानवता का सर्वोच्च स्वर है। यह वही स्वर है जो सभी सीमाओं को तोड़ता है। जब हम दूसरों के सुख की कामना करते हैं, तब भीतर का अभिमान स्वतः गलने लगता है। जब हम सबके कल्याण में अपना कल्याण देखने लगते हैं-तब ही हम आत्मा के व्यापक रूप को पहचान पाते हैं। सर्वात्मभाव कोई जटिल साधना नहीं है। यह एक जीवन दृष्टि है। इसके लिए हमें तीर्थ नहीं, मन की शुद्धि चाहिए। इसके लिए हमें ग्रंथ नहीं, संवेदना चाहिए। यह भाव हर उस व्यक्ति में प्रकट हो सकता है जो स्वयं को सीमित नहीं मानता।
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जब हम सर्वात्मभाव को समझते हैं, तो यह केवल विचार या आदर्श की बात नहीं रहती, बल्कि यह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है। जैसे एक वृक्ष अपने प्रत्येक पत्ते, शाखा और फल को एक ही धारा से पोषित करता है, वैसे ही हम भी इस विशाल सृष्टि के एक अभिन्न अंश होते हैं। सर्वात्मभाव हमें यह समझने की क्षमता देता है कि हमारा अस्तित्व किसी विशेष शरीर या सीमित चेतना से परे है। हम सम्पूर्ण ब्रह्मांड के साथ एक हैं। जब आप किसी के प्रति कटुता अनुभव करें-तो एक पल ठहरिए, श्वास लीजिए, और स्वयं से पूछिए- क्या वह मुझसे अलग है? क्या वह भी मेरी तरह प्रेम, सुरक्षा और सम्मान नहीं चाहता? यही ठहराव, यही विचार, यही आत्म-साक्षात्कार सर्वात्मभाव की ओर एक कदम और बढ़ा देता है।
सर्वात्मभाव का बीज श्रद्धा में है, इसका पुष्प करुणा है, और इसका फल शांति है। जब हम इस शांति को जीने लगते हैं, तो हमें किसी मोक्ष की तलाश नहीं रहती। जीवन स्वयं ही एक साक्षात मोक्ष बन जाता है। जब हम अपने कर्तव्यों को सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के लिए निभाने लगते हैं, तब जीवन में एक नया अर्थ उत्पन्न होता है।
"सर्वभूतहिते रतः"- अर्थात, जो सर्वप्राणियों के हित में रत होता है, वही सच्चा योगी है- तो यही सर्वात्मभाव का उद्घाटन है। यह ज्ञान हमें बताता है कि जब हम सभी के कल्याण में अपना कल्याण देखते हैं, तो हम न केवल एक बेहतर इंसान बनते हैं, बल्कि एक सच्चे योगी भी बनते हैं।
सर्वात्मभाव का अभ्यास केवल विशेष समय और स्थान तक सीमित नहीं है। यह हमारे हर कार्य में, हर अनुभव में, हर आंतरिक संवाद में प्रकट हो सकता है। जब हम अपने परिवार, समाज और देश से परे जाकर समस्त सृष्टि को एक रूप में देखना शुरू करते हैं, तो हम अपने जीवन की सबसे गहरी सच्चाई को महसूस करने लगते हैं- हम सब एक हैं। यही सर्वात्मभाव है।