Indore News: मासूम अनिका को बचाने एकत्र हुए आठ करोड़ रुपये, पर डाॅलर के दाम बढ़ने से इंजेक्शन हो गया महंगा
इंदौर की मासूम अनिका शर्मा के इलाज के लिए उसके माता-पिता पिछले 9 महीनों से क्राउड फंडिंग के जरिए 8 करोड़ रुपये से अधिक जुटा चुके हैं, लेकिन डॉलर के बढ़ते रेट के कारण अमेरिका से आने वाले जीवनरक्षक इंजेक्शन की कीमत अब 9 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है।
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इंदौर की अनिका शर्मा के लिए अब तक 8 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि उसके माता-पिता ने क्राउड फंडिंग से जुटा ली है, लेकिन डॉलर के रेट बढ़ने से अमेरिका से मंगाए जाने वाले इंजेक्शन की कीमत में बदलाव आया है। अब उस इंजेक्शन को मंगाने के लिए 9 करोड़ रुपये से अधिक की जरूरत होगी। अब माता-पिता को इंतजार है कि जिन लोगों ने राशि देने का वादा किया था, वे भी जल्द राशि उपलब्ध करा दें, ताकि उनकी बेटी का इलाज जल्द शुरू हो सके।
इंदौर की अनिका शर्मा SMA Type-2 बीमारी से पीड़ित है। इसके इलाज के लिए 9 करोड़ रुपये का इंजेक्शन लगेगा, जो अमेरिका से आना है। पिछले कई महीनों से अनिका की मां सरिता और पिता प्रवीण ने कई लोगों के साथ मिलकर क्राउड फंडिंग की और इस क्राउड फंडिंग से करोड़ों रुपये बेटी के इलाज के लिए जमा कर लिए।
इंदौर में सबसे ज्यादा उन्हें मदद मिली। इसके बाद वे मुंबई भी गए और वहां से कई लोगों ने उन्हें मदद की, लेकिन अभी भी उतनी राशि नहीं जुट पाई है, जितनी इंजेक्शन खरीदने के लिए जरूरी है। मासूम अनिका का मामला इंदौर हाईकोर्ट तक भी पहुंच चुका है और कोर्ट ने सरकार को मदद करने के लिए कहा है।
9 माह में जुटे 8 करोड़
जब माता-पिता को पता चला कि अनिका को यह बीमारी है, तो उन्होंने इलाज के बारे में जानकारी जुटाई। अनिका मध्यमवर्गीय परिवार से है। उसकी बीमारी के इलाज के लिए एक इंजेक्शन जरूरी है, जिसकी कीमत 9 माह पहले साढ़े 8 करोड़ रुपये थी। अब उस इंजेक्शन की कीमत बढ़कर 9 करोड़ रुपये हो गई है। अनिका को वह इंजेक्शन तभी दिया जा सकता है, जब उसका वजन साढ़े 13 किलो से कम हो। माता-पिता के लिए पैसे जुटाने के अलावा अनिका का वजन कम रखना भी चुनौती से कम नहीं है। उसे कम कैलोरी की डाइट देकर वजन को नियंत्रित किया गया है। फिलहाल उसका वजन साढ़े 11 किलो हो चुका है।
क्या है एसएमए टाइप 2 बीमारी
दरअसल, स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रॉफी टाइप 2 एक आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। यह मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं (मोटर न्यूरॉन्स) को नुकसान पहुंचाती है। यह आमतौर पर 6 से 18 महीने की उम्र के बच्चों में सामने आती है। इस स्थिति से पीड़ित बच्चे बिना सहारे के बैठ सकते हैं, लेकिन वे अपने दम पर खड़े नहीं हो सकते और चल नहीं सकते हैं।
